विभीषण की शरणागति , अयोध्या का वह सिद्ध स्थान :
|| विभीषण की शरणागति ||
विभीषण,जिसने भाई खोया,प्रभु पाए,
पर स्मृति से ओझल हो गया..!
रामायण की कथा में एक नाम ऐसा भी है जो न पूरी तरह नायक कहलाया,न खलनायक,वह था विभीषण लंका की स्वर्ण नगरी में जन्मा,रावण का छोटा भाई।एक ही कुल,एक ही रक्त पर विचार अलग।
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भाई के विरुद्ध खड़ा होने का दर्द-
विभीषण जानता था कि रावण महान विद्वान है, पर वह यह भी जानता था कि सीता हरण अधर्म है।
उसने सभा में समझाया भैया,माता सीता को लौटा दीजिए।
प्रभु राम साधारण मनुष्य नहीं हैं।
पर सत्य की आवाज़ अहंकार को चुभती है।
रावण ने उसे अपमानित किया,देश निकाला दिया।
उस क्षण विभीषण ने न केवल अपना घर छोड़ा उसने अपना भाई भी खो दिया।
सोचिए,कितना कठिन होगा वह पल,जब एक ओर रक्त का संबंध हो,और दूसरी ओर धर्म।
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शरणागति जब प्रभु मिले-
समुद्र तट पर खड़ा विभीषण,अकेला।
पीछे लंका छूट चुकी थी,आगे अनिश्चित भविष्य,वह प्रभु राम के चरणों में गिर पड़ा।
सेना में संदेह था!यह शत्रु का भाई है,कैसे विश्वास करें?
पर राम ने कहा:-जो शरण में आए, उसे मैं स्वीकार करता हूँ।
विभीषण को न केवल शरण मिली,उसे नया जीवन मिला।
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🔥 विजय के बाद भी अधूरापन-
लंका पर विजय हुई।
रावण मारा गया।
विभीषण को लंका का राजा बनाया गया।
पर क्या सच में वह विजेता था?
जिसने धर्म के लिए अपने भाई का वध देखा,क्या वह भीतर से कभी शांत हो पाया होगा?
स्वर्ण सिंहासन पर बैठा विभीषण,शायद हर दिन उस रणभूमि को याद करता होगा जहाँ उसका अपना रक्त गिरा था।
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अमर होने की कथा-
कहते हैं विभीषण चिरंजीवी हैं,अर्थात अमर।
कुछ कथाएँ कहती हैं कि वे आज भी जीवित हैं,धर्म की रक्षा के लिए।
कुछ परंपराओं में यह भी उल्लेख मिलता है कि महाभारत काल में उन्होंने पांडवों से भेंट की,और धर्म के पक्ष में आशीर्वाद दिया।
इतिहास हो या आस्था,विभीषण का चरित्र यही बताता है:-
धर्म का मार्ग चुनना आसान नहीं होता।
वह अक्सर अपनों से दूर कर देता है।
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क्यों भुला दिया गया विभीषण?
राम का नाम अमर है।
हनुमान की भक्ति अमर है।
पर विभीषण?
वह कहीं पीछे छूट गया।
शायद इस लिए कि समाज अक्सर उसे याद रखता है,जो अपने कुल के साथ खड़ा रहा,चाहे अधर्म ही क्यों न हो।
पर सच्चा साहस उसमे था,जिसने सत्य के लिए अपने ही विरुद्ध खड़ा होना चुना।
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अंतिम विचार
विभीषण की कथा हमें सिखाती है:-
धर्म कभी - कभी आपको अकेला कर देता है।
सत्य का मार्ग त्याग मांगता है।
और इतिहास में सबसे दुखी पात्र वही होते हैं,जिन्होंने सही निर्णय लिया!पर उसका मूल्य जीवनभर चुकाया।
|| जय श्री राम जय हनुमान ||
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|| अयोध्या का वह सिद्ध स्थान:-||
अयोध्या धाम में कनक भवन और हनुमानगढ़ी के मध्य स्थित है 'दशरथ महल', जिसे प्रेम से 'बड़ी जगह' भी कहा जाता है।
वर्षों पहले यहाँ एक परम विरक्त संत रहा करते थे— श्री रामप्रसाद जी।
उनका जीवन पूरी तरह प्रभु के चरणों में अर्पित था।
आश्रम की व्यवस्था का नियम सरल था: मंदिर में जो चढ़ावा आता, वह पलटू बनिया नाम के एक व्यापारी के पास भेज दिया जाता।
वहीं से राशन आता, ठाकुर जी का भोग लगता और संत - साधु प्रसाद पाते।
कहते हैं प्रभु अपने भक्तों को निखारने के लिए कभी - कभी कठोर परीक्षाएं लेते हैं।
एक दिन मंदिर में एक पैसे का भी चढ़ावा नहीं आया।
साधुओं के पास संचय के नाम पर कुछ नहीं था।
भूख से व्याकुल संतों को देख रामप्रसाद जी ने दो शिष्यों को पलटू बनिया के पास भेजा—
"भैया, आज कुछ आया नहीं है, थोड़ा राशन उधार दे दो ताकि प्रभु को भोग लग सके।
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परन्तु नियति को कुछ और ही मंजूर था। पलटू बनिया ने दो टूक कह दिया—"
महंत जी से मेरा व्यवहार नकद का है, उधार का नहीं।
आज सामान नहीं मिलेगा।
जब यह संदेश रामप्रसाद जी तक पहुँचा, तो उन्होंने अपनी आँखें मूंद लीं और करुण स्वर में कहा—
"जैसी मेरे राघवेंद्र की इच्छा।"
उस दिन न चूल्हा जला, न भोग बना।
भगवान को केवल जल का अर्पण किया गया और सभी संत निराहार रह गए।
रात गहराने लगी।
रामप्रसाद जी भूख से शिथिल शरीर के बावजूद नियम के पक्के थे।
उन्होंने ठाकुर जी को सुंदर पीताम्बर ओढ़ाया और घंटों बैठकर भजन सुनाते रहे।
उधर, आधी रात को पलटू बनिया के द्वार पर अचानक हलचल हुई।
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अरे पलटू! ओ पलटू सेठ! किवाड़ खोल...!"
नन्हे बच्चों की आवाजों से सन्नाटा टूट गया।
खीझते हुए पलटू ने दरवाजा खोला कि इन शरारती बच्चों को सबक सिखाऊँगा, पर सामने का दृश्य देख उसके प्राण जैसे गले में अटक गए।
बारह वर्ष से कम आयु के चार अति सुंदर बालक खड़े थे।
चारों ने एक ही पीताम्बर ( चादर ) को आपस में ओढ़ा हुआ था।
उनकी आँखों में ऐसी चमक और चेहरे पर ऐसी आभा थी कि पलटू का क्रोध पल भर में लुप्त होकर अगाध प्रेम में बदल गया।
उसने हकलाते हुए पूछा - बच्चों!
तुम कौन हो ?
इतनी रात को यहाँ क्या कर रहे हो?
बालक चंचलता से मुस्कुराए और घर के भीतर घुसते हुए बोले-
"हमें रामप्रसाद बाबा ने भेजा है।
इस पीताम्बर की गाँठ खोल, इसमें सोलह सौ रुपए हैं।
इन्हें गिन और रख ले।
+++ +++=
उस जमाने में सोलह सौ रुपए एक साम्राज्य के बराबर थे।
पलटू ने कांपते हाथों से पीताम्बर का कोना खोला, तो सचमुच चांदी के सिक्कों की खनक गूँज उठी।
बालकों ने अधिकार से कहा—
"इन पैसों का राशन कल सुबह ही आश्रम भिजवा देना और आज के बाद कभी मना मत करना।
पलटू को आत्मग्लानि हुई।
उसे लगा कि शायद महंत जी नाराज हो गए हैं, इस लिए रात में ही पैसे भिजवा दिए।
उसने हाथ जोड़कर कहा—
"बच्चों, मेरी पूरी दुकान भी कम पड़ेगी इन पैसों के आगे।
मैं धीरे - धीरे सारा राशन भिजवा दूँगा।"
बालक मुस्कुराए, और देखते ही देखते अंधेरे में कहीं ओझल हो गए।
वे पलटू का धन तो ले गए, पर साथ में उसका मन भी चुरा ले गए।
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सुबह मंगला आरती के समय मंदिर में हड़कंप मच गया।
ठाकुर जी का पीताम्बर गायब था!
सब को लगा चोरी हो गई है।
तभी बाहर गाड़ियों की कतार लग गई।
पलटू बनिया हाथ जोड़े, आँखों में आँसू लिए दौड़ा आया और रामप्रसाद जी के चरणों में गिर पड़ा।
महाराज! मुझे क्षमा कर दें।
रात में पैसे भिजवाने की क्या आवश्यकता थी?
मैं कान पकड़ता हूँ, अब कभी राशन के लिए मना नहीं करूँगा।
और यह रहा आपका पीताम्बर, जिसे वे बालक मेरे पास छोड़ गए थे।
रामप्रसाद जी का हृदय धक से रह गया।
उन्होंने कांपते हाथों से वह पीताम्बर छुआ - यह तो वही था जिसे उन्होंने कल रात स्वयं प्रभु को ओढ़ाया था!
जब पलटू ने रात का पूरा वृत्तांत सुनाया, तो रामप्रसाद जी दहाड़ मारकर रो पड़े।
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"हा धिक्कार है मुझ पर! मैंने जीवन भर सेवा की पर मुझे दर्शन न दिए, और इस बनिए की हठ के कारण आपको आधी रात को पीताम्बर ओढ़कर गलियों में भटकना पड़ा!इस घटना ने पलटू का जीवन बदल दिया।
वही पलटू बनिया आगे चलकर महान संत श्री पलटूदास जी के रूप में विख्यात हुए।
उधर, विरह की अग्नि में जलते रामप्रसाद जी जब रात को भजन गाने बैठे, तो मूर्छित हो गए।
उसी मूर्च्छा में उन्हें चारों भाइयों और उनकी पत्नियों सहित दिव्य दर्शन हुए।
साक्षात् मैया जानकी ने अपने कोमल हाथों से उनके आँसू पोंछे और अपनी उँगली से उनके माथे पर 'बिन्दी' लगा दी।
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तभी से 'बड़ी जगह' ( दशरथ महल ) के संप्रदाय में बिन्दी वाले तिलक की परंपरा चली आ रही है, जो इस बात का प्रतीक है कि भक्त चाहे भूखा सो जाए, पर भक्तवत्सल भगवान कभी चैन से नहीं सो सकते।
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पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
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आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद..
नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
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