https://www.profitablecpmrate.com/gtfhp9z6u?key=af9a967ab51882fa8e8eec44994969ec 2. आध्यात्मिकता का नशा की संगत भाग 1: 02/01/25

प्रार्थना बड़े गहरे अनुभव से प्रकट होती है।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

।। जीवन की सत्य घटना।।

 प्रार्थना बड़े गहरे अनुभव से प्रकट होती है। 

प्रार्थना बड़े गहरे अनुभव से प्रकट होती है।


एक ब्राह्मण रोज अपनी प्रार्थना में परमात्मा को धन्यवाद देता था : 

कि अहा, 

तू भी खूब है...!

मुझ नाकुछ को इतना देता है कि मैं कैसे तेरा धन्यवाद करूं? 

किस जबां से तेरा धन्यवाद करूं?

ब्राह्मण...! 

उसके पास कुछ था भी नहीं। 

और रोज धन्यवाद दे। 

उसके गांव में नया और पुराना परिवारिक कुटुब मोशल प्रॉब्लम से हद से ज्यादा गहरा संकटो से भी थक गए थे उसकी बातें सुन — सुनकर। 

फिर एक दिन तो ऐसा हुआ कि उसने उसके घर परिवार वालो को बोल दिया कि मुझे भगवान इधर बुला रहा है में वहां सेटिंग हो जावूगा बाद आपको भी उधर बुला लिया जाएगा ।





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एक समय वो उसका वतन से हजारों किलोमीटर की यात्रा पर निकले थे....! 

वो भी टिकट जितना ही पैसा को लेकर रास्ता में रेलवे के कोच में टिकिट तो कम्प्लीट ही था लेकिन ओरिजनल आई डी प्रूफ साथ मे नही था ।

चलती रेलवे में एक कोच से दुशरा कोच पर रेलवे के टीटी के पीछे पीछे धूमते रहते थे रेलवे के टीटी इसको दंड वसूल कर में लगा रहता था....! 

ये बोल रहा था कि मेरा पास कुछ पैसा भी नही है क्या दु आपको मेरा टिकिट तो कंप्लीट है । 

रेलवे के टीटी और ब्राह्मण दोनों एक दुशरो कि भाषा मे परिचित भी नही था टीटी बोल रहा था तो वो समझ नही रहे थे और वो बोल रहे थे तब टीटी समझ नही रहे थे ।  

जैसा तीर्थयात्रा अंतिम स्टेशन नजदीक आ रहा था ब्राह्मण भगवान को प्रार्थना पर प्रार्थना करता रहता और टीटी के पीछे पीछे धूमता रहता था ।

इसी समय वहां एक कोच में टीटी को एक यात्री पूछताछ करते है....! 

कि ये ब्राह्मण आपके पीछे पीछे क्यों घूम रहे है क्या आपका प्रॉब्लम है ।

तब टीटी उस यात्री को सब बात बोल देता है.....! 
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तब यात्री ब्राह्मण को उसके बगल में बैठाकर सब बात पुछ लेता है कि तुम किस लिए यात्रा पर आए हो क्या घर छोड़कर आये हो तब ब्राह्मण बोलता है....! 

कि में काम की तलाश में भगवान की भक्ति के लिए ही आया हु घूमने के लिए नही ।

यात्री टीटी के पास से ब्राह्मण का पीछा छुड़वा लेता है....! 

बाद वही यात्री उस ब्राह्मण को खुद के होटल में थोड़ाक दिन रुकता भी है ।

बाद वही यात्री ब्राह्मण को उसका होटल से ब्राह्मण को निकाल देता है और ब्राह्मण गांव के अंदर रोज के किराया पर रूम पकड़ लेता है....! 

लेकिन भगवान का स्थान नही छोड़ता ।

थोड़ा ज्यादा कभी काम भी ब्राह्मण को मिल भी जाता है और यहां के राजकीय आदमी के पास ब्राह्मण के वतन का राजकीय आदमी धूमने के लिए आता है और लिकल वाले राजकीय आदमी उस ब्राह्मण का राजकिय आदमी को बोल रहा है....! 

कि ये अलका वतन का ब्राह्मण है....! 

आप हमारे साथ आये मंदिर के ऑफिस में आप इसका नाम पर ज़िमेदारी पत्र पर आपकी सही कर दे तो इसको इधर ही काम अच्छा मिल जाएगा....! 
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आपका पास हौदों है पावर है तो आपकी सही इस ब्राह्मण की जीवन सुधार देगी....! 

लेकिन वो राजकीय आदमी उसका अहंकार में इतना मस्त था....! 

कि उसने सही करने को मना बोल दिया ।
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उस ब्राह्मण ने ऐसा प्रार्थना कर के भगवान को धन्यवाद कर दिया....! 

कि तीन से चार ही मास में उसका बड़ा लड़का 45 साल का हदयरोग के हुमला आ गया....! 

फिर जैसा थोड़ाक दिन हुवा तो वही राजकीय आदमी के ऊपर कोर्ट कचहरी के चक्कर काटने का समय आ गया वो भी बहुत खर्च करने के बाद कोर्ट कचहरी ने उसके हाथ मे सस्पेंड का ओडर तो थमा ही दिया......!  

लेकिन उस ब्राह्मण तो भगवान को धन्यवाद पर धन्यवाद करता रहता है ।
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पर। 

कभी कभी आज के दिन पर भी उस ब्राह्मण को न खाना पूरा मिला कभी कभी  तीन दिन सात दिन एकविस दिन तक पानी पर दिन गुजरता रहता है ।

गांव के ज्यादातर लोग उस ब्राह्मण के खिलाफ थे, जैसे लोग परदेशी लोगो के खिलाफ सदा से रहे हैं। 
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लोग कहते थे, वह बाहर का हिंदी भाषी परदेशी ब्राह्मण है । 

इस लिए इसको मंदिर के अंदर का पुजारी ब्राह्मणों ने ज्यादातर काम करने के लिए रखा भी नही था और लोकल वाले दुशरा लोगो को उसकेर कर इस ब्राह्मण को मारपीट खिलाकर मंदिर बाहर करवा दिया था ।

लेकिन इसने गांव के दुशरा ब्राह्मणों के साथ काम करना भी शुरू भी कर दिया थोड़ा ज्यादा काम भी मिल जाते थे....! 
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इस मे मंदिर का ब्राह्मणों ने फिर गांव के लोकल लोगो को उसकेर कर गांव के ब्राह्मणों का साथ लड़ाई झगड़े करके उस ब्राह्मण को काम पर रखने को मना बोल दिया था ।

अब वह ब्राह्मण अपने ही घर मे अकेला अकेला पूराकर बैठा रहता है....!  

गांव के अमुक उसका दोस्तो  के बीच कहता है बैठकर : 

"अनलहक' —— 

कि मुझे भगवान इधर लाये है में आया इधर हूं। 

यह बात ठीक भी है कि ये ब्राह्मण रॉड पर खड़ा रहता तो एक दो यात्री भी मिल जाते है.....! 

उसको अगल बगल के स्थान भी घुमा देता है तो कुछ मिल जाते है....! 


इसको इसका खर्च जितना लेकिन अमुक लोग लोग ऐसा करने ही नहीं देते है। 

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यह  किसी को कुछ नही कहेगा भगवान की मर्जी ऐसा हो तो ऐसा ही होता है।

उस ब्राह्मण के पास ठहरने की जग्या तो है.....! 

लेकिन आवक का कोई साधन भी नही है.....! 

किराया जितना पैसा कोई न कोई भेज देता भी देगा लेकिन कोई दुशरा आवक जितना पैसा नहीं देगा। 

दुशरा आवक ही नही होगा तो भोजन भीं कहा से मिलेगा। 

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फिर उस ब्राह्मण ने कभी भी किसी के पास लंबा हाथ तो किया ही नही करता भी नही वो तो एक ही बात उसका दोस्तो को बोलता रहता है.....! 

कि भूखा रहना अच्छा है लेकिन किसी के पास हाथ लंबा नही करना भगवान मुझे इधर लाये है क्यों में सामने से तो आया नही हु ।

मगर उस ब्राह्मण ने फिर वही कहा कि हे प्रभु! 

उसकी आंखें चमक रही हैं आनंद से। 

उसके चेहरे पर फिर वही आनंद का भाव, फिर वही प्रार्थना : 

"हे प्रभु! 

प्रार्थना बड़े गहरे अनुभव से प्रकट होती है।




तेरा बड़ा धन्यवाद है। 

तू सदा मुझे जिस चीज की जरूरत होती है, पहुंचा देता है।'
 
एक दोस्त ने कहा कि अब बस, ठहरो! 

अब हद हो गई। 

जिस चीज की जरूरत होती है, पहुंचा देता है। 

और कभी कभी तीन दिन सात दिन पन्द्र दिन बिस दिन से हम भी तुम्हारे साथ हैं...! 

जिस चीज की जरूरत है, वही नहीं मिली है। 
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रोटी नहीं मिली, पानी पीकर दिन रात गुजारने को तो मिला। 

अब और क्या है ? 

मिला क्या है इतना सालों में ?

उस ब्राह्मण ने कहा, तुम बीच में मत बोलो। 

वह मेरी जरूरत का खयाल रखता है। 

इतना दिन तक भूखे रखना, इतना दिन तक भूखे रहना मेरे लिए लाभ का हुआ है। 
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इतना दिन तक भूख और अपमान खाने के बाद भी मैं प्रार्थना कर सकूं, यही मेरी जरूरत थी। 

उसने अवसर दिया। 

सुख मिले तब धन्यवाद देना तो बहुत आसान है पागलो! 




जब दुःख मिले तब धन्यवाद देने की क्षमता प्रार्थना की ही छाती में होती है।

उसने मुझे एक मौका दिया। उसने मुझे एक अवसर दिया। 

मगर मैं भी समझ गया कि अवसर क्यों दे रहा है। 

वह इसलिए दे रहा है कि अब देखूं। 

एक दिन उसने कुछ भी न दिया, भूखा रखा, फिर भी मैंने प्रार्थना की। 
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दूसरे दिन भी उसने कहा, अच्छा ठीक है, एक दिन तूने कर ली, दूसरे दिन? 

दूसरा दिन भी बीत गया, अब यह तीसरा दिन भी आ गया। 

उसने फिर एक मौका दिया कि आज तीसरा दिन फिर आ गया। 

अब तू बिल्कुल भूखा है...!
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जीर्ण — जर्जर है, गिरा पड़ता है, अब तू धन्यवाद देगा कि नहीं देगा? 

अब तो रुकेगा न? 

अब तो बंद कर देगा प्रार्थना। 

मगर मैंने कहा कि तू मुझे हरा न सकेगा। 

मैं धन्यवाद देता ही जाऊंगा। 

अंतिम घड़ी तक धन्यवाद देता चला जाऊंगा। 

जब तक श्वास है, धन्यवाद उठेगा। 

श्वास ही न रहे तो फिर बात और। 

मरते क्षण तक ओंठ पर धन्यवाद होगा। 
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तू अगर मौत भी देगा तो वह मेरी जरूरत है तो ही देगा; 

नहीं तो क्यों देगा ?

इसका नाम श्रद्धा है। 

इसका नाम प्रार्थना है। 

प्रार्थना की नहीं जाती। 

प्रार्थना बड़े गहरे अनुभव से प्रकट होती है !!
       !! एक ब्राह्मण ऐसा भी.., !!
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मीराबाई की कल्पना :

||मीराबाई की कल्पना में श्याम सुन्दर जी / राधा रानी की शक्ति ||


मीराबाई की कल्पना में श्याम सुन्दर जी....!

मीराबाई यमुना किनारे जल लेकर लौट रही है धीरे - धीरे भाव जगत में खो गयी उनके नेत्र इधर उधर निहार कर अपना धन खोज रही है । 

निराशा ,आशा उनके पद उठने नही देती। 






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निराशा कहती है की अब नही आयेंगे वो चल घर चल और आशा कहती है की यही कही होंगे अभी आ जायेंगे। 

नैन मन ठंडे कर ले मीराबाई जी सोच रही की घर जाने पर संध्या पूर्व दर्शन - लाभ की आशा नहीं! 

इसी भाव से दो पद शीघ्र और चार पद धीमे चलती जा रही थी की किसी ने उसके सर से कलशी उठा ली।




मीराबाई ने अचकचाकर उपर देखा तो एक कदम्ब पर एक हाथ से डाल पकड़े और एक हाथ में कलशी लटकाए श्याम सुन्दर जी बेठे हंस रहे हैं। 

हीरक दन्त प्रवाल अधरों की आभा पा तनिक रक्ताम्भ हो उठे है और अधरों पर दन्त पंक्ति की उज्ज्वलता झलक रही है।

नेत्रों में अचगरि जैसे मूरत हो गयी। 

लाज के मारे मीराबाई जी की द्रष्टि ठहरती नही, लजा निचे और प्रेम - उत्सुकता उपर देखने को विवश कर रही है।

कलशी से ढले पानी से वस्त्र और सर्वांग आर्द्र हैं। 

कलशी दे दो यह कहते हुए भी नहीं बन पा रहा है। 

श्याम सुन्दर जी एकदम वृक्ष से उसके समुख कूद पड़े मीराबाई जी चोंक कर चीख पड़ी साथ ही उन्हें देख कर लजा गयी।


मीराबाई की कल्पना


मीराबाई जी के गाल कर्ण लाल हो गए।

श्री श्याम सुन्दर जी बोले- 

डर गयी न ? 

उन्होंने हंस कर पूछा और हाथ पकड कर कहा चल आ थोड़ी देर बैठ कर बातें करे। 

वृक्ष ताल की एक शिला पर दोनों बैठ गए।

श्याम सुन्दर जी बोले- 

क्या लगा तुझे कोई वानर अथवा भल्लुक कूद पड़ा है न। 

श्याम सुन्दर जी ने उनकी मुखडा थोड़ी ऊँची करते हुए पूछा - 

मैं क्या करूँ । 

बोलेगी नहीं तो मैं और सताउंगो। 
+++ +++

तेरी यह मटुकिया हे न याको फोड़ दे उंगो और और का करुंगो ?

श्याम सुन्दर जी ने सोचते हुए एक दम से कहा - 

तेरी नाक खीच दुंगो और श्याम सुन्दर जी की ऐसी बातो पर मीराबाई जी को हसीं आ गयी,और श्याम सुन्दर जी भी हसने लगे!

मीराबाई से पूछा -

अभी क्या पानी भरने का समय है? 

दोपहर में घाट नितांत सुने रहते है,जो कहूँ सचमुच भल्लुक आ गयो तो ? 

मीराबाई जी बोली - 
+++ +++
तुम हो न श्याम सुन्दर जी ने कहा - 

मैं क्या यहाँ बैठा ही रहूँगा? 

गाये नहीं चरानी मुझे ?

मीराबाई जी ने सर झुकाते हुए कहा - 
+++ +++
एक बात कहूँ ? 

श्याम सुन्दर जी बोले - 

एक नहीं सॊ कह। 

पर सर तो उचा कर। 

तेरो मुख ही नहीं दिखे रहो मोहे। 

मीराबाई जी ने मुख ऊँचा किया और फिर से लाज ने आ घेरा।

श्याम सुन्दर जी ने कहा -

अच्छा ! 

अच्छा ! 

मुख निचे ही रहने दे,कह क्या बात है?

मीराबाई ने बहुत कठिनाई से बोंला- 

तुम्हे कैसे प्रसन्न किया जा सकता है ?

श्याम सुन्दर जी ने कहा - 
+++ +++
तो सखी मैं तुम्हे अप्रसन्न दिखाई दे रहा हूँ ? 

पर मेने तेरी मटकिया ले ली तो कौन्सो गंगा स्नान कराय दियो,यही ? 

मीरा यह नही !

श्याम सुन्दर जी- 

फिर कहा भयो ? 

तेरो घडोफोड़ दुंगो यही ?

मीराबाई नाय !

श्याम सुन्दर जी- 

तो फिर तू बतावे क्यों नाय ? 

कबकी यह नाय वह नाय किया जा रही है ?

मीराबाई जी ने शर्माते हुए कहा - 

सुना है तुम प्रेम से वस होते हो ?

श्याम सुन्दर जी- 

मोकु वश करके का करेगी सखी ! 

नाथ डालोगी के पैर बंदोगी ? 
+++ +++
मेरे वश हुए बिना तेरो के काज अटक्यो है भला ?

मीराबाई वो नाय।

श्याम सुन्दर जी- 

बाबा रे बाबा ! 

तो से तो भगवान ही हार जायं श्याम सुन्दर जी कहने लगे- 

कासे पूछ रयो हूँ ? 

पुरो मुख ही नाय खुले बात पूरी नाय कहोगी तो में भोरो , भारो कैसे समझुंगो ?

मीराबाई जी ने आँख मूँदकर पूरा जोर लगाकर कहा दिया - 

की सुनो श्याम सुन्दर ! 

मुझे तुम्हारे चरणों में अनुराग चाहिए। 

श्याम सुन्दर जी ने अनजान हो कर पूछा - 
+++ +++
सो कहा होय सखी ?

मीराबाई जी की विश्वता पर अपनी आखों में आँसू भर आये,घुटनों में सिर देकर रो पड़ी ।

श्याम सुन्दर जी बोले - 

रोवै मत ना ये कहते हुए अपनी बहो मे भर मीराबाई के सिर पर अपना कपोल रखते हुए कहा - 

और अनुराग कैसो होवे री ? 

श्याम सुन्दर जी ने कहा - 

अब तुम्हारे सुख की इच्छा क्या है ? 

अब तू मोको दुःख दे रही हो श्याम सुन्दर जी हंस कर दूर जा खड़े हुए.....! 

मीराबाई ने आश्चर्य से देखा। 

श्याम सुन्दर जी- 

ऐ ? 

ले अपनी कलशी बावरी कही की ये कहते हुए कलशी मीरा के सर पर रख कर वन की और दोड़ गए,और मीराबाई जी ठगी सी बैठ रही !!
             
|| मेरे तो गिरधर गोपाल ||
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राधा रानी  की शक्ति  

गोवर्धन लीला के बाद समस्त ब्रजमंडल के कृष्ण के नाम की चर्चा होने लगी.....! 

सभी ब्रजवासी कृष्ण की जय - जयकार कर रहे थे और उनकी महिमा का गान कर रहे थे। 

ब्रज के गोप - गोपियों के मध्य कृष्ण की ही चर्चा थी। 

एक स्थान पर कुछ गोप और गोपियाँ एकत्रित थी और यही चर्चा चल रही थी तभी एक गोप मधुमंगल बोला इसमें कृष्ण की क्या विशेषता है.....! 

यह कार्य तो हम लोग भी कर सकते है।

वहां राधा रानी की सखी ललीता भी उपस्थित थी वह तुरंत बोल उठी ...!

" हां हां देखी है तुम्हारी योग्यता....! 

जब कृष्ण ने पर्वत उठाया था तो तुम सभी ने अपनी - अपनी लाठियां पर्वत के नीचे लगा थी ...!

और कान्हा से हाथ हठा लेने के लिए कहा था, हाथ हठाना तो दूर कान्हा ने थोड़ी से अंगुली टेढ़ी की और तुम सब की लाठियां चटाचट टूट गई थी....! 
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तब तुम सब मिलकर यही यही बोले थे कान्हा तुम्ही संभालो....! 

तब कान्हा ने ही पर्वत संभाला था....! "

यह सुनकर मधुमंगल बोला.....! 

" हाँ हाँ मान लिया की कान्हा ने ही संभाला....! 

किन्तु हम ने प्रयास तो किया तुमने क्या किया....! "

यह सुनकर ललीता बोली....! 

" हां हां देखी है तुम्हारे कान्हा की भी शक्ति....! 

माना हमने कुछ नहीं किया किन्तु हमारी सखी राधा रानी ने तो किया....! "

मधुमंगल बोला....! 

" अच्छा जी राधा रानी ने क्या करा तनिक यह तो बताओ....! "

ललीता ने उत्तर दिया....! 
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" पर्वत तो हमारी राधा रानी ने ही उठाया था....! 

कृष्ण का तो बस नाम हो गया...! "

यह सुनकर सभी गोप सखा हंसने लगे और बोले.....! 

" लो जी अब यह राधा रानी कहाँ से आ गई....! 

पर्वत उठाया कान्हा ने....! 

हाथ दुखे कान्हा के....!

पूरे सात दिन एक स्थान पर खड़े रहे कान्हा....! 

ना भूंख की चिंता ना प्यास की....! 

ना थकान का कोई भाव....! 

ना कोई दर्द, सब कुछ किया कान्हा ने और बीच में आ गई राधा रानी....! "

तब ललीता बोली..! 

लगता है....! 

जिस समय कान्हा ने पर्वत उठाया था....! 

उस समय तुम लोग कही और थे....! 

अन्यथा तुमको भी पता चल जाता कि पर्वत तो हमारी राधा रानी ने ही उठाया था....! "

या सुनकर सभी गोप सखा बोले....! 
+++ +++
" ऐसी प्रलयकारी स्थिति में कही और जा कर हमको क्या मरना था....! 

एक कृष्ण ही तो हम सबका आश्रय थे.....! 

जिन्होंने सबके प्राणों की रक्षा की....! "

ललीता बोली....! 

" तब भी तुमको यह नहीं.....! 

पता चला कि.....! 

पर्वत हमारी राधा रानी ने उठाया था....! "

सभी गोप सखा बोले....!  

" हमने तो ऐसा कुछ भी नहीं देखा....! "

तब ललीता बोली....! 

" अच्छा यह बताओ कि.....! 

कान्हा ने पर्वत किस हाथ से उठाया था....! "

मधुमंगल बोला....!  

" कान्हा ने तो पर्वत अपने बायें हाथ से ही उठा दिया था....! 

दायें हाथ की तो आवश्यकता ही नहीं पड़ी....! "

तब ललीता बोली..! 

तभी तो में कहती हूँ की....! 
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पर्वत हमारी राधा रानी ने उठाया....! 

कृष्ण ने नहीं, यदि कृष्ण अपनी शक्ति से पर्वत उठाते तो.....! 

वह दायें हाथ से उठाते...!

किन्तु उन्होंने पर्वत बायें हाथ से उठाया....! 

क्योकि किसी भी पुरुष का दायां भाग उसका स्वयं का तथा बायाँ भाग स्त्री का प्रतीक होता है...! 

जब कान्हा ने पर्वत उठाया....! 

तब उन्होंने श्री राधा रानी का स्मरण किया और तब पर्वत उठाया...! 

इसी कारण उन्होंने पर्वत बाएं हाथ से उठाया.....! 

कृष्ण के स्मरण करने पर श्री राधा रानी ने उनकी शक्ति बन कर पर्वत को धारण किया। " 

अब किसी भी बाल गोपाल के पास ललीता के इस तर्क का कोई उत्तर नहीं था....! 

सभी निरुत्तर हो गए और ललीता राधे - राधे गुनगुनाती वहां से चली गई।

यह सत्य है....! 
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कि राधे रानी ही भगवान श्री कृष्ण की आद्यशक्ति है....! 

जब भी भगवान कृष्ण ने कोई विशेष कार्य किया पहले अपनी शक्ति का स्मरण किया....!
 
श्री राधा रानी कृष्ण की शक्ति के रूप में सदा कृष्ण के साथ रही....! 

इस लिए कहा जाता है....! 

कि श्री कृष्ण को प्राप्त करना है तो श्रीराधा रानी को प्रसन्न करना चाहिए। 

जहाँ राधा रानी होंगी वहां श्री कृष्ण स्वयं ही चले आते हैं। 

यही कारण है....! 

कि भक्त लोग कृष्ण से बन पहले राधा का नाम लेते है। 
पंडारामा प्रभु राज्यगुरू 
( द्रविड़ ब्राह्मण )
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विभीषण की शरणागति , अयोध्या का वह सिद्ध स्थान :

विभीषण की शरणागति , अयोध्या का वह सिद्ध स्थान : || विभीषण की शरणागति || विभीषण,जिसने भाई खोया,प्रभु पाए,     पर स्मृति से ओझल हो गया..! राम...

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