।। श्रीरामचरितमानस — विभीषण की शरणागति ।।
।। श्रीरामचरितमानस — विभीषण की शरणागति ।।
विभीषण— जिसने भाई खोया, प्रभु पाए; पर क्या वास्तव में स्मृति से ओझल हो गया?
श्रीरामचरितमानस में विभीषण की शरणागति केवल लंका से निकलकर श्रीराम के पास पहुँच जाने की घटना नहीं है।
यह प्रसंग धर्म और अधर्म, परिवार और नीति, मोह और सत्य, भय और विश्वास तथा अंततः शरणागति और भगवान की करुणा के स्वरूप को समझाने वाला अत्यंत महत्वपूर्ण प्रसंग है।
विभीषण,जिसने भाई खोया,प्रभु पाए , पर स्मृति से ओझल हो गया..!
रामायण की कथा में एक नाम ऐसा भी है जो न पूरी तरह नायक कहलाया,न खलनायक,वह था विभीषण लंका की स्वर्ण नगरी में जन्मा,रावण का छोटा भाई।
एक ही कुल,एक ही रक्त पर विचार अलग।
विभीषण उसी कुल में जन्मे जिसमें रावण और कुंभकर्ण जैसे महाबली उत्पन्न हुए।
रक्त एक था, परिवार एक था, लंका एक थी, लेकिन विचार एक नहीं थे।
यही इस प्रसंग का सबसे बड़ा संदेश है कि जन्म, कुल और संबंध मनुष्य की अंतिम पहचान नहीं होते; उसके आचरण, विवेक और धर्मबुद्धि भी उसके जीवन का निर्णायक आधार बनते हैं।
विभीषण रावण के छोटे भाई थे।
परंतु जब रावण ने सीता का हरण करके श्रीराम से वैर किया और हितकारी नीति - वचन को स्वीकार नहीं किया, तब विभीषण ने अपने ही भाई के सामने सत्य और धर्म की बात कही।
वाल्मीकि रामायण के युद्धकाण्ड में विभीषण बार - बार रावण को हितकारी सलाह देते हैं और अंततः रावण द्वारा अपमानित होकर श्रीराम की शरण में चले जाते हैं।
यहाँ ध्यान देने योग्य बात है—
विभीषण ने पहले रावण को छोड़ा नहीं था; उन्होंने पहले उसे समझाया था।
यही अंतर शरणागति के इस प्रसंग को अत्यंत गंभीर बना देता है।
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| Colour | Deluxe |
| Brand | SOLANKIZZZ |
| Model Name | Deluxe AM |
| Item dimensions L x W x H | 25 x 30 x 45 Centimeters |
| Item Weight | 4 kg 370 g |
About this item
धर्म का साथ देने का अर्थ केवल अपने लोगों का साथ देना नहीं ;
संसार में मनुष्य अनेक संबंधों से बंधा होता है—
माता - पिता, भाई - बहन, परिवार, मित्र, समाज और अपने परिचितों से।
लेकिन धर्मशास्त्रीय दृष्टि से संबंध तब तक मंगलकारी हैं जब तक वे धर्म के विरोध में खड़े न हों।
रावण के प्रति विभीषण का संबंध भ्रातृभाव का था।
फिर भी उन्होंने रावण के अधर्म को धर्म नहीं माना।
वाल्मीकि रामायण में विभीषण स्वयं श्रीराम के सामने अपना परिचय देते हुए कहते हैं कि वे रावण के छोटे भाई हैं और उन्होंने रावण को सीता को श्रीराम को लौटा देने के लिए बार - बार समझाया था। रावण ने उस हितकारी सलाह को स्वीकार नहीं किया।
इस से एक महत्वपूर्ण सिद्धान्त सामने आता है—
अपने व्यक्ति का साथ देना और उसके अधर्म का साथ देना—
दो अलग बातें हैं।
विभीषण ने भाई को छोड़ने की इच्छा से पहले धर्म को समझाने का प्रयास किया।
जब रावण ने नीति को अस्वीकार किया और विभीषण का अपमान किया, तब उन्होंने अधर्म की सभा में रहना स्वीकार नहीं किया।
भाई के विरुद्ध खड़ा होने का दर्द -
विभीषण जानता था कि रावण महान विद्वान है, पर वह यह भी जानता था कि सीता हरण अधर्म है।
उसने सभा में समझाया भैया,माता सीता को लौटा दीजिए।
प्रभु राम साधारण मनुष्य नहीं हैं।
पर सत्य की आवाज़ अहंकार को चुभती है।
रावण ने उसे अपमानित किया,देश निकाला दिया।
उस क्षण विभीषण ने न केवल अपना घर छोड़ा उसने अपना भाई भी खो दिया।
सोचिए,कितना कठिन होगा वह पल,जब एक ओर रक्त का संबंध हो,और दूसरी ओर धर्म।
विभीषण की शरणागति में पहला प्रमाण— उन्होंने सत्य का पक्ष नहीं छोड़ा ;
वाल्मीकि रामायण के युद्धकाण्ड में विभीषण रावण से कठोर वचन कहकर श्रीराम के पास पहुँचते हैं।
वहाँ वे अपने साथियों सहित उपस्थित होते हैं और स्वयं को रावण का भाई बताते हुए श्रीराम की शरण लेने की घोषणा करते हैं।
विभीषण कहते हैं—
«“सोऽहं परुषितस्तेन दासवच्चावमानितः।
त्यक्त्वा पुत्रांश्च दारांश्च राघवं शरणं गतः॥”»
अर्थात् रावण द्वारा अपमानित होकर, अपने पुत्रों और पत्नी को पीछे छोड़कर वे राघव की शरण में आए हैं।
यहाँ विभीषण की स्थिति को समझना आवश्यक है।
वे किसी साधारण भय के कारण नहीं आए।
उन्होंने अपने सामने दो मार्ग देखे—
एक ओर अपना परिवार, अपना वैभव और लंका;
दूसरी ओर धर्म का आश्रय।
उन्होंने धर्म को चुना।
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शरणागति जब प्रभु मिले -
समुद्र तट पर खड़ा विभीषण,अकेला।
पीछे लंका छूट चुकी थी,आगे अनिश्चित भविष्य,वह प्रभु राम के चरणों में गिर पड़ा।
सेना में संदेह था!यह शत्रु का भाई है,कैसे विश्वास करें?
पर राम ने कहा:-जो शरण में आए, उसे मैं स्वीकार करता हूँ।
विभीषण को न केवल शरण मिली,उसे नया जीवन मिला।
श्रीराम के शिविर में भी तत्काल सबने विभीषण को स्वीकार नहीं किया ;
यह प्रसंग और भी महत्वपूर्ण इस लिए है क्योंकि श्रीराम की शरण में पहुँचने के बाद भी विभीषण को तुरंत स्वीकार करने का निर्णय नहीं हुआ।
सुग्रीव को संदेह हुआ कि कहीं यह रावण की ओर से भेजा हुआ कोई छल तो नहीं।
अन्य वानर - वीरों ने भी सावधानी रखने की बात कही।
हनुमान ने विभीषण के व्यवहार और परिस्थिति को देखकर उनका पक्ष समझने योग्य बताया।
वाल्मीकि रामायण के युद्धकाण्ड सर्ग 17 में यह पूरा विचार-विमर्श मिलता है।
यहाँ एक अत्यंत गहरा धर्म - सिद्धान्त सामने आता है—
शरण देना करुणा है, लेकिन शरणागत की परिस्थिति को समझना विवेक है।
श्रीराम ने बिना किसी की बात सुने निर्णय नहीं किया।
उन्होंने सबकी बातें सुनीं।
लेकिन अंतिम निर्णय उन्होंने धर्म के आधार पर किया।
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🔥 विजय के बाद भी अधूरापन-
लंका पर विजय हुई।
रावण मारा गया।
विभीषण को लंका का राजा बनाया गया।
पर क्या सच में वह विजेता था?
जिसने धर्म के लिए अपने भाई का वध देखा,क्या वह भीतर से कभी शांत हो पाया होगा?
स्वर्ण सिंहासन पर बैठा विभीषण,शायद हर दिन उस रणभूमि को याद करता होगा जहाँ उसका अपना रक्त गिरा था।
श्रीराम का शरणागत के प्रति अमोघ वचन ;
श्रीरामचरितमानस में यही प्रसंग अपने सर्वोच्च आध्यात्मिक रूप में आता है।
जब विभीषण को देखकर सुग्रीव को संदेह हुआ, तब श्रीराम ने शरणागत के विषय में अपना सिद्धान्त स्पष्ट किया। मानस का प्रसिद्ध दोहा है—
“सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।
ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि॥”
अर्थ यह है कि जो व्यक्ति अपने अहित की आशंका करके शरण में आए हुए व्यक्ति को छोड़ देता है, वह अत्यंत अधम आचरण करता है।
यहाँ श्रीराम केवल विभीषण के विषय में बात नहीं कर रहे।
यह भगवान के शरणागतवत्सल स्वरूप का उद्घाटन है।
अर्थात् जो जीव भगवान के सामने आकर अपनी रक्षा का भार भगवान पर रखता है, उसके प्रति भगवान की करुणा सामान्य व्यवहार के नियमों से ऊपर दिखाई जाती है।
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“कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू…” — भगवान की शरण की महिमा ;
श्रीराम आगे कहते हैं—
“कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू।
आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू॥”
अर्थात् यदि किसी पर अत्यंत गंभीर पाप का भार भी हो, फिर भी वह मेरी शरण में आ जाए तो मैं उसे नहीं त्यागता।
यहाँ इस चौपाई को केवल बाहरी अर्थ में नहीं लेना चाहिए।
मानस का मूल संदेश यह है कि भगवान की शरण में आने के बाद जीव के लिए परिवर्तन का द्वार खुलता है।
भगवान शरणागत को उसके पुराने कर्मों के कारण हमेशा के लिए अस्वीकार नहीं करते।
लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि मनुष्य जान - बूझकर अधर्म करता रहे और केवल शरणागति के नाम पर पाप को उचित ठहराए।
विभीषण के प्रसंग में तो पहले ही प्रमाण है कि उन्होंने अधर्म का समर्थन नहीं किया।
उन्होंने रावण को नीति समझाई, सत्य कहा और अंततः धर्म का आश्रय लिया।
अमर होने की कथा-
कहते हैं विभीषण चिरंजीवी हैं,अर्थात अमर।
कुछ कथाएँ कहती हैं कि वे आज भी जीवित हैं,धर्म की रक्षा के लिए।
कुछ परंपराओं में यह भी उल्लेख मिलता है कि महाभारत काल में उन्होंने पांडवों से भेंट की,और धर्म के पक्ष में आशीर्वाद दिया।
विभीषण ने स्वयं अपने दोषों को स्वीकार किया ;
श्रीराम के सामने पहुँचकर विभीषण ने अपने भीतर की कोई झूठी महानता प्रस्तुत नहीं की।
मानस में उनका अत्यंत प्रसिद्ध कथन है—
“नाथ दसानन कर मैं भ्राता।
निसिचर बंस जनम सुरत्राता॥
सहज पापप्रिय तामस देहा।
जथा उलूकहि तम पर नेहा॥”
विभीषण कहते हैं—
हे नाथ! मैं दशानन रावण का
भाई हूँ। मेरा जन्म राक्षस कुल में हुआ है और मेरा शरीर तामसी है; जैसे उल्लू को अंधकार प्रिय होता है, वैसे ही मेरे स्वभाव में तामसिकता है।
यहाँ विभीषण का चरित्र और अधिक स्पष्ट होता है।
वे अपने कुल का अभिमान नहीं करते।
वे अपने दोष छिपाते नहीं।
वे अपने जन्म को अपनी श्रेष्ठता का प्रमाण नहीं बनाते।
वे भगवान के सामने स्वयं को समर्पित करते हैं।
यही शरणागति का एक महत्वपूर्ण लक्षण है—
अहंकार का क्षय।
इतिहास हो या आस्था,विभीषण का चरित्र यही बताता है:-
धर्म का मार्ग चुनना आसान नहीं होता।
वह अक्सर अपनों से दूर कर देता है।
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क्यों भुला दिया गया विभीषण ?
राम का नाम अमर है।
हनुमान की भक्ति अमर है।
पर विभीषण?
वह कहीं पीछे छूट गया।
शायद इस लिए कि समाज अक्सर उसे याद रखता है,जो अपने कुल के साथ खड़ा रहा,चाहे अधर्म ही क्यों न हो।
पर सच्चा साहस उसमे था,जिसने सत्य के लिए अपने ही विरुद्ध खड़ा होना चुना।
“श्रवन सुजसु सुनि आयुँ प्रभु…” — विभीषण का वास्तविक उद्देश्य ;
विभीषण आगे श्रीराम से कहते हैं—
“श्रवन सुजसु सुनि आयुँ प्रभु भंजन भव भीर।
त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर॥”
अर्थात् हे प्रभु! आपके सुयश को सुनकर मैं आया हूँ।
आप संसार - भय का नाश करने वाले हैं, पीड़ितों की पीड़ा हरने वाले हैं और शरणागत को सुख देने वाले रघुवीर हैं।
यहाँ विभीषण के जीवन का निर्णायक परिवर्तन दिखाई देता है।
उन्होंने लंका का आश्रय छोड़ा और राम का आश्रय लिया।
उन्होंने रावण की शक्ति के स्थान पर श्रीराम की धर्मशक्ति को स्वीकार किया।
उन्होंने बाहरी सुरक्षा के स्थान पर आध्यात्मिक शरण को चुना।
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श्रीराम ने विभीषण में केवल रावण का भाई नहीं देखा ;
मनुष्य का सामान्य दृष्टिकोण यह हो सकता है—
“यह रावण का भाई है।”
लेकिन श्रीराम की दृष्टि इससे आगे जाती है।
वे यह देखते हैं कि—
विभीषण सत्य के पक्ष में आया है।
विभीषण शरण में आया है।
विभीषण ने अधर्म का साथ छोड़ दिया है।
विभीषण अपने अहंकार के साथ नहीं, बल्कि विनय के साथ उपस्थित हुआ है।
इसलिए श्रीराम ने उसे स्वीकार किया।
वाल्मीकि रामायण में श्रीराम का सिद्धान्त अत्यंत स्पष्ट रूप से आता है कि जो व्यक्ति मित्रभाव से उनके पास आता है, उसे वे त्याग नहीं सकते।
श्रीराम का यह निर्णय केवल भावुकता नहीं था।
यह धर्म के उस सिद्धान्त पर आधारित था जिसमें शरणागत की रक्षा राजा और धर्मात्मा का कर्तव्य मानी गई है।
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शरणागति का अर्थ भाग जाना नहीं है ;
विभीषण के प्रसंग को कभी - कभी केवल इस रूप में देखा जाता है कि उन्होंने संकट देखकर रावण का साथ छोड़ दिया।
लेकिन शास्त्रीय क्रम देखने पर यह निष्कर्ष अधूरा है।
उन्होंने पहले रावण को नीति समझाई।
उन्होंने सत्य कहा।
उन्होंने अधर्म का विरोध किया।
उन्होंने अपमान सहा।
और उसके बाद श्रीराम की शरण ली।
अर्थात् विभीषण की शरणागति कर्तव्य से पलायन नहीं, अधर्म से निवृत्ति थी।
यह बहुत बड़ा अंतर है।
जो व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए अपना पक्ष बदलता है और जो व्यक्ति धर्म के लिए अधर्म का साथ छोड़ता है—
दोनों को एक ही दृष्टि से नहीं देखा जा सकता।
विभीषण के प्रसंग में शास्त्र हमें इसी विवेक की शिक्षा देता है।
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“निर्मल मन जन सो मोहि पावा” — शरणागति का आंतरिक आधार ;
श्रीराम कहते हैं—
“निर्मल मन जन सो मोहि पावा।
मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥”
भगवान के अनुसार निर्मल मन वाला व्यक्ति ही उन्हें प्राप्त करता है।
भगवान को कपट, छल और छिद्र प्रिय नहीं हैं।
विभीषण की विशेषता यही है कि वे श्रीराम के सामने अपना वास्तविक परिचय छिपाते नहीं।
वे कहते हैं—
मैं रावण का भाई हूँ।
मैं राक्षसकुल में जन्मा हूँ।
मेरा शरीर तामसी है।
फिर भी मैं आपकी शरण में आया हूँ।
यह आत्मस्वीकार शरणागति का बड़ा प्रमाण है।
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विभीषण को मिला केवल आश्रय नहीं— भगवान का विश्वास ;
शरणागति के बाद श्रीराम ने विभीषण को अपने पक्ष में स्थान दिया।
मानस में आगे भगवान विभीषण को लंका का राज्य देने का प्रसंग आता है।
समुद्र का जल मँगाकर श्रीराम ने उनका राज्याभिषेक किया।
फिर प्रसिद्ध दोहा आता है—
“रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड।
जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेहु राजु अखंड॥”
और उसके बाद—
“जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ।
सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्हे रघुनाथ॥”
यहाँ तुलसीदास जी ने श्रीराम की करुणा और विभीषण की शरणागति का परिणाम अत्यंत प्रभावशाली ढंग से रखा है।
जिस वैभव को रावण ने शक्ति, तप और अहंकार के सहारे धारण किया था, वही राज्य श्रीराम ने विभीषण को बिना अहंकार के प्रदान किया।
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रावण और विभीषण में वास्तविक अंतर क्या था ?
रावण शक्तिशाली था।
विभीषण भी राक्षसकुल में जन्मे थे।
रावण विद्वान था।
विभीषण भी नीति को समझता था।
रावण तपस्वी था।
विभीषण भी धर्मबुद्धि वाला था।
फिर अंतर कहाँ था?
अंतर था— सत्य के सामने झुकने में।
रावण को हितकारी वचन सुनाया गया, पर उसने स्वीकार नहीं किया।
विभीषण ने अपने कुल और संबंधों के बावजूद सत्य को स्वीकार किया।
यही कारण है कि मानस में विभीषण की शरणागति केवल एक पारिवारिक घटना नहीं रह जाती; वह मनुष्य के भीतर के निर्णय का प्रतीक बन जाती है।
“भाई खोया, प्रभु पाए”— इस वाक्य का शास्त्रीय अर्थ ;
विभीषण ने अपने भाई के प्रति प्रेम का त्याग इसलिए नहीं किया कि वह भाई था।
उन्होंने उस मार्ग का त्याग किया जिस पर रावण अधर्म के कारण चला गया था।
इसलिए “विभीषण ने भाई खोया” कहना भावनात्मक रूप से उचित हो सकता है, लेकिन शास्त्रीय दृष्टि से अधिक सटीक बात यह होगी कि—
विभीषण ने भ्रातृ-संबंध से अधिक धर्म को महत्व दिया।
और भगवान की शरण प्राप्त करके उन्होंने यह दिखाया कि जब सांसारिक संबंध और धर्म आमने - सामने खड़े हों, तब धर्म का आश्रय ही मनुष्य की वास्तविक रक्षा करता है।
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क्या विभीषण श्रीराम की स्मृति से ओझल हो गए ?
विभीषण को लेकर कभी - कभी यह भाव व्यक्त किया जाता है कि—
“विभीषण ने भाई खोया, प्रभु पाए, पर स्मृति से ओझल हो गया।”
लेकिन श्रीरामचरितमानस के आधार पर ऐसा कहना उचित नहीं लगता।
श्रीराम ने विभीषण को केवल युद्ध के समय उपयोग करने योग्य व्यक्ति नहीं माना।
उन्होंने उसे शरण दी।
उसका राज्याभिषेक किया।
उसे सम्मान दिया।
और उसके साथ मित्रभाव रखा।
अर्थात् विभीषण श्रीराम की दृष्टि में कोई विस्मृत व्यक्ति नहीं थे।
उनकी शरणागति के बाद उनका संबंध भय और आवश्यकता का नहीं, बल्कि भगवान के आश्रय और भक्त के समर्पण का संबंध बन गया।
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आज के लिए विभीषण की शरणागति का संदेश ;
विभीषण की कथा हमें यह नहीं सिखाती कि हर पारिवारिक मतभेद में घर छोड़ देना चाहिए।
यह भी नहीं सिखाती कि किसी व्यक्ति से असहमति होते ही उसे अधर्मी घोषित कर देना चाहिए।
यह प्रसंग इससे कहीं अधिक गहरा है।
यह सिखाता है—
पहले सत्य समझाओ।
हितकारी वचन कहो।
धर्म का मार्ग दिखाओ।
अधर्म में सहभागी मत बनो।
अपमान होने पर भी अपने भीतर द्वेष को प्रधान मत बनाओ।
और जब भगवान की शरण मिले तो अहंकार छोड़कर समर्पित हो जाओ।
विभीषण की शरणागति में तीन बातें विशेष रूप से दिखाई देती हैं—
नीति → सत्य → शरणागति।
पहले नीति का उपदेश हुआ।
फिर सत्य के पक्ष में खड़े होने का निर्णय हुआ।
और अंत में भगवान की शरण प्राप्त हुई।
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अंतिम आध्यात्मिक निष्कर्ष ;
विभीषण की कथा हमें सिखाती है:-
धर्म कभी - कभी आपको अकेला कर देता है।
सत्य का मार्ग त्याग मांगता है।
और इतिहास में सबसे दुखी पात्र वही होते हैं,जिन्होंने सही निर्णय लिया!
पर उसका मूल्य जीवनभर चुकाया।
श्रीरामचरितमानस का विभीषण-प्रसंग हमें भगवान के एक अत्यंत करुणामय स्वरूप का दर्शन कराता है—
“सरनागत बच्छल भगवाना।”
भगवान के लिए शरणागत की जाति, कुल, पूर्व स्थिति अथवा बाहरी पहचान अंतिम निर्णय नहीं बनती।
विभीषण ने अपने दोष स्वीकार किए।
उन्होंने अपना कुल छिपाया नहीं।
उन्होंने रावण से संबंध छिपाया नहीं।
उन्होंने स्वयं को महान बताने का प्रयास नहीं किया।
उन्होंने केवल इतना कहा कि—
मैं आपकी शरण में आया हूँ।
और श्रीराम ने उस शरणागति को स्वीकार किया।
यही इस प्रसंग का हृदय है।
भगवान के पास पहुँचने के लिए मनुष्य को अपने दोषों का प्रदर्शन करके निराश होने की आवश्यकता नहीं;
बल्कि उन्हें स्वीकार करके प्रभु के सम्मुख सत्य रूप में खड़ा होना आवश्यक है।
विभीषण का जीवन यह भी बताता है कि धर्म का मार्ग कभी - कभी अकेला दिखाई दे सकता है, लेकिन अकेला दिखाई देने वाला मार्ग अधर्म नहीं हो जाता और भीड़ में खड़ा होना धर्म का प्रमाण नहीं बन जाता।
रावण के पास शक्ति थी, सेना थी, राज्य था, वैभव था।
विभीषण के पास उस समय इनमें से कुछ भी नहीं था।
लेकिन विभीषण के पास धर्म का निर्णय था।
और जब धर्म का निर्णय भगवान की शरण में समर्पित हुआ, तब वही विभीषण लंका के राजा बने।
इस लिए विभीषण की शरणागति को केवल “रावण के भाई का राम के पास आ जाना” कहना इस प्रसंग की आध्यात्मिक गहराई को बहुत छोटा कर देना होगा।
यह वास्तव में—
अधर्म से धर्म की ओर,
अहंकार से विनय की ओर,
भय से विश्वास की ओर,
मोह से विवेक की ओर,
और संसार के आश्रय से श्रीराम की शरण की ओर जाने की कथा है।
इसी लिए श्रीरामचरितमानस में विभीषण की शरणागति केवल एक प्रसंग नहीं, बल्कि भगवान की शरणागतवत्सलता का जीवंत शास्त्रीय प्रमाण बन जाती है।
और अंततः यही स्मरण रखना चाहिए—
जिसे संसार उसके कुल से पहचानता है, भगवान उसे उसके हृदय और शरणागति से पहचानते हैं।
विभीषण ने रावण का भाई होना नहीं छिपाया;
उन्होंने केवल रावण के अधर्म का साथ छोड़ दिया।
उन्होंने लंका का वैभव छोड़ा;
लेकिन धर्म नहीं छोड़ा।
उन्होंने अपने लोगों का विरोध करने का आनंद नहीं लिया;
उन्होंने सत्य का आश्रय लिया।
और जब वे श्रीराम के सामने पहुँचे, तब उन्होंने अपने लिए कोई अधिकार नहीं माँगा—
उन्होंने शरण माँगी।
यही विभीषण की सबसे बड़ी पहचान है।
श्रीराम शरणं मम।
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|| जय श्री राम जय हनुमान ||
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🙏हर हर महादेव हर...!!
जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏
पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:-
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science)
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आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद..
नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏
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