https://www.profitablecpmrate.com/gtfhp9z6u?key=af9a967ab51882fa8e8eec44994969ec 2. आध्यात्मिकता का नशा की संगत भाग 1: <script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-2948214362517194" crossorigin="anonymous"></script>
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।। कार्तिक मास महात्म्य / कभी सत्य सुन्ना भी बुरा लग जाता है ।।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

।। कार्तिक मास महात्म्य / कभी सत्य सुन्ना भी बुरा लग जाता है ।।


।। श्री स्कंद पुराण प्रवचन ।।

*⛳🕉️🦚ॐ श्री गणेशाय नमः🦚🕉️⛳*

 *कार्तिक मास महात्म्य* 


📚 _*संदर्भ:- स्कंद पुराण-वैष्णवखण्ड*_

👉🏻 *भाग- ५*



_*( विभिन्न देवताओं के संतोष के लिये कार्तिक स्नान की विधि तथा स्नान के लिये श्रेष्ठ तीर्थो का वर्णन )*_

कुछ रात बाकी रहे तभी स्नान किया जाय तो वह उत्तम और भगवान् विष्णु को सन्तुष्ट करने वाला है। 

सूर्योदयकाल में किया हुआ स्नान मध्यम श्रेणी का है ।

जब तक कृत्तिका अस्त नहो ।

तभी तक स्नान का उत्तम समय है ।

अन्यथा बहुत विलम्ब करके किया हुआ स्नान कार्तिक स्नान की श्रेणी में नहीं आता। 

स्त्रियों को पति की आज्ञा लेकर कार्तिक स्नान करना चाहिये। 

क्योंकि पति से बिना पूछे जो धर्मकार्य किया जाता है ।

वह पति की आयु को क्षीण कर देता है। 

स्त्रियों के लिये पति की सेवा छोड़कर दूसरा कोई धर्म नहीं है?। 

जो पति की आज्ञा का पालन करे । 

वही इस संसार में धर्मवती है ।

केवल व्रत आदि से धर्मवती नहीं होती। 

पति यदि दरिद्र, पतित,मुर्ख अथवा दीन भी हो ।

तो वह वैसा होता हुआ भी स्त्री का आश्रय है। 

उसके त्याग से स्त्री नरक में गिरती है। 

जिसके दोनों हाथ, दोनों पैर, वाणी और मन - ये काबू में रहें तथा जिसमें विद्या, तप एवं कीर्ति हो ।

वही मनुष्य तीर्थ के फल का भागी होता है। 

जिसकी तीर्थो में श्रद्धा न हो ।

जो तीर्थ में भी पाप की ही बात सोचता हो ।

नास्तिक हो ।

जिसका मन दुविधा में पड़ा हो तथा जो कोरा तर्कवादी हो -

ये पाँच प्रकार के मनुष्य तीर्थफल के भागी नहीं होते। 

जो ब्राह्मण प्रतिदिन प्रात:काल उठकर तीर्थ में स्नान करता है ।

वह सब पापों से मुक्त हो परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त होता है। 

स्नान का तत्त्व जानने वाले मनीषी पुरुषों ने चार प्रकार के स्नान बतलाये हैं -

वायव्य, वारुण, ब्राह्म और दिव्य। 

गोधूलि से किया हुआ स्नान वायव्य कहलाता है। 

समुद्र आदि के जल में जो स्नान किया जाता है ।

उसे वारुण कहते हैं। 

वेद मन्त्रों कि उच्चारणपूर्वक जो स्नान होता है।

उसका नाम ब्राह्म है ।

तथा मेघों अथवा सूर्य की किरणों द्वारा जो जल अपने शरीर पर गिरता है ।

उसे दिव्य स्नान कहा गया है। 

इन सभी स्नानों में वारुण स्नान सबसे उत्तम है। 

ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य को  मन्त्रोच्चारणपूर्वक स्नान करना चाहिये। 

स्त्री और शूद्र के लिये बिना मन्त्र के ही स्नान का विधान है। 

प्राचीन समय में श्रेष्ठ तीर्थ पुष्कर में जहाँ नन्दा-संगम है ।

वहीं नन्दा के कहने से राजा प्रभंजन कार्तिक मास में पुष्कर स्नान करके व्याघ्रयोनि से मुक्त हुए थे और नन्दा भी कार्तिक में पुष्कर का स्पर्श पाकर परम धाम को प्राप्त हुई थी।

_*क्रमशः........*_ ▶️
〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️
*जनजागृति हेतु लेख प्रसारण अवश्य करें*⛳🙏🏻

*🙏🏻ॐ जय श्री कृष्ण🚩:*
_*⛳⚜️*जय द्वारकाधीश*_⚜⛳

।। कभी सत्य सुन्ना भी बुरा लग जाता है ।।


आप पसीने से तर बतर हैं।  बहुत प्यासे, पर कहीं भी पानी नहीं मिल सकता है।  ऐसे में तुम वृक्ष की छाया में थकान मिटाने के लिए खड़े होते हो!

 तभी सामने की एक इमारत की पहली मंजिल की खिड़की खुलती है और आपकी  उस व्यक्ति से आंखों मिलती है।  आपकी स्थिति देखकर, वह व्यक्ति हाथ के इशारे से आपको पानी के लिए पूछता है।  अब आप उस व्यक्ति के बारे में कैसी राय होगी?

यह आपकी पहली राय है!

आदमी  नीचे आने का इशारा करता है और खिड़की बंद कर देता है।  नीचे का दरवाजा 15 मिनट बाद भी नहीं खुलता।  अब उस व्यक्ति के बारे में आपकी क्या राय है?

 यह आपकी दूसरी राय है!

थोड़ी देर बाद दरवाजा खुलता है और आदमी कहता है: 'मुझे देरी के लिए खेद है, लेकिन आपकी हालत देखकर, मैंने आपको पानी के बजाय नींबू पानी देना सबसे अच्छा समझा!  इसलिए थोड़ा लंबा समय लगा! '

अब उस व्यक्ति के बारे में आपकी क्या राय है?

 याद रखें कि आपको अभी तक कोई पानी या शर्बत नहीं मिला है और अपनी तीसरी राय को ध्यान में रखें।

अब जैसे ही आप शर्बत को अपनी जीभ पर लगाते हैं, आपको पता चलता है कि इसमें चीनी नहीं है।


अब आप उस व्यक्ति के बारे में कैसा महसूस करते हैं?

आपके चेहरे को खट्टेपन से भरा हुआ देखकर, व्यक्ति धीरे से चीनी का एक पाऊच निकालता है और कहता है, आप जितना चाहें उतना डाल लें।

अब उसी व्यक्ति के बारे में आपकी क्या राय होगी?

एक सामान्य स्थिति में भी, अगर हमारी राय इतनी खोखली है और लगातार बदलती जा रही है, तो क्या हमें किसी भी बारे में राय देने के लायक है या नहीं!

*वास्तव में, दुनिया में इतना समझ आया कि अगर कोई व्यक्ति आपकी अपेक्षाओं के अनुरूप व्यवहार करता है तो वह अच्छा है अन्यथा वह बुरा है!*

दिलचस्प बिंदु है स्वयं विचार करें...🌹                                                                        
🙏🌹🙏🌹🙏🌹🙏
पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:- 
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science) 
" Opp. Shri Dhanlakshmi Strits , Marwar Strits, RAMESHWARM - 623526 ( TAMILANADU )
सेल नंबर: . + 91- 7010668409 / + 91- 7598240825 WHATSAPP नंबर : + 91 7598240825 ( तमिलनाडु )
Skype : astrologer85
Email: prabhurajyguru@gmail.com
आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद.. 
नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

।। हनुमानजी की दिव्य उधारी / पूरा विश्व मे भगवान रामचन्द्रजी की महिमा ।।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

।। हनुमानजी की दिव्य उधारी /  पूरा विश्व मे भगवान रामचन्द्रजी की महिमा ।।


।। श्री रामचरित्रमानस प्रवचन ।।

*हनुमानजी की दिव्य उधारी !!!!!


*पढ़ कर आनन्द ही आनन्द होगा जी,*सब पर कर्जा हनुमान जी का,सब ऋणी हनुमानजी महाराज के।* 



*रामजी लंका पर विजय प्राप्त करके आए तो ।* 

*भगवान ने विभीषण जी, जामवंत जी, अंगद जी, सुग्रीव जी सब को अयोध्या से विदा किया।* 

*तो सब ने सोचा हनुमान जी को प्रभु बाद में बिदा करेंगे ।* 

*लेकिन रामजी ने हनुमानजी को विदा ही नहीं किया ।* 

*अब प्रजा बात बनाने लगी कि क्या बात सब गए हनुमानजी नहीं गए अयोध्या से!*

*अब दरबार में काना फूसी शुरू हुई कि हनुमानजी से कौन कहे जाने के लिए ।* 

*तो सबसे पहले माता सीता की बारी आई कि आप ही बोलो कि हनुमानजी चले जाएं।*

*माता सीता बोलीं मैं तो लंका में विकल पड़ी थी ।* 

*मेरा तो एक एक दिन एक एक कल्प के समान बीत रहा था ।* 

*वो तो हनुमानजी थे ।* 

*जो प्रभु मुद्रिका लेके गए, और धीरज बंधवाया कि...!*

*कछुक दिवस जननी धरु धीरा।*
*कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा।।*

*निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं।*
*तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं॥*

*मै तो अपने बेटे से बिल्कुल भी नहीं बोलूंगी अयोध्या छोड़कर जाने के लिए ।* 

*आप किसी और से बुलवा लो।*

*अब बारी आई लक्षमण जी की तो लक्ष्मण जी ने कहा, मै तो लंका के रणभूमि में वैसे ही मरणासन्न अवस्था में पड़ा था, पूरा रामदल विलाप कर रहा था।*

*प्रभु प्रलाप सुनि कान बिकल भए बानर निकर।*
*आइ गयउ हनुमान जिमि करुना महँ बीर रस।।*

*ये जो खड़ा है ना , वो हनुमानजी का लक्ष्मण है।* 

*मै कैसे बोलूं, किस मुंह से बोलूं कि हनुमानजी अयोध्या से चले जाएं!*

*अब बारी आई भरत जी की, अरे!* 

*भरत जी तो इतना रोए ।* 

*कि रामजी को अयोध्या से निकलवाने का कलंक तो वैसे ही लगा है ।* 

*मुझ पर, हनुमान जी का सब मिलके और लगवा दो!*

*और दूसरी बात ये कि...!*

*बीतें अवधि रहहिं जौं प्राना।* 
*अधम कवन जग मोहि समाना॥*

*मैंने तो नंदीग्राम में ही अपनी चिता लगा ली थी ।* 

*वो तो हनुमानजी थे जिन्होंने आकर ये खबर दी कि...!*

*रिपु रन जीति सुजस सुर गावत।*
*सीता सहित अनुज प्रभु आवत॥*

*मैं तो बिल्कुल न बोलूं हनुमानजी से अयोध्या छोड़कर चले जाओ ।* 

*आप किसी और से बुलवा लो।*

*अब बचा कौन..?* 

*सिर्फ शत्रुघ्न भैया।* 

*जैसे ही सब ने उनकी तरफ देखा ।* 

*तो शत्रुघ्न भैया बोल पड़े मैंने तो पूरी रामायण में कहीं नहीं बोला ।* 

*तो आज ही क्यों बुलवा रहे हो ।* 

*और वो भी हनुमानजी को अयोध्या से निकालने के लिए ।*

*जिन्होंने ने माता सीता, लक्षमण भैया, भरत भैया सब के प्राणों को संकट से उबारा हो!* 

*किसी अच्छे काम के लिए कहते तो बोल भी देता।* 

*मै तो बिल्कुल भी न बोलूं।*

*अब बचे तो मेरे राघवेन्द्र सरकार,* 
*माता सीता ने कहा प्रभु!*

*आप तो तीनों लोकों ये स्वामी है, और देखती हूं आप हनुमानजी से सकुचाते है।* 

*और आप खुद भी कहते हो कि...!*

*प्रति उपकार करौं का तोरा।* 
*सनमुख होइ न सकत मन मोरा॥*

*आखिर आप के लिए क्या अदेय है प्रभु!* 

*राघवजी ने कहा देवी कर्जदार जो हूं, हनुमान जी का, इसीलिए तो*

*सनमुख होइ न सकत मन मोरा*

*देवी!* 

*हनुमानजी का कर्जा उतारना आसान नहीं है, इतनी सामर्थ्य राम में नहीं है, जो "राम नाम" में है।* 

*क्योंकि कर्जा उतारना भी तो बराबरी का ही पड़ेगा न...!* 

*यदि सुनना चाहती हो तो सुनो हनुमानजी का कर्जा कैसे उतारा जा सकता है।*

*पहले हनुमान विवाह करें*,
*लंकेश हरें इनकी जब नारी।*

*मुदरी लै रघुनाथ चलै,निज पौरुष लांघि अगम्य जे वारी।*

*अायि कहें, सुधि सोच हरें, तन से, मन से होई जाएं उपकारी।*
*तब रघुनाथ चुकायि सकें, ऐसी हनुमान की दिव्य उधारी।।*

*देवी!* 

*इतना आसान नहीं है, हनुमान जी का कर्जा चुकाना। मैंने ऐसे ही नहीं कहा था कि...!*

*"सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं"*

*मैंने बहुत सोच विचार कर कहा था।* 

*लेकिन यदि आप कहती हो तो कल राज्य सभा में बोलूंगा कि हनुमानजी भी कुछ मांग लें।*

*दूसरे दिन राज्य सभा में सब एकत्र हुए,सब बड़े उत्सुक थे कि हनुमानजी क्या मांगेंगे, और रामजी क्या देंगे।*

*रामजी ने हनुमान जी से कहा!* 

*सब लोगों ने मेरी बहुत सहायता की और मैंने, सब को कोई न कोई पद दे दिया।*

*विभीषण और सुग्रीव को क्रमशः लंका और किष्कन्धा का राजपद,अंगद को युवराज पद।* 

*तो तुम भी अपनी इच्छा बताओ...?*

*हनुमानजी बोले!* 

*प्रभु आप ने जितने नाम गिनाए, उन सब को एक एक पद मिला है, और आप कहते हो...!*

*"तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना"*

*तो फिर यदि मै दो पद मांगू तो..?*

*सब लोग सोचने लगे बात तो हनुमानजी भी ठीक ही कह रहे हैं।* 

*रामजी ने कहा!* 

*ठीक है, मांग लो, सब लोग बहुत खुश हुए कि आज हनुमानजी का कर्जा चुकता हुआ।*

*हनुमानजी ने कहा!* 

*प्रभु जो पद आप ने सबको दिए हैं, उनके पद में राजमद हो सकता है ।* 

*तो मुझे उस तरह के पद नहीं चाहिए, जिसमे राजमद की शंका हो, तो फिर...!* 

*आप को कौन सा पद चाहिए...?*

*हनुमानजी ने रामजी के दोनों चरण पकड़ लिए, प्रभु ..!*

*हनुमान को तो बस यही दो पद चाहिए।*

*हनुमत सम नहीं कोउ बड़भागी।*
*नहीं कोउ रामचरण अनुरागी।।*

*जानकी जी की तरफ देखकर मुस्कुराते हुए राघवजी बोले, लो उतर गया हनुमानजी का कर्जा!*

*और अभी तक जिसको बोलना था, सब बोल चुके है, अब जो मै बोलता हूं ।* 

*उसे सब सुनो, रामजी भरत भैया की तरफ देखते हुए बोले...!*

*"हे! भरत भैया' कपि से उऋण हम नाही"*........

*हम चारों भाई चाहे जितनी बार जन्म लेे लें, हनुमानजी से उऋण नही हो सकते।* 

*जय श्री हनुमान जी महाराज की जय*

।। पूरा विश्व मे भगवान रामचन्द्रजी की महिमा ।।

वाल्मीकि रामायण 
आनंद रामायण 
वशिष्ठ रामायण 
याज्ञवल्क्य रामायण 
रामचरितमानस 
कंब रामायण, 
कृत्तिवास रामायण, 
अद्भुत रामायण, तत्वार्थ रामायण, संजीवनी रामायण, सर्वार्थ रामायण, उत्तर रामचरितम्, प्रतिमानाटकम्, राघवेन्द्र चरितम्, हनुमन्नाटकम्, रघुवंशम, अभिषेक नाटकम्, जानकी हरणं, राधेश्याम रामायण के अतिरिक्त 
लोमश संहिता में रामायण 
हनुमत् संहिता में रामायण 
शुक संहिता, 
बृहत्कौशल खंड, 
भुशुण्डी रामायण, 
अद्भुत रामायण, 
विलंका रामायण(सारलादास कृतं उड़िया), 
के साथ साथ 

दशरथ जातकम्, अनामक जातकम्, दशरथ कहानम् आदि (बौद्ध ग्रन्थों में रामायण), 

पउमचरिउ(21 ई.), विमलसूरि कृत रामायण(प्राकृत में), रविवेषणाचार्य कृत रामचरित(संस्कृत में), स्वयं भू कृत पउमचरिउ अपभ्रंश (नवम्, 21ई. ), अभिनव पम्पकृत(कन्नड़), रामचन्द्र चरित पुराण(11, 21ई.), गुणभद्र कृत रामायण (संस्कृत) तथा उत्तर पुराण (नवम् -21 ई. ) आदि (जैन ग्रन्थों में रामायण) के साथ साथ-

हिंदी भाषा में 11, मराठी भाषा में 8, बांग्ला भाषा में 25, तमिल भाषा में 12, तेलगू भाषा में 12 तथा उड़िया लिपि में 6 रामायण प्राप्त हैं। 

"राम चरित शतकोटि अपारा" ----
सहस्रों करोड़ बार रामायण लिखी-गाई गई है। 

 अन्य देशों के उदाहरण देखें तो-

नेपाल में भानुभक्त कृत 'नेपाली रामायण', 

भूटान में पदमपाहुस रामायण

श्री लंका में कुमार दास रचित "जानकी हरण" रामायण है (512-521ई.) तथा सिंहली भाषा में राम कथा "मलेराज़ की कथा" नाम से  700 bc)थी।  

बर्मा में 'रामवत्थु' रामायण है। 

चीन में यूतोकी रामयागन, इंडोचीन क्षेत्र में खमैर रामायण प्राप्त हुई। 

तुर्की में खोतानी रामायण, 

जावा में रामकैलिंग,  सेरतराम, सैरीराम नाम से रामायण। 

थाईलैंड में रामकियैन रामायण। 

फिलीपींस की मारनव भाषा मे संकलित 'मसलादिया लाबन' है जो विकृत रामायण है। 


इंडोनेशिया में सबसे प्राचीन शास्त्रीय भाषा कावी मे काकावीन द्वारा रचित 'रामायण काकावीन'है।  

कतर के दोहा में मुगल रामायण नाम से रामायण का अरेबिक अनुवाद जिसे हमीदा बानो ने अनुवाद कराया था, जो 16 मई 1594 को पूर्ण हुआ था। 

मलेशिया के इस्लामीकरण के बाद 1633 में मलय रामायण की सबसे प्राचीन पांडुलिपि बोडलियन पुस्तकालय में संरक्षित कर दी गई थी। मलेशिया में 'हिकायत सेरीराम' रामायण है। 

जापान में कथा संग्रह ग्रन्थ 'होबुत्सुशू' में राम कथा संकलित है। 

मंगोलिया में अनेक रामायण प्राप्त हुई हैं। मंगोलियन भाषा मे लिखित चार रामायण दम्दिन सुरेन ने खोजी थीं। इनमें 'राजा जीवक की कथा' सबसे प्रसिद्ध है। वर्तमान में लेनिनगार्द में मंगोलियन रामायण सुरक्षित हैं। 

तिब्बत में "किंरस-पुंस-पा"  नाम से रामायण । 

इनके अतिरिक्त संसार भर से तीन सौ से अधिक रामायण प्राप्त हुई हैं। 
अन्त में पुनः 

"राम चरित शतकोटि अपारा।
श्रुति सारदा न बरने पारा  ।।"
 

विध विध रूपों में, अनेकों देशों, अनेकों भाषाओं में राम कथा का प्राप्त होना ही ये सिद्ध करता है कि राम पूरे विश्व के है और उनकी कीर्ति अपार है।
प्रेम से बोलिए जय जय श्री राम। 
राजा राम चन्द्र भगवान की जय। 
ॐ नमः पार्वती पतये हर हर महादेव।। राधे राधे...! ।।
पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:- 
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science) 
" Opp. Shri Dhanlakshmi Strits , Marwar Strits, RAMESHWARM - 623526 ( TAMILANADU )
सेल नंबर: . + 91- 7010668409 / + 91- 7598240825 WHATSAPP नंबर : + 91 7598240825 ( तमिलनाडु )
Skype : astrologer85
Email: prabhurajyguru@gmail.com
आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद.. 
नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

।। श्री विष्णुपुराण प्रवचन / इन 12 पापों को कभी क्षमा नहीं करते भगवान ।।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

।।  श्री विष्णुपुराण प्रवचन / इन 12 पापों को कभी क्षमा नहीं करते भगवान ।।


।। श्री विष्णुपुराण प्रवचन ।।


👌बहूत सुंदर कथा👌

             
 एक राजा ने भगवान कृष्ण का एक मंदिर बनवाया
और पूजा के लिए एक पुजारी को लगा दिया ।




पुजारी बड़े भाव से
बिहारीजी की सेवा करने लगे ।

 भगवान की पूजा-अर्चना और
सेवा-टहल करते पुजारी की उम्र बीत गई ।

राजा रोज एक फूलों की
माला सेवक के हाथ से भेजा करता था।

पुजारी वह माला बिहारीजी
को पहना देते थे ।

जब राजा दर्शन करने आता तो पुजारी वह माला बिहारीजी के गले से उतारकर राजा को पहना देते थे।

 यह रोज का
नियम था।

 एक दिन राजा किसी वजह से मंदिर नहीं जा सका।

उसने एक सेवक से कहा- माला लेकर मंदिर जाओ ।

पुजारी से कहना ।

आज मैं नहीं आ पाउंगा ।

सेवक ने जाकर माला पुजारी को दे दी और बता दिया कि आज महाराज का इंतजार न करें ।

सेवक वापस आ गया।

 पुजारी ने माला बिहारीजी को पहना दी ।

फिर उन्हें विचार आया कि आज तक मैं अपने बिहारीजी की चढ़ी माला राजा को ही पहनाता रहा।

 कभी ये सौभाग्य मुझे नहीं
मिला ।

जीवन का कोई भरोसा नहीं कब रूठ जाए।

 आज मेरे प्रभु ने
मुझ पर बड़ी कृपा की है ।

राजा आज आएंगे नहीं ।

तो क्यों न माला

मैं पहन लूं ।

यह सोचकर पुजारी ने बिहारीजी के गले से माला उतारकर स्वयं पहन ली।

 इतने में सेवक आया और उसने बताया कि राजा की सवारी बस मंदिर में पहुंचने ही वाली है.यह सुनकर पुजारी कांप गए ।

उन्होंने सोचा अगर राजा ने माला मेरे गले में देख ली तो मुझ पर क्रोधित होंगे ।

इस भय से उन्होंने अपने गले से
माला उतारकर बिहारीजी को फिर से पहना दी।

जैसे ही राजा दर्शन को आया तो पुजारी ने नियम अुसार फिर से वह माला उतार कर राजा के गले में पहना दी ।

माला पहना रहे थे तभी राजा को माला में एक सफ़ेद बाल दिखा।

राजा को सारा माजरा समझ गया
कि पुजारी ने माला स्वयं पहन ली थी और फिर निकालकर
वापस डाल दी होगी ।

पुजारी ऐसाछल करता है।

 यह सोचकर राजा
को बहुत गुस्सा आया।

 उसने पुजारी जी से पूछा- पुजारीजी यह सफ़ेद बाल किसका है.? 

पुजारी को लगा कि अगर सच बोलता हूं ।

तो राजा दंड दे देंगे इसलिए जान छुड़ाने के लिए पुजारी ने कहा- महाराज यह सफ़ेद बाल तो बिहारीजी का है. 

अब तो राजा गुस्से
से आग- बबूला हो गया कि ये पुजारी झूठ पर झूठ बोले जा रहा
है। 

भला बिहारीजी के बाल भी कहीं सफ़ेद होते हैं ।

राजा ने कहा-

पुजारी अगर यह सफेद बाल बिहारीजी का है तो सुबह शृंगार के समय मैं आउंगा और देखूंगा कि बिहारीजी के बाल सफ़ेद है या 
काले ।

अगर बिहारीजी के बाल काले निकले तो आपको फांसी हो जाएगी ।

राजा हुक्म सुनाकर चला गया।

अब पुजारी रोकर
बिहारीजी से विनती करने लगे- प्रभु मैं जानता हूं ।

आपके सम्मुख मैंने झूठ बोलने का अपराध किया।

 अपने गले में डाली माला पुनः 

आपको पहना दी।

आपकी सेवा करते-करते वृद्ध हो
गया ।

यह लालसा ही रही कि कभी आपको चढ़ी माला पहनने का सौभाग्य मिले।

 इसी लोभ में यह सब अपराध हुआ ।

मेरे ठाकुरजी पहली बार यह लोभ हुआ और ऐसी विपत्ति आ पड़ी है ।

मेरे नाथ अब नहींहोगा ऐसा अपराध ।

 अब आप ही बचाइए नहीं तो
कल सुबह मुझे फाँसी पर चढा दिया जाएगा।

 पुजारी सारी रात रोते रहे ।

सुबह होते ही राजा मंदिर में आ गया।

 उसने कहा कि आज
प्रभु का शृंगार वह स्वयं करेगा।

 इतना कहकर राजा ने जैसे ही मुकुट हटाया तो हैरान रह गया।

 बिहारीजी के सारे बाल सफ़ेद थे. राजा को लगा ।

 पुजारी ने जान बचाने के लिए बिहारीजी के बाल रंग दिए होंगे ।

 गुस्से से तमतमाते हुए उसने बाल की जांच करनी चाही ।

बाल असली हैं या नकली यब समझने के लिए उसने जैसे
ही बिहारी जी के बाल तोडे।

 बिहारीजी के सिर से खून
कीधार बहने लगी।

 राजा ने प्रभु के चरण पकड़ लिए और क्षमा मांगने लगा।

बिहारीजी की मूर्ति से आवाज आई- राजा तुमने आज तक मुझे केवल मूर्ति ही समझा इसलिए आज से मैं तुम्हारे
लिए मूर्ति ही हूँ।

 पुजारीजी मुझे साक्षात भगवान् समझते हैं।

उनकी श्रद्धा की लाज रखने के लिए आज मुझे अपने बाल सफेद
करने पड़े व रक्त की धार भी बहानी पड़ी तुझे समझाने के लिए।

 कहते हैं- 

समझो तो देव नहीं तो पत्थर.श्रद्धा हो तो उन्हीं पत्थरों में भगवान सप्राण
होकर भक्त से मिलने आ जाएंगे ।।

*जय जय श्री कृष्ण*

🌹इन 12 पापों को कभी क्षमा नहीं करते भगवान शिव, सुखी जीवन चाहिए तो कभी ना करें 

     🌹औघड़ भोलेनाथ🌹
भगवान शिव को औघड़ और भोलेनाथ भी कहा जाता है, लेकिन शिव जितने भोले और आसानी से प्रसन्न होने वाले हैं, उनका गुस्सा भी उतना ही प्रलयंकारी है। कहते हैं कि जिस दिन शिव ने अपनी तीसरी आंख खोल दी, उसी दिन दुनिया का अंत निश्चित है

         🌺शिव पुराण🌺
शिव पुराण में कार्य, बात-व्यवहार और सोच द्वारा किए गए 12 पाप वर्णित हैं जिसे भगवान शिव कभी क्षमा नहीं करते। ऐसा व्यक्ति हमेशा ही शिव के कोप का भाजन होगा और कभी भी सुखी जीवन व्यतीत नहीं कर सकता.
औघड़ भोलेनाथ
भगवान शिव को औघड़ और भोलेनाथ भी कहा जाता है, लेकिन शिव जितने भोले और आसानी से प्रसन्न होने वाले हैं, उनका गुस्सा भी उतना ही प्रलयंकारी है। कहते हैं कि जिस दिन शिव ने अपनी तीसरी आंख खोल दी, उसी दिन दुनिया का अंत निश्चित है।

           🌹शिव पुराण🌹
शिव पुराण में कार्य, बात-व्यवहार और सोच द्वारा किए गए 12 पाप वर्णित हैं जिसे भगवान शिव कभी क्षमा नहीं करते। ऐसा व्यक्ति हमेशा ही शिव के कोप का भाजन होगा और कभी भी सुखी जीवन व्यतीत नहीं कर सकता.
सोच से किए जाने वाले पाप
आपने सुना होगा कि ऊपरवाले से कुछ छुपा नहीं होता। यहां तक कि आप अपने मस्तिष्क में जो सोच रहे होते हैं, वह भी भगवान से छुपा नहीं है। इसलिए भले ही बात और व्यवहार में आपने किसी को नुकसान ना पहुंचाया हो, लेकिन अगर मन में किसी के प्रति कोई दुर्भावना है या आपने किसी का अहित सोचा हो, तो यह भी पाप की श्रेणी में आता है।

1🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺
दूसरों के पति या पत्नी पर बुरी नजर रखना, या उसे पाने की इच्छा करना भी पाप की श्रेणी में रखा गया है

2🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
दूसरों का धन अपना बनाने की चाह रखना भी भगवान शिव की नजर में अक्षम्य अपराध और पाप है

3🍋🍋🍋🍋🍋🙉🙉🍋🍋
किसी भोलेभाले और निरपराध इंसान को कष्ट देना, उसे नुकसान पहुंचाने, या धन-संपत्ति लूटने, उसके लिए बाधाएं पैदा करने की योजना बनाना या ऐसी सोच रखना भगवान शिव की नजरों में हर हाल में माफी ना देने योग्य पाप है

4🍋🍋🍋🍋🍋🍋🍋🍋
अच्छी बातें भूलकर बुरी राह को स्वयं चुनने वाले के पाप अक्षम्य होते हैं।
बोली के द्वारा किए जाने वाले अक्षम्य पाप
शिव पुराण के अनुसार जिस प्रकार आप किसी का बुरा नहीं करने के बावजूद, उसके लिए बुरी सोच रखने के कारण भी पाप के हकदार और दंड की श्रेणी में आ जाते हैं, उसी प्रकार भले ही आपने अपने कार्य से किसी का बुरा ना किया हो, लेकिन आपकी बोली अक्षम्य पापों का हकदार भी बना सकती है। खासतौर से इन तीन हालातों में

5🍋🍋🍋🍋🍋🍋🍋🍋
किसी गर्भवती महिला या मासिक के दौरान किसी महिला को कटु वचन कहना या अपनी बातों से उनका दिल दुखाना शिव की नजरों में अक्षम्य अपराध और पाप है।


6🙉🙉🙉🙉🙉🙉🙉🐄
किसी के सम्मान को हानि पहुंचने की नीयत से झूठ बोलना ‘छल’ की श्रेणी में आता है और अक्षम्य पाप का भागीदार बनाता है।

7🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲
समाज में किसी के मान-सम्मान को हानि पहुंचाने की नीयत से या उसकी पीठ पीछे बातें करना या अफवाह फैलाना भी एक अक्षम्य पाप है। 

8 🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺
धर्म अनुसार मना की गई चीजें खाना या धर्म के विपरीत कार्य करना किसी हाल में व्यक्त के लिए स्वीकार्य नहीं होना चाहिए, वरना आप भगवान शिव की नजरों में हमेशा ही अपराधी रहेंगे।

9🥜🥜🥜🥜🥜🥜🥜🥜
बच्चों, महिलाओं या किसी भी कमजोर जीव के खिलाफ हिंसा और असामाजिक कार्यों में लिप्तता मनुष्य को पाप का दोषी बनाता है।

10🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
गलत तरीके से दूसरे की संपत्ति हड़पना, ब्राह्मण या मंदिर की चीजें चुराना या गलत तरीके से हथियाना भी आपको इस श्रेणी में लाता है।

11🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒
गुरु, माता-पिता, पत्नी या पूर्वजों का अपमान भी आपको भूलकर भी नहीं करनी चाहिए

12🐚🐚🐚🐚🐚🐚
शराब पीना, गुरु की पत्नी के साथ संबंध बनाना, दान की हुई चीजें या धन वापस लेना महापाप माने जाते हैं जिसे भगवान शिव कभी भी क्षमा नहीं करते।
।।।।।।।।। हर हर महादेव हर ।।।।।।।।।
पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:- 
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science) 
" Opp. Shri Dhanlakshmi Strits , Marwar Strits, RAMESHWARM - 623526 ( TAMILANADU )
सेल नंबर: . + 91- 7010668409 / + 91- 7598240825 WHATSAPP नंबर : + 91 7598240825 ( तमिलनाडु )
Skype : astrologer85
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आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद.. 
नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

।। लंकाधीश रावण कि मांग..! / सत्य तो हमेशा कड़वा ही होता है ।।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश


।। लंकाधीश रावण कि मांग..! / सत्य तो हमेशा कड़वा ही होता है ।।


।। श्री रामचरित्रमानस प्रवचन ।।

*लंकाधीश रावण कि मांग..!*


बाल्मीकि रामायण और तुलसीकृत रामायण में इस कथा का वर्णन नहीं है, पर तमिल भाषा में लिखी 

*महर्षि कम्बन की #इरामावतारम्'*





 मे यह कथा है.!

रावण केवल शिवभक्त, विद्वान एवं वीर ही नहीं, अति-मानववादी भी था..! 

उसे भविष्य का पता था..! 

वह जानता था कि श्रीराम से जीत पाना उसके लिए असंभव है..!

जब श्री राम ने खर-दूषण का सहज ही बध कर दिया तब तुलसी कृत मानस में भी रावण के मन भाव लिखे हैं--!

*खर दूसन मो   सम   बलवंता.!*
  *तिनहि को मरहि बिनु भगवंता.!!*

रावण के पास जामवंत जी को #आचार्यत्व का निमंत्रण देने के लिए लंका भेजा गया..!

जामवन्त जी दीर्घाकार थे, वे आकार में कुम्भकर्ण से तनिक ही छोटे थे.! 

लंका में प्रहरी भी हाथ जोड़कर मार्ग दिखा रहे थे.! 

इस प्रकार जामवन्त को किसी से कुछ पूछना नहीं पड़ा.! 

स्वयं रावण को उन्हें राजद्वार पर अभिवादन का उपक्रम करते देख जामवन्त ने मुस्कराते हुए कहा कि मैं अभिनंदन का पात्र नहीं हूँ.! 

मैं वनवासी राम का दूत बनकर आया हूँ.! 

उन्होंने तुम्हें सादर प्रणाम कहा है.!

*रावण ने सविनय कहा --* 

 "आप हमारे पितामह के भाई हैं.! 

इस नाते आप हमारे पूज्य हैं.! 

कृपया आसन ग्रहण करें.! 

यदि आप मेरा निवेदन स्वीकार कर लेंगे।

तभी संभवतः मैं भी आपका संदेश सावधानी से सुन सकूंगा.!"

जामवन्त ने कोई आपत्ति नहीं की.! 

उन्होंने आसन ग्रहण किया.! 

रावण ने भी अपना स्थान ग्रहण किया.! 

तदुपरान्त जामवन्त ने पुनः सुनाया कि वनवासी राम ने सागर-सेतु निर्माण उपरांत अब यथाशीघ्र महेश्व-लिंग-विग्रह की स्थापना करना चाहते हैं.! 

इस अनुष्ठान को सम्पन्न कराने के लिए उन्होंने ब्राह्मण ।

वेदज्ञ और शैव रावण को आचार्य पद पर वरण करने की इच्छा प्रकट की है.!

" मैं उनकी ओर से आपको आमंत्रित करने आया हूँ.!"

प्रणाम.! 

प्रतिक्रिया, अभिव्यक्ति उपरान्त रावण ने मुस्कान भरे स्वर में पूछ ही लिया..!

  *"क्या राम द्वारा महेश्व-लिंग-विग्रह स्थापना लंका-विजय की कामना से किया जा रहा है..?"*

"बिल्कुल ठीक.! 

श्रीराम की महेश्वर के चरणों में पूर्ण भक्ति है..!"

जीवन में प्रथम बार किसी ने रावण को ब्राह्मण माना है और आचार्य बनने योग्य जाना है.!

क्या रावण इतना अधिक मूर्ख कहलाना चाहेगा कि वह भारतवर्ष के प्रथम प्रशंसित महर्षि पुलस्त्य के सगे भाई महर्षि वशिष्ठ के यजमान का आमंत्रण और अपने आराध्य की स्थापना हेतु आचार्य पद अस्वीकार कर दे..?

रावण ने अपने आपको संभाल कर कहा –" 

आप पधारें.! यजमान उचित अधिकारी है.!

उसे अपने दूत को संरक्षण देना आता है.! 

राम से कहिएगा कि मैंने उसका आचार्यत्व स्वीकार किया.!"

जामवन्त को विदा करने के तत्काल उपरान्त लंकेश ने सेवकों को आवश्यक सामग्री संग्रह करने हेतु आदेश दिया और स्वयं अशोक वाटिका पहुँचे।

जो आवश्यक उपकरण यजमान उपलब्ध न कर सके जुटाना आचार्य का परम कर्त्तव्य होता है.! 

रावण जानता है कि वनवासी राम के पास क्या है और क्या होना चाहिए.!

अशोक उद्यान पहुँचते ही रावण ने सीता से कहा कि राम लंका विजय की कामना से समुद्रतट पर महेश्वर लिंग विग्रह की स्थापना करने जा रहे हैं और रावण को आचार्य वरण किया है..! 

" यजमान का अनुष्ठान पूर्ण हो यह दायित्व आचार्य का भी होता है.! 

तुम्हें विदित है कि अर्द्धांगिनी के बिना गृहस्थ के सभी अनुष्ठान अपूर्ण रहते हैं.!

 विमान आ रहा है, उस पर बैठ जाना.! 

ध्यान रहे कि तुम वहाँ भी रावण के अधीन ही रहोगी.! 

अनुष्ठान समापन उपरान्त यहाँ आने के लिए विमान पर पुनः बैठ जाना.! "

स्वामी का आचार्य अर्थात स्वयं का आचार्य.!

 यह जान जानकी जी ने दोनों हाथ जोड़कर मस्तक झुका दिया.!

 स्वस्थ कण्ठ से 

*"सौभाग्यवती भव"* 

कहते रावण ने दोनों हाथ उठाकर भरपूर आशीर्वाद दिया.!

सीता और अन्य आवश्यक उपकरण सहित रावण आकाश मार्ग से समुद्र तट पर उतरे.!

*" आदेश मिलने पर आना"*

कहकर सीता को उन्होंने  विमान में ही छोड़ा और स्वयं राम के सम्मुख पहुँचे.!

जामवन्त से संदेश पाकर भाई, मित्र और सेना सहित श्रीराम स्वागत सत्कार हेतु पहले से ही तत्पर थे.! 

सम्मुख होते ही वनवासी राम आचार्य दशग्रीव को हाथ जोड़कर प्रणाम किया.!

*" दीर्घायु भव.!* 

*लंका विजयी भव.! "*

दशग्रीव के आशीर्वचन के शब्द ने सबको चौंका दिया.!
 
सुग्रीव ही नहीं विभीषण की भी उन्होंने उपेक्षा कर दी.! 

जैसे वे वहाँ हों ही नहीं.!

 भूमि शोधन के उपरान्त रावणाचार्य ने कहा..

" यजमान.! 

अर्द्धांगिनी कहाँ है.? 

उन्हें यथास्थान आसन दें.!"

 श्रीराम ने मस्तक झुकाते हुए हाथ जोड़कर अत्यन्त विनम्र स्वर से प्रार्थना की। 

कि यदि यजमान असमर्थ हो तो योग्याचार्य सर्वोत्कृष्ट विकल्प के अभाव में अन्य समकक्ष विकल्प से भी तो अनुष्ठान सम्पादन कर सकते हैं..!

" अवश्य-अवश्य, किन्तु अन्य विकल्प के अभाव में ऐसा संभव है।

प्रमुख विकल्प के अभाव में नहीं.! 

यदि तुम अविवाहित, विधुर अथवा परित्यक्त होते तो संभव था.! 

इन सबके अतिरिक्त तुम संन्यासी भी नहीं हो और पत्नीहीन वानप्रस्थ का भी तुमने व्रत नहीं लिया है.! 

इन परिस्थितियों में पत्नीरहित अनुष्ठान तुम कैसे कर सकते हो.?"

*" कोई उपाय आचार्य.?"*

                            
" आचार्य आवश्यक साधन, उपकरण अनुष्ठान उपरान्त वापस ले जाते हैं.! 

स्वीकार हो तो किसी को भेज दो ।

सागर सन्निकट पुष्पक विमान में यजमान पत्नी विराजमान हैं.!"

श्रीराम ने हाथ जोड़कर मस्तक झुकाते हुए मौन भाव से इस सर्वश्रेष्ठ युक्ति को स्वीकार किया.! 

श्री रामादेश के परिपालन में।

विभीषण मंत्रियों सहित पुष्पक विमान तक गए और सीता सहित लौटे.!
            
 " अर्द्ध यजमान के पार्श्व में बैठो अर्द्ध यजमान ..."

आचार्य के इस आदेश का वैदेही ने पालन किया.!

गणपति पूजन, कलश स्थापना और नवग्रह पूजन उपरान्त आचार्य ने पूछा - लिंग विग्रह.?

यजमान ने निवेदन किया कि उसे लेने गत रात्रि के प्रथम प्रहर से पवनपुत्र कैलाश गए हुए हैं.!

अभी तक लौटे नहीं हैं.! 

आते ही होंगे.!

आचार्य ने आदेश दे दिया - " 

विलम्ब नहीं किया जा सकता.! उत्तम मुहूर्त उपस्थित है.! 

( सीता माता द्वारा भालू के शिवलिंग बना लेना उसके ऊपर पूजन अर्चन अभिषेक कर लेना )

इसलिए अविलम्ब यजमान-पत्नी बालू का लिंग-विग्रह स्वयं बना ले.!"
                   
 जनक नंदिनी ने स्वयं के कर-कमलों से समुद्र तट की आर्द्र रेणुकाओं से आचार्य के निर्देशानुसार यथेष्ट लिंग-विग्रह निर्मित किया.!

( हनुमानजी को कैलास से आने में बहुत देर हो जाने के कारण सीता माता द्वारा भालू का शिवलिंग पूजन करवाना )

     यजमान द्वारा रेणुकाओं का आधार पीठ बनाया गया.! 

श्री सीताराम ने वही महेश्वर लिंग-विग्रह स्थापित किया.!

( हनुमानजी को कैलास से आने में बहुत देर हो जाने के कारण सीता माता द्वारा भालू का शिवलिंग पूजन कर लेना हनुमानजी को क्रोधित होना )

 आचार्य ने परिपूर्ण विधि-विधान के साथ अनुष्ठान सम्पन्न कराया.!

अब आती है बारी आचार्य की दक्षिणा की..!

     *श्रीराम ने पूछा -* 

*"आपकी दक्षिणा.?"*

पुनः एक बार सभी को चौंकाया ... 

आचार्य के शब्दों ने..

" घबराओ नहीं यजमान.!

स्वर्णपुरी के स्वामी की दक्षिणा सम्पत्ति नहीं हो सकती.! 

आचार्य जानते हैं कि उनका यजमान वर्तमान में वनवासी है ..."

" लेकिन फिर भी राम अपने आचार्य की जो भी माँग हो उसे पूर्ण करने की प्रतिज्ञा करता है.!"

*"आचार्य जब मृत्यु शैय्या ग्रहण करे तब यजमान सम्मुख उपस्थित रहे ....."* 

*आचार्य ने अपनी दक्षिणा मांगी.!*
          

*"ऐसा ही होगा आचार्य.!"*

यजमान ने वचन दिया और समय आने पर निभाया भी-----
          
     *" रघुकुल रीति सदा चली आई.!*
       *" प्राण जाई पर वचन न जाई.!!"*
                       
यह दृश्य वार्ता देख सुनकर उपस्थित समस्त जन समुदाय के नयनाभिराम प्रेमाश्रुजल से भर गए.! 

सभी ने एक साथ एक स्वर से सच्ची श्रद्धा के साथ इस अद्भुत आचार्य को प्रणाम किया.!
                  
रावण जैसे भविष्यदृष्टा ने जो दक्षिणा माँगी।

उससे बड़ी दक्षिणा क्या हो सकती थी.? 

जो रावण यज्ञ-कार्य पूरा करने हेतु राम की बंदी पत्नी को शत्रु के समक्ष प्रस्तुत कर सकता है।

वह राम से लौट जाने की दक्षिणा कैसे मांग सकता है.?

*( रामेश्वरम् देवस्थान में लिखा हुआ है कि इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना श्रीराम ने रावण द्वारा करवाई थी )*
हर हर रामेश्वरममहादेव हर

*🙏🏼जय श्री राम  🙏🏼*

।। सत्य तो हमेशा कड़वा ही होता है ।।

क्या बहन बेटियाँ मायके सिर्फ लेने के लिए आती हैं...!

खिडकी के पास खड़ी सिमरन सोचती हैं राखी आने वाली है पर इस बार न तो माँ ने फोन करके भैया के आने की बात कही और न ही मुझे आने को बोला ऐसा कैसे हो सकता है।

हे भगवान बस ठीक हो सबकुछ।अपनी सास से बोली माँजी मुझे बहुत डर लग रहा है।

पता नहीं क्या हो गया।

मुझे कैसे भूल गए इस बार।

आगे से सास बोली कोई बात नही बेटा तुम एक बार खुद जाकर देख आओ।

सास की आज्ञा मिलनेभर की देर थी सिमरन अपने पति साथ मायके आती हैं परंतु इस बार घर के अंदर कदम रखते ही उसे सबकुछ बदला सा महसूस होता है।

पहले जहाँ उसे देखते ही माँ - पिताजी के चेहरे खुशी से खिल उठते थे इस बार उनपर परेशानी की झलक साफ दिखाई दे रही थी, आगे भाभी उसे देखते ही दौडी चली आती और प्यार से गले लगा लेती थी पर इसबार दूर से ही एक हल्की सी मुस्कान दे डाली।भैया भी ज्यादा खुश नही थे।


सिमरन ने जैसे-तैसे एक रात बिताई परन्तु अगले दिन जैसे ही उसके पति उसे मायके छोड़ वापिस गये  तो उसने अपनी माँ से बात की तो उन्होंने बताया इसबार कोरोना के चलते भैया का काम बिल्कुल बंद हो गया।

ऊपर से और भी बहुत कुछ।

बस इसी वजह से तेरे भैया को तेरे घर भी न भेज सकी।सिमरन बोली कोई बात नहीं माँ ये मुश्किल दिन भी जल्दी निकल जाएँगे आप चिंता न करो।

शाम को भैया भाभी आपस में बात कर रहे थे जो सिमरन ने सुन ली।भैया बोले पहले ही घर चलाना इतना मुश्किल हो रहा था ऊपर से बेटे की कॉलेज की फीस,परसो राखी है सिमरन को भी कुछ देना पड़ेगा।

आगे से भाभी बोली कोई बात नहीं आप चिंता न करो।ये मेरी चूड़ियां बहुत पुरानी हो गई हैं।

इन्हें बेचकर जो पैसे आएंगे उससे सिमरन दीदी को त्योहार भी दे देंगे और कॉलेज की फीस भी भर देंगे।सिमरन को यह सब सुनकर बहुत बुरा लगा।

वह बोली भैया-भाभी ये आप दोनों क्या कह रहे हो।क्या मैं आपको यहां तंग करके कुछ लेने के लिए ही आती हुँ।

वह अपने कमरे में आ जाती हैं।तभी उसे याद आता है अपनी शादी से कुछ समय पहले जब वह नौकरी करती थी तो बड़े शौक से अपनी पहली तनख्वाह लाकर पापा को दी तो पापा ने कहा अपने पास ही रख ले बेटा मुश्किल वक़्त में ये पैसे काम आएंगे।

इसके बाद वह हर महीने अपनी सारी तनख्वाह बैंक में जमा करवा देती।

शादी के बाद जब भी मायके आती तो माँ उसे पैसे निकलवाने को कहती पर सिमरन हर बार कहती अभी मुझे जरूरत नही,पर आज उन पैसों की उसके परिवार को जरुरत है।

वह अगले दिन ही सुबह भतीजे को साथ लेकर बैंक जाती है और सारे पैसे निकलवा पहले भतीजे की कॉलेज की फीस जमा करवाती है और फिर घर का जरूरी सामान खरीद घर वापस आती है।

अगले दिन जब भैया के राखी बांधती है तो भैया भरी आँखी से उसके हाथ सौ का नोट रखते है।

सिमरन मना करने लगती है तो भैया बोले ये तो शगुन है पगली मना मत करना।

सिमरन बोली भैया बेटियां मायके शगुन के नाम पर कुछ लेने नही बल्कि अपने माँबाप कीअच्छी सेहत की कामना करने,भैया भाभी को माँबाप की सेवा करते देख ढेरों दुआएं देने, बडे होते भतीजे भतीजियो की नजर उतारने आती हैं। 

जितनी बार मायके की दहलीज पार करती हैं ईश्वर से उस दहलीज की सलामती की दुआएं माँगती हैं।

जब मुझे देख माँ - पापा के चेहरे पर रौनक आ जाती हैं, भाभी दौड़ कर गले लगाती है, आप लाड़ लड़ाते हो,मुझे मेरा शगुन मिल जाता हैं।

अगले दिन सिमरन मायके से विदा लेकर ससुराल जाने के लिए जैसे ही दहलीज पार करती हैं तो भैया का फोन बजता है।

उन्हें अपने व्यापार के लिए बहुत बड़ा आर्डर मिलता है और वे सोचते है सचमुच बहनें कुछ लेने नही बल्कि बहुत कुछ देने आती हैं मायके और उनकी आंखों से खुशी के आंसू बहने लगते है।

सचमुच बहन बेटियाँ मायके कुछ लेने नही बल्कि अपनी बेशकीमती दुआएं देने आती हैं। 

जब वे घर की  दहलीज पार कर अंदर आती हैं तो बरक़त भी अपनेआप चली आती हैं।

हर बहन बेटी के दिल की तमन्ना होती हैं कि उनका मायका हमेशा खुशहाल रहे और तरक्की करे।

मायके की खुशहाली देख उनके अंदर एक अलग ही ताकत भर जाती हैं जिससे ससुराल में आने वाली मुश्किलो का डटकर सामना कर पाती है।

मेरा यह लेख सभी बहन बेटियों को समर्पित है और साथ ही एक अहसास दिलाने की कोशिश है कि वे मायके का एक अटूट हिस्सा है।। 
जब मन करे आ सकती हैं। 
उनके लिए घर और दिल के दरवाजे़ हमेशा खुले रहेंगें।।
।।।।।।।।। जय अंबे ।।।।।।।।।।
पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
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