श्री रामचरित्रमानस संक्षिप्त प्रवर्चन - दस अवस्थाएँ जिनमें मनुष्य धर्म का सही निर्णय नहीं कर पाता:
श्री रामचरित्रमानस संक्षिप्त प्रवर्चन- दस अवस्थाएँ जिनमें मनुष्य धर्म का सही निर्णय नहीं कर पाता :
दश धर्मं न जानन्ति
धृतराष्ट्र! निबोध तान्।
मत्त: प्रमत्त उन्मत्त:
श्रान्त: क्रुद्धो बुभुक्षितः।।
त्वरमाणश्च लुब्धश्च
भीतः कामी च ते दश।।
तस्मादेतेषु भावेषु
न प्रसज्जेत पण्डितः।।
(महाभारत, उ.प. ३३/१०१-०२)
अर्थात : नशे में मतवाला, असावधान, पागल, थका हुआ, क्रोधी, भूखा, शीघ्र कार्य करने वाला ( जल्दबाज ), लोभी , भयभीत और कामी - हे महाराज धृतराष्ट्र!
ये दस प्रकार के लोग धर्म के तत्व को नही जानते।
महाभारत में विदुरजी ने धृतराष्ट्र को नीति का अत्यन्त सूक्ष्म और जीवनोपयोगी सिद्धान्त बताया।
मनुष्य के जीवन में केवल शास्त्र का ज्ञान होना पर्याप्त नहीं है; जिस समय मन की अवस्था विकृत हो जाती है, उस समय ज्ञात धर्म भी विस्मृत हो सकता है।
महर्षि वाल्मीकि जन्मोत्सव विशेष :
आश्विन मास की पूर्णिमा को महर्षि वाल्मीकि की जयंती के रूप में मनाया जाता है।
इस दिन को परगट दिवस या वाल्मिकी जयंती के रूप में भी जाना जाता है , और यह हिंदू धर्म के बाल्मीकि धार्मिक संप्रदाय के अनुयायियों का एक प्रमुख उत्सव भी है।
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वाल्मीकि, संस्कृत रामायण के प्रसिद्ध रचयिता हैं जो आदिकवि के रूप में प्रसिद्ध हैं।
उन्होंने संस्कृत मे रामायण की रचना की।
महर्षि वाल्मीकि द्वारा रची रामायण वाल्मीकि रामायण कहलाई।
रामायण एक महाकाव्य है जो कि श्री राम के जीवन के माध्यम से हमें जीवन के सत्य व कर्तव्य से, परिचित करवाता है।
आदिकवि शब्द 'आदि' और 'कवि' के मेल से बना है।
'आदि' का अर्थ होता है 'प्रथम' और 'कवि' का अर्थ होता है 'काव्य का रचयिता'।
वाल्मीकि ने संस्कृत के प्रथम महाकाव्य की रचना की थी जो रामायण के नाम से प्रसिद्ध है।
प्रथम संस्कृत महाकाव्य की रचना करने के कारण वाल्मीकि आदिकवि कहलाये।
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इसी लिए विदुरजी दस ऐसी अवस्थाओं का वर्णन करते हैं जिनमें मनुष्य धर्म के वास्तविक स्वरूप को ठीक प्रकार से समझने में समर्थ नहीं रहता।
मूल पाठ में मत्त, प्रमत्त, उन्मत्त, श्रान्त, क्रुद्ध, बुभुक्षित, त्वरमाण, लुब्ध, भीत और कामी—
इन दस अवस्थाओं का उल्लेख है तथा अन्त में पण्डित पुरुष को इन भावों में आसक्त न होने की शिक्षा दी गयी है।
यहाँ धर्म का अर्थ केवल किसी धार्मिक कर्मकाण्ड से नहीं है।
धर्म का व्यापक अर्थ है—
जो कर्तव्य, सत्य, न्याय, मर्यादा और उचित आचरण को धारण करे।
इस लिए जब निर्णय का समय हो, तब मन की स्थिति अत्यन्त महत्वपूर्ण हो जाती है।
जीवन परिचय :
किंवदंती के अनुसार वह एक बार महान ऋषि नारद से मिले और उनके साथ उनके कर्तव्यों पर चर्चा की।
नारद के शब्दों से प्रभावित होकर, अग्नि शर्मा ने तपस्या करना शुरू कर दिया और "मरा" शब्द का जाप किया जिसका अर्थ था "मरना"।
जैसे ही उन्होंने कई वर्षों तक तपस्या की, शब्द "राम" बन गया, जो भगवान विष्णु का एक नाम था।
अग्नि शर्मा के चारों ओर विशाल एंथिल का निर्माण हुआ और इससे उन्हें वाल्मिकी नाम मिला।
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श्रीरामचरितमानस भी बार - बार मन, इन्द्रिय, मोह, क्रोध, लोभ और काम के संयम को धर्ममार्ग का आधार बताती है।
श्रीराम का चरित्र इस बात का आदर्श प्रस्तुत करता है कि विपरीत परिस्थिति में भी मर्यादा, सत्य और कर्तव्य को नहीं छोड़ना चाहिए।
एक अन्य कथा के अनुसार ऋषि बनने से पहले वाल्मिकी एक चोर थे, इसके बारे में कुछ किंवदंतियाँ भी मौजूद हैं।
स्कंद पुराण के नागर खंड में मुखारा तीर्थ के निर्माण पर अपने खंड में उल्लेख किया गया है कि वाल्मिकी का जन्म एक ब्राह्मण के रूप में हुआ था , जिसका नाम लोहजंघा था और वह अपने माता-पिता के प्रति समर्पित पुत्र थे।
उसकी एक खूबसूरत पत्नी थी और वे दोनों एक - दूसरे के प्रति वफादार थे।
एक बार, जब अनारता क्षेत्र में बारह वर्षों तक बारिश नहीं हुई, तो लोहजंघा ने अपने भूखे परिवार की खातिर, जंगल में मिलने वाले लोगों को लूटना शुरू कर दिया।
इस जीवन के दौरान वह सात ऋषियों या सप्तर्षियों से मिला और उन्हें भी लूटने की कोशिश की।
लेकिन विद्वान ऋषियों को उस पर दया आ गई और उन्होंने उसे उसकी मूर्खता बता दी।
उनमें से एक, पुलहा ने उसे ध्यान करने के लिए एक मंत्र दिया और ब्राह्मण बना चोर उसके पाठ में इतना तल्लीन हो गया कि उसके शरीर के चारों ओर चींटियों की पहाड़ियाँ उग आईं।
जब ऋषि वापस आये और उन्होंने चींटी पहाड़ी से मंत्र की ध्वनि सुनी, तो उन्होंने उसे आशीर्वाद दिया और कहा, "चूंकि तुमने वाल्मीक ( एक चींटी का झुंड ) के भीतर बैठकर महान सिद्धि प्राप्त की है, इस लिए तुम दुनिया में वाल्मिकी के रूप में प्रसिद्ध हो जाओगे।" ।"
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मत्त — मद में रहने वाला ;
विदुरनीति का पहला शब्द है— मत्तः।
मद केवल मदिरा का नहीं होता।
धन का मद, पद का मद, बल का मद, ज्ञान का मद, रूप का मद, यश का मद और अधिकार का मद भी मनुष्य की विवेकशक्ति को ढक सकता है।
जब अहंकार बढ़ता है तब मनुष्य को अपने दोष दिखाई नहीं देते।
वह अपनी बात को ही अंतिम सत्य समझने लगता है।
ऐसी अवस्था में धर्म का निर्णय निष्पक्ष नहीं रह सकता।
श्रीरामचरितमानस में भी विनय को अत्यन्त महत्त्व दिया गया है।
श्रीराम के चरित्र में सामर्थ्य होते हुए भी अहंकार नहीं है।
यही मर्यादा का रहस्य है—
सामर्थ्य हो, पर सामर्थ्य का मद न हो।
अतः धर्म के निर्णय में पहला नियम है—
अहंकार से पहले विवेक को स्थान देना।
वाल्मिकी जी के पिता का नाम प्रचेत था।
वाल्मीकि जी ने 24000 श्लोकों में श्रीराम उपाख्यान ‘रामायण’ लिखी।
ऐसा वर्णन है कि- एक बार वाल्मीकि क्रौंच पक्षी के एक जोड़े को निहार रहे थे।
वह जोड़ा प्रेमालाप में लीन था, तभी उन्होंने देखा कि बहेलिये ने प्रेम - मग्न क्रौंच ( सारस ) पक्षी के जोड़े में से नर पक्षी का वध कर दिया।
इस पर मादा पक्षी विलाप करने लगी।
उसके विलाप को सुनकर वाल्मीकि की करुणा जाग उठी और द्रवित अवस्था में उनके मुख से स्वतः ही यह श्लोक फूट पड़ा।
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प्रमत्त — असावधान व्यक्ति ;
दूसरी अवस्था है—प्रमत्त।
प्रमाद अर्थात् सावधानी का अभाव।
मनुष्य को सही बात मालूम हो सकती है, फिर भी वह लापरवाही के कारण उसका पालन न करे।
धर्म केवल ज्ञान का विषय नहीं, जागरूक आचरण का विषय भी है।
जिस प्रकार अग्नि के समीप सावधानी आवश्यक है, उसी प्रकार मनुष्य के भीतर काम, क्रोध, लोभ और मोह के उदय के समय विशेष सावधानी आवश्यक है।
श्रीरामचरितमानस का संदेश भी यही है कि मनुष्य को अपने आचरण के प्रति जागरूक रहना चाहिए।
भक्ति का अर्थ केवल नाम-स्मरण नहीं, बल्कि जीवन में मर्यादा, संयम और सदाचार को धारण करना भी है।
इस लिए विदुरजी का संकेत है—
प्रमाद में लिया गया निर्णय धर्म का सही निर्णय नहीं हो सकता।
मा निषाद प्रतिष्ठां त्वंगमः शाश्वतीः समाः।
यत्क्रौंचमिथुनादेकं वधीः काममोहितम्॥
अर्थ : हे दुष्ट, तुमने प्रेम मे मग्न क्रौंच पक्षी को मारा है।
जा तुझे कभी भी प्रतिष्ठा की प्राप्ति नहीं हो पायेगी और तुझे भी वियोग झेलना पड़ेगा।
उसके बाद उन्होंने प्रसिद्ध महाकाव्य "रामायण" ( जिसे "वाल्मीकि रामायण" के नाम से भी जाना जाता है ) की रचना की और "आदिकवि वाल्मीकि" के नाम से अमर हो गये।
अपने महाकाव्य "रामायण" में उन्होंने अनेक घटनाओं के समय सूर्य, चंद्र तथा अन्य नक्षत्र की स्थितियों का वर्णन किया है।
इस से ज्ञात होता है कि वे ज्योतिष विद्या एवं खगोल विद्या के भी प्रकाण्ड ज्ञानी थे।
महर्षि वाल्मीकि जी ने पवित्र ग्रंथ रामायण की रचना की परंतु वे आदिराम से अनभिज्ञ रहे।
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उन्मत्त — विवेक से विचलित अवस्था ;
तीसरी अवस्था है—उन्मत्त।
यहाँ उन्माद का अर्थ ऐसी मानसिक अवस्था से है जिसमें सामान्य विवेक और संतुलन बाधित हो जाए।
धर्म के निर्णय के लिए मन का संतुलित होना आवश्यक है।
जब मनुष्य अत्यधिक उत्तेजना, मोह या मानसिक असंतुलन में होता है, तब उसे तत्काल निर्णय लेने से बचना चाहिए।
इसी लिए शास्त्रीय दृष्टि से संयम धर्म का अंग है।
श्रीरामचरितमानस में भगवान श्रीराम का चरित्र इस संतुलन का महान उदाहरण है।
सुख हो अथवा दुःख, सम्मान हो अथवा विपरीत परिस्थिति—
मर्यादा का त्याग नहीं होता।
यही शिक्षा आज भी अत्यन्त महत्वपूर्ण है—
जिस समय मन स्वयं अपने वश में न हो, उस समय दूसरों के जीवन के विषय में निर्णायक निर्णय नहीं करना चाहिए।
अपने वनवास काल के दौरान भगवान"श्रीराम" वाल्मीकि के आश्रम में भी गये थे।
भगवान वाल्मीकि को "श्रीराम" के जीवन में घटित प्रत्येक घटना का पूर्ण ज्ञान था।
सतयुग, त्रेता और द्वापर तीनों कालों में वाल्मीकि का उल्लेख मिलता है....!
इस लिए भगवान वाल्मीकि को सृष्टिकर्ता भी कहते है....!
रामचरितमानस के अनुसार जब श्रीराम वाल्मीकि आश्रम आए थे....!
तो आदिकवि वाल्मीकि के चरणों में दण्डवत प्रणाम करने के लिए वे जमीन पर डंडे की भांति लेट गए थे और उनके मुख से निकला था....!
"तुम त्रिकालदर्शी मुनिनाथा, विस्व बदर जिमि तुमरे हाथा।"
अर्थात आप तीनों लोकों को जानने वाले स्वयं प्रभु हैं।
ये संसार आपके हाथ में एक बैर के समान प्रतीत होता है।
महाभारत काल में भी वाल्मीकि का वर्णन मिलता है।
जब पांडव कौरवों से युद्ध जीत जाते हैं तो द्रौपदी यज्ञ रखती है.....!
जिसके सफल होने के लिये शंख का बजना जरूरी था....!
परन्तु कृष्ण सहित सभी द्वारा प्रयास करने पर भी पर यज्ञ सफल नहीं होता तो कृष्ण के कहने पर सभी वाल्मीकि से प्रार्थना करते हैं।
जब वाल्मीकि वहाँ प्रकट होते हैं तो शंख खुद बज उठता है और द्रौपदी का यज्ञ सम्पूर्ण हो जाता है।
इस घटना को कबीर ने भी स्पष्ट किया है "सुपच रूप धार सतगुरु आए।
पाण्डवो के यज्ञ में शंख बजाए।
श्रान्त — अत्यधिक थका हुआ व्यक्ति ;
चौथी अवस्था है—श्रान्त।
अत्यधिक शारीरिक या मानसिक थकावट में मनुष्य की निर्णय लेने की क्षमता कमजोर हो सकती है।
थकान केवल शरीर की नहीं होती।
लगातार चिंता, तनाव, शोक, परिश्रम और मानसिक संघर्ष भी मन को श्रान्त कर सकते हैं।
ऐसी अवस्था में छोटी बात भी बड़ी दिखाई दे सकती है और उचित बात भी कठिन लग सकती है।
इस लिए धर्म के निर्णय में कभी - कभी विश्राम भी विवेक की तैयारी है।
श्रीरामचरितमानस का मर्यादा - प्रधान जीवन हमें सिखाता है कि कर्तव्य करते हुए भी जीवन को संतुलित रखना चाहिए।
धर्म का अर्थ शरीर और मन को अनावश्यक रूप से तोड़ देना नहीं है;
धर्म वह व्यवस्था है जो जीवन को उचित मार्ग पर रखती है।
क्रुद्ध — क्रोध से भरा हुआ व्यक्ति ;
विदुरजी ने पाँचवीं अवस्था बतायी—क्रुद्ध।
क्रोध में मनुष्य पहले शब्द बोल देता है और बाद में उनके परिणाम पर विचार करता है।
क्रोध की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह मनुष्य को केवल वर्तमान घटना दिखाता है, उसके दूरगामी परिणाम नहीं।
श्रीरामचरितमानस में भी काम, क्रोध, लोभ और मोह को मनुष्य के विवेक को ढकने वाले दोषों के रूप में समझा गया है।
क्रोध के समय धर्म का निर्णय इस लिए कठिन होता है क्योंकि मनुष्य न्याय नहीं, प्रतिशोध देखने लगता है।
इस लिए क्रोध आने पर मौन, विराम, विचार और भगवान का स्मरण अत्यन्त उपयोगी हैं।
धर्म का प्रश्न यह नहीं है कि “मैं सामने वाले को क्या उत्तर दूँ?”
धर्म का प्रश्न यह है कि “मेरे लिए इस समय उचित आचरण क्या है?”
यह अंतर ही क्रोध और धर्म के बीच का अंतर है।
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बुभुक्षित — भूखा व्यक्ति ;
छठी अवस्था है— बुभुक्षित, अर्थात् अत्यधिक भूख से पीड़ित व्यक्ति।
यह श्लोक हमें शरीर और मन के संबंध की भी शिक्षा देता है।
शरीर की मूल आवश्यकताओं की उपेक्षा करके मन से हमेशा समान स्तर के विवेक की अपेक्षा नहीं की जा सकती।
भूख, प्यास, थकान और शारीरिक कष्ट मनुष्य की मानसिक स्थिति को प्रभावित कर सकते हैं।
इस लिए धर्ममार्ग का अर्थ शरीर की उचित आवश्यकताओं का दमन नहीं, बल्कि उनका संयमित पालन है।
शास्त्रों में आहार को भी साधना का अंग माना गया है।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण आहार, विहार, कर्म और निद्रा - जागरण में युक्तता को योग के लिए आवश्यक बताते हैं।
अतः धर्म का निर्णय करने से पहले मनुष्य को यह भी देखना चाहिए कि कहीं शरीर की अत्यधिक पीड़ा उसके विवेक को प्रभावित तो नहीं कर रही।
त्वरमाण — अत्यधिक जल्दबाजी करने वाला ;
सातवीं अवस्था है—त्वरमाण।
जल्दबाजी धर्म की बड़ी बाधाओं में से एक है।
जो निर्णय विचार, प्रमाण, परिणाम और कर्तव्य को देखे बिना केवल तत्काल प्रतिक्रिया के रूप में लिया जाता है, वह भूल का कारण बन सकता है।
धर्म में केवल यह नहीं देखा जाता कि अभी क्या अच्छा लग रहा है, बल्कि यह भी देखा जाता है कि इस कर्म का परिणाम क्या होगा और क्या यह न्याय तथा मर्यादा के अनुकूल है।
श्रीरामचरितमानस का सम्पूर्ण चरित्र मर्यादित निर्णय का दर्शन प्रस्तुत करता है।
अतः जब मनुष्य अत्यधिक उत्तेजित होकर कहे—
“अभी इसी क्षण निर्णय लेना है”—
तब विदुरनीति का यह श्लोक स्मरण करना चाहिए।
जहाँ धर्म का प्रश्न हो, वहाँ विवेक को समय देना भी धर्म का ही अंग है।
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लुब्ध — लोभ से ग्रस्त व्यक्ति ;
आठवीं अवस्था है—लुब्ध, अर्थात् लोभी।
लोभ का स्वभाव है—
जो प्राप्त है उससे संतोष न होना और अधिक पाने की इच्छा में उचित - अनुचित का भेद खो देना।
धन स्वयं दोष नहीं है।
धन का उचित उपयोग धर्मसम्मत हो सकता है।
दोष तब उत्पन्न होता है जब धन प्राप्त करने की इच्छा धर्म से बड़ी हो जाए।
विदुरनीति के इसी अध्याय में बुद्धिमान व्यक्ति के अनेक लक्षणों का वर्णन मिलता है—
वह संयमित, विवेकी और उचित आचरण वाला होता है।
श्रीरामचरितमानस में भी त्याग, संतोष और परहित की भावना को महान स्थान प्राप्त है।
इस लिए लोभ की अवस्था में धर्म का निर्णय नहीं करना चाहिए।
क्योंकि उस समय प्रश्न यह नहीं रहता कि “क्या उचित है?”
बल्कि मन पूछने लगता है—
“इससे मुझे कितना लाभ मिलेगा?”
यहीं धर्म और लोभ अलग हो जाते हैं।
भीत — भयभीत व्यक्ति ;
नवीं अवस्था है—भीतः, अर्थात् भय से पीड़ित।
भय मनुष्य की दृष्टि को संकुचित कर सकता है।
भयभीत व्यक्ति कभी - कभी उस कार्य को भी उचित समझ सकता है जो केवल भय से बचने के लिए किया जा रहा हो।
धर्म का निर्णय भय के आधार पर नहीं, सत्य और कर्तव्य के आधार पर होना चाहिए।
श्रीरामचरितमानस में धर्म का मार्ग अनेक कठिन परिस्थितियों से होकर गुजरता है, परन्तु मर्यादा का आधार भय नहीं है।
यहाँ शिक्षा यह है कि भय का अनुभव होना और भय के कारण अधर्म का निर्णय कर देना—
दो अलग बातें हैं।
भय आया तो उसे पहचानना चाहिए, भगवान का स्मरण करना चाहिए, परिस्थिति का विचार करना चाहिए और फिर कर्तव्य का निर्णय करना चाहिए।
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कामी — कामना से अत्यधिक ग्रस्त व्यक्ति ;
दसवीं अवस्था है— कामी।
यहाँ काम केवल इन्द्रिय - विषय तक सीमित नहीं माना जाना चाहिए।
किसी वस्तु, व्यक्ति, पद, सुख या इच्छा के प्रति ऐसा अत्यधिक आकर्षण कि विवेक पीछे छूट जाए—
यह भी कामना की विकृत अवस्था है।
जब इच्छा मनुष्य की स्वामिनी बन जाती है तब धर्म उसके लिए बाधा जैसा दिखाई देने लगता है।
इसी लिए श्रीरामचरितमानस में भगवान के प्रति प्रेम और विषयासक्ति के बीच का अंतर समझना आवश्यक है।
भक्ति मन को ऊपर उठाती है, आसक्ति मन को बाँधती है।
धर्म का उद्देश्य इच्छा का पूर्ण नाश मात्र नहीं, बल्कि इच्छा को मर्यादा और सत्य के अधीन करना है।
इन दस अवस्थाओं का मूल संदेश ;
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श्रीरामचरितमानस से इसका आध्यात्मिक सम्बन्ध ;
श्रीरामचरितमानस का मूल भाव केवल श्रीराम की कथा सुनना नहीं है।
मानस मनुष्य को मर्यादा, सत्य, भक्ति, सेवा, संयम, विनय और धर्म का मार्ग दिखाती है।
महाभारत की विदुरनीति कहती है कि कुछ मानसिक अवस्थाएँ मनुष्य को धर्म का सही निर्णय करने से रोकती हैं।
रामचरितमानस का आदर्श कहता है कि मनुष्य को अपने मन और इन्द्रियों को मर्यादा में रखकर धर्म का पालन करना चाहिए।
दोनों ग्रंथों की शिक्षा को एक साथ रखने पर एक अत्यन्त महत्वपूर्ण सूत्र सामने आता है—
धर्म का निर्णय बाहर की परिस्थिति से पहले भीतर की अवस्था देखकर करना चाहिए।
मन अशान्त है तो पहले मन को स्थिर करो।
मन क्रोधित है तो पहले क्रोध को देखो।
मन लोभी है तो पहले स्वार्थ को पहचानो।
मन भयभीत है तो पहले भय को पहचानो।
मन कामना से भरा है तो पहले इच्छा की प्रकृति समझो।
तभी धर्म का निर्णय निष्पक्ष हो सकता है।
आज के जीवन के लिए दस आत्मपरीक्षण प्रश्न ;
विदुरनीति के इस श्लोक को केवल सुनने के लिए नहीं, आत्मपरीक्षण के लिए भी अपनाया जा सकता है।
प्रतिदिन स्वयं से पूछा जा सकता है—
१. क्या मैं किसी प्रकार के मद में तो नहीं हूँ?
२. क्या मैं अपने कर्तव्य के प्रति प्रमाद तो नहीं कर रहा?
३. क्या मेरा मन अत्यधिक उत्तेजित या असंतुलित तो नहीं?
४. क्या मैं अत्यधिक थकान में निर्णय तो नहीं ले रहा?
५. क्या मेरे निर्णय पर क्रोध का प्रभाव तो नहीं?
६. क्या शारीरिक भूख या कष्ट मेरे विचार को प्रभावित कर रहा है?
७. क्या मैं अनावश्यक जल्दबाजी कर रहा हूँ?
८. क्या मेरे निर्णय के पीछे लोभ तो नहीं?
९. क्या मैं केवल भय के कारण निर्णय कर रहा हूँ?
१०. क्या मेरी तीव्र इच्छा मेरे विवेक पर शासन तो नहीं कर रही?
यदि इन प्रश्नों में से किसी का उत्तर “हाँ” हो, तो निर्णय को थोड़ा रोककर आत्मचिन्तन करना ही विदुरनीति की भावना के अधिक निकट है।
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