सखियों के श्याम , अग्नि की उत्पत्ति कथा :
श्रीहरिः
सखियों के श्याम
(जात न पूछे कोय)
पर यह कौन है ?' – मेरे प्रश्न करते ही वह उठकर खड़ी हो गयी और भागनेको उद्यत हुई तो मैंने बाँह थाम ली।
'कौन जाने उनकी उन कजरारी अंखियोंने कहाँ-कहाँ किस-किसको घायल किया हैं।' — मैंने मनमें कहा।
'कौन हो, यहाँ ऐसे कैसे पड़ी थी? क्या नाम है ?'— मैंने पूछा ।
'कुछ नहीं।' — उसने सिर हिलाकर बताया, किंतु आँखोंमें भरे आँसू न चाहते भी छलक पड़े।
'मुझसे न कहेगी सखी!'
'कहा कहूँ ?' उसका कंठ इतना ही कहते रुद्ध हो गया और दो धारायें कपोलोंसे उतर वक्षावरण भिगोने लगीं।
eSplanade - Latón Radha Krishna - Tamaño grande - Escultura de estatua de ídolo de Radha de latón (21 pulgadas) (Radha Antique)
'यहाँ तो कू व्रजराज कुँअर मिले हते ?"
उसने 'हाँ' में सिर हिलाया।
'आ, यहाँ आकर बैठ सखी! हम दोनों एक ही रोगकी रोगिणी है, एक दूजेसे बात कर मन को ठंडो करें।
उनकी चर्चा तें सुख मिले सखी! तेरो नाम कहा है? - कहते हुए मैं उसी पाहनपर बैठ गयी और अपने समीप ही उसे बिठाने लगी।
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'ऐसी अनीति न करें स्वामिनी!'– वह मेरे पैरोंपर गिर पड़ी। मैंने उसे उठाकर अपनेसे लगा लिया।
पीठपर हाथ फेरते हुए पूछा— 'अपनो नाम नहीं बतायेगी ?'
'कंका है मेरो नाम।'
'कब, कैसे मिले श्यामसुन्दर, कहा कही ?'
उसने एक बार अपने जलपूर्ण नेत्र उठाकर भोली और शंका भरी दृष्टिसे मेरी ओर देखा।
मैंने मुस्कराकर स्नेहपूर्ण दृष्टिसे देखा तो वह पलकें झुकाकर कुछ कहने को उद्यत हुई, किंतु होठ थोड़े हिलकर रह गये।
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'कंका, बोलेगी नहीं ?
कह देनेसे मनका ताप हलका हो जाता है सखी!
हम सब यही तो करती है।
इसी मिस उनकी चर्चा होती है।'
ताप हलका हो, यही तो मैं नहीं चाहती।
इस तपनमें बहुत सुख है स्वामिनी।
पर आप कहती है कि चर्चा होगी; उसका लोभ भी कम नहीं है।"
उसने कहा।
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एक क्षणके लिये मैं उसकी बात सुन चकित रह गयी। वह ताप सुखदायी है यह सब जानती है, पर वह मिटे यही तो हमारी कामना रही है।
यह तो मिटानेकी कौन कहे! घटानेकी बात भी नहीं सोचना चाहती।
'पुनः उनके दर्शन हों और यह अदर्शनका ताप मिटे, नहीं चाहती तुम ?'
— मैंने पूछा।
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'ऐसा कौन न चाहेगा ? किंतु जबतक वह सम्भव नहीं है, यह ताप — उनका स्मरण ही तो मेरा धन है।
फिर मेरा ऐसा भाग्य कहाँ ...... ......l' — उसका गला पुनः रूँध गया।
'वे कहाँ कैसे मिले तुझे? क्या बात की ?'
मैं एक दिन इन जटाओंको बाँधकर झूला झूल रही थी कि उन्होंने पीछेसे आकर झूलेके साथ ही मेरा हाथ पकड़ लिया जिससे एकदम भाग न सकूँ।
मैं चौंककर खड़ी हो गयी।
उन्होंने कहा— 'मुझे भी अपने साथ झुलावेगी ?'
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इतनी देरमें तो मैं अपने आपको ही भूल गयी थी! वह रूप, स्पर्श और फिर वह मधुर स्वर व मुस्कान और... और.... वह चित....वनि.... !
कंका पुनः मौन हो गयी।
'ए कंका! फिर क्या हुआ?
क्या कहा तुने ?"
हाँ, उसने चौंककर मेरी ओर देखा।
मेरे मुखसे बोल नहीं फूटा तो वे स्वयं ही झूलेपर बैठ गये और हाथ थामकर मुझे भी अपने समीप बिठा लिया। हम दोनों झूलने लगे।
उनकी अं....ग..... सु... वा.... स...। – कंकाने साँस खींची।
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‘फिर ?'– मैंने शीघ्रतासे पूछा कि वह कहीं फिर स्मृतिके समुद्रमें डूबकि न लगा जाय।
"तेरो नाम कहा है री ?"
'कंका!'
'कंस तो नाय ?'– वे खुलकर हँस पड़े।
ले खायेगी ?'– उन्होंने फेंटसे आम्रफल निकालकर मुझे दिया, तभी मुझे स्मरण आया— कुछ मधुर फल फूल और अंकुर मैंने संग्रह किये हैं।
मैं वह लानेके लिये उठी तो उन्होंने बाँह थाम ली— 'कहाँ जाती है?'
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मैंने वृक्षकी खोडरकी ओर संकेत किया। दोना लाकर उनके हाथ में धमाया तो बोले— 'यह क्या है? क्या करूँ इसका?'
मैंने एक फल उठाकर उनके मुखमें दिया तो खाते हुए बोले— 'अहा यह तो बहुत स्वादिष्ट है।'
सब खाकर बोले— 'ले मैं तो सब खा गया, अब तू क्या खायेगी ?
'मैं और ले आऊँगी। तुम्हें रुचे ये? मैं नित्य ही ला दिया करूँगी।'
'सच! बहुत अच्छे हैं। और ला देगी तो मैं दादाके— सखाओंके लिये भी ले जाऊँगा। कल ला देगी ?"
'कल क्यों, अभी ला दूंगी।'– मैं चलने लगी तो उन्होंने फिर रोक दिया।
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'आज नहीं! अभी तो बहुत आतप है, कल लाना।
चल अभी तो अपने खेलें।'
मेरा हाथ पकड़कर वे उस ओर ले गये।
वहाँ भूमिपर लकीरें खींचकर हमने चौकोर घर बनाये।
पत्थरके टुकड़ेको फेंक एक पैरपर चलते उस टुकड़ेको ठोकरसे खिसकाते हुए खेलने लगे।
पहले तो मुझे कुछ संकोच लगा किंतु जब अच्छी तरह खेलने लगी तो वे हार गये।
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कंकाने मेरी ओर देखकर लज्जासे सिर झुका लिया। मैं थोड़ा—सा हँस दी।
'जिसने त्रिविक्रम बनकर दो पदमें ही त्रिलोककी नाप लिया था, वह अपनी ठोकरसे नन्हे पाषाण खंडको नहीं खिसका पाया।' —मनमें कहा।
'फिर?" — उपरसे पूछा।
'फिर नित्य ही मैं मूल— फल— अंकूर लाती और यहाँ प्रतिक्षा करती।
वे आते अपने साथ कोई फल, कभी कोई मोदक अथवा मिष्ठान लिये आते मुझे देते।
मेरी लायी हुई वस्तुओंमें—से कुछ खाते—सराहते और फिर हम खेलते।
वे अधिकाँश हारते ही थे।
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धीरे—धीरे मेरे मनमें यह बात समा गयी कि कुअंर जू को खेलना आता ही नहीं और वे मेरे बिना रह नहीं सकते।
मैं छिप जाती तो वे ढूंढते–ढूढ़ते आकुल हो उठते।'
एक दिन मैं छिपी ही रही और उनकी आकूलताका आनंद लेती रही।
वे उदास होकर चले गये और उसके दूसरे दिन वे आये ही नहीं।
मैं फल—मूल संग्रहकर रही थी कि मुख्य पथकी ओर पशु—पक्षियोंका सम्मलित आर्तनाद सुना, साथ ही रथकी थरथराहट भी।
दौड़कर उस ओर गयी देखा सारे पशु—पक्षी वनके छोरपर एकत्रित हो क्रन्दनकर रहे हैं।
एक रथ पथपर बढ़ रहा है।
उसमें कुअंर जू अपने दादाके संग बिराजे हैं, रथ मथुराकी ओर जा रहा है।
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'मेरे हाथसे दोना छूटकर गिर पड़ा....।
तबसे नित्य यहाँ आकर पथ जोहती हूँ।
क्या वे अबतक नहीं आये! मुझ पापिनीने उन्हें सताया था.... इसीसे.... वे सबको छोड़कर चले गये। मेरे कारण.... सबको ..... दुःख.... पहुँचा....।
स्वामिनी ! आप मुझे धिक्कारो— ताड़ना दो सबके दुःखका कारण मैं हूँ... मैं... हूँ।'—
कंका बिलखकर रोने लगी।
मैंने उसे गले लगा लिया— ‘रो मत बहिन! हम सब ऐसा ही सोचती है कि हमारे अपराधके कारण वे चले गये, किंतु अपनों का अपराध देखना उन्हें कभी आया ही नहीं।
वे आयेंगे, निज जनों से दूर कैसे रह पायेंगे ?
तू धीरज धर ।'
उसने फल-मूल अंकुरका दोना लाकर मुझे थमा दिया — 'यह ले जायँ आप, मैं नित्य पहुँचा दूँगी।
वे आयें तो उन्हें देकर कहें— कंका अपराधिनी है, उसे अपने ही हाथसे दंड देवें, किंतु यह स्वीकार करें।'
'अच्छा बहिन! कह दूँगी, उन्हें साथ लेकर यहाँ आऊँगी। वे तो भूल ही चुके होंगे, आवें तो वे ही स्वयं तुझसे माँग—माँगकर खायेंगे।
तू चिन्ता न कर, उनके आने भरकी देर है, सम्पूर्ण व्रजमें जीवन दौड़ जावेगा।'— कहते हुए मैं वह दोना लेकर चल पड़ी।
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मैं तो नित्य ही यहाँ आती थी, अपराह्न ढलनेपर ही जाती, वे मेरे साथ बने रहते।
कभी इसे देखा नहीं यहाँ और इसका कहना है— नित्य आती थी।
उनकी लीला कौन जाने! देश और काल दोनों सापेक्ष है और उनके इंगितपर संचालित होते हैं।
'कैसी ब्रह्मविद्या है री तू ?'
एक दिन उन्होंने कहा था—'कुछ भी समझमें नहीं आता तुझे, छोटा-सा विनोद भी नहीं समझती, रोने बैठ जाती है।'
'हाँ प्रभु ! आप निखिल ब्रह्माण्ड नायकको जब ऊखलमें बंधे रोते देखा, माखन चुरा — चुराकर खाते देखा, गोबरकी बिन्दियोंसे मुख भरे देखा, गोष्ठमें चुल्लू भर छाछके लिये नाचते देखा तो लगा, श्रुतियाँ नेति—नेति कह क्या इनका ही बखान करती है?
यही वेदके प्रतिपाद्य विषय है ?
महाकाल और मायाको भयभीत और भ्रू संकेतसे नियमित करनेवाले क्या यही है ?'
'बस, बस।' उन्होंने मेरे मुखपर हाथ रख दिया– 'यह ब्रज है सखी!
और मैं नंदकुमार।
अखिल ब्रह्माण्ड नायक बेचारा कहीं जाकर दुबक गया होगा।
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इसी प्रकार यह दासी भी केवल पूर्ण गोपकी कन्या विद्या है।
ब्रह्मविद्या व्रजमें क्या करेगी श्यामसुन्दर !
बारम्बार उसका नाम लेकर क्यों उकसाते हो ?'
'मैं केवल स्मरण करवा रहा
हूँ जिसके लिये तूने तप किया था, वह उद्देश्य पूरा हुआ कि नहीं ?"
'मैं धन्य हुई।
मैं ही क्या श्यामसुन्दर !
यह मुक्ति, श्रुतियाँ और न जाने कितने ऋषि, कितने प्रेमैक प्राण तुम्हें पाकर कृतार्थ हुए हैं।
तुम्हारी अनुकम्पाकी इति नहीं है।
कभी किसीने सोचा था कि ब्रह्म यों गोप कुमार बना गायोंके संग डोलेगा ?'
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'जाने दे विद्या! यह चर्चा इस रसधाममें अप्रिय लगती है।
यह स्तुति किसी अन्य समय लिये उठा रख।'
'ठीक है, किंतु मुझे फिर कभी ब्रह्मविद्याकी याद न दिलाना अन्यथा.... ।' — मैं हँस पड़ी।
'तो तू मुझसे बदला ले रही थी, ठहर तो बंदरिया कहीं की!'
श्याम जू मुझे पकड़ने दौड़े तो मैं हँसती हुई घरकी ओर दौड़ गयी थी।
जय श्री राधे....
श्री राधे
महाभारत के अनुसार :
देवताओं को जब पार्वती से शाप मिला था कि वे सब सन्तानहीन रहेंगे, तब अग्निदेव वहाँ पर नहीं थे।
कालान्तर में विद्रोहियों को मारने के लिए किसी देवपुत्र की आवश्यकता हुई।
अत: देवताओं ने अग्नि की खोज आरम्भ की। अग्निदेव जल में छिपे हुए थे।
मेढ़क ने उनका निवास स्थान देवताओं को बताया।
अत: अग्निदेव ने रुष्ट होकर उसे जिह्वा न होने का शाप दिया।
देवताओं ने कहा कि वह फिर भी बोल पायेगा।
अग्निदेव किसी दूसरी जगह पर जाकर छिप गए।
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हाथी ने देवताओं से कहा-अश्वत्थ ( सूर्य का एक नाम ) अग्नि रूप है।
अग्नि ने उसे भी उल्टी जिह्वा वाला कर दिया।
इसी प्रकार तोते ने शमी में छिपे अग्नि का पता बताया तो वह भी शापवश उल्टी जिह्वा वाला हो गया।
शमी में देवताओं ने अग्नि के दर्शन करके तारक के वध के निमित्त पुत्र उत्पन्न करने को कहा।
अग्नि देव शिव के वीर्य का गंगा में आधान करके कार्तिकेय के जन्म के निमित्त बने।
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भृगु पत्नी पुलोमा का पहले राक्षस पुलोमन से विवाह हुआ था।
जब भृगु अनुपस्थित थे, वह पुलोमा को लेने आया तो उसने यज्ञाग्नि से कहा कि वह उसकी है या भृगु की भार्या।
उसने उत्तर दिया कि यह सत्य है कि उसका प्रथम वरण उसने ( राक्षस ) ही किया था, लेकिन अब वह भृगु की पत्नी है।
जब पुलोमन उसे बलपूर्वक ले जा रहा था, उसके गर्भ से 'च्यवन' गिर गए और पुलोमन भस्म हो गया।
उसके अश्रुओं से ब्रह्मा ने 'वसुधारा नदी' का निर्माण किया।
भृगु ने अग्नि को शाप दिया कि तू हर पदार्थ का भक्षण करेगी।
शाप से पीड़ित अग्नि ने यज्ञ आहुतियों से अपने को विलग कर लिया, जिससे प्राणियों में हताशा व्याप्त हो गई।
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ब्रह्मा ने उसे आश्वासन दिया कि वह पूर्ववत् पवित्र मानी जाएगी।
सिर्फ़ मांसाहारी जीवों की उदरस्थ पाचक अग्नि को छोड़कर उसकी लपटें सर्व भक्षण में समर्थ होंगी।
अंगिरस ने अग्नि से अनुनय किया था कि वह उसे अपना प्रथम पुत्र घोषित करें, क्योंकि ब्रह्मा द्वारा नई अग्नि स्रजित करने का भ्रम फैल गया था।
अंगिरस से लेकर बृहस्पति के माध्यम से अन्य ऋषिगण अग्नि से संबद्ध रहे हैं।
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हरिवंश पुराण के अनुसार :
असुरों के द्वारा देवताओं की पराजय को देखकर अग्नि ने असुरों को मार डालने का निश्चय किया। वे स्वर्गलोक तक फैली हुई ज्वाला से दानवों की दग्ध करने लगे।
मय तथा शंबरासुर ने माया द्वारा वर्षा करके अग्नि को मंद करने का प्रयास किया, किन्तु बृहस्पति ने उनकी आराधना करके उन्हें तेजस्वी रहने की प्रेरणा दी।
फलत: असुरों की माया नष्ट हो गई।
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जातवेदस् नामक अग्नि का एक भाई था।
वह हव्यवाहक ( यज्ञ - सामग्री लाने वाला ) था।
दिति - पुत्र ( मधु ) ने देवताओं के देखते - देखते ही उसे मार डाला।
अग्नि गंगाजल में आ छिपा।
देवता जड़वत् हो गए।
अग्नि के बिना जीना कठिन लगा तो वे सब उसे खोजते हुए गंगाजल में पहुँचे।
अग्नि ने कहा, भाई की रक्षा नहीं हुई, मेरी होगी, यह कैसे सम्भव है ?
देवताओं ने उसे यज्ञ में भाग देना आरम्भ किया।
अग्नि ने पूर्ववत् स्वर्गलोक तथा भूलोक में निवास आरम्भ कर दिया।
देवताओं ने जहाँ अग्नि प्रतिष्ठा की, वह स्थान अग्नितीर्थ कहलाया।
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दक्ष की कन्या ( स्वाहा ) का विवाह अग्नि ( हव्यवाहक ) से हुआ।
बहुत समय तक वह नि:सन्तान रही।
उन्हीं दिनों तारक से त्रस्त देवताओं ने अग्नि को सन्देशवाहक बनाकर शिव के पास भेजा।
शिव से देवता ऐसा वीर पुत्र चाहते थे, जो कि तारक का वध कर सके।
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पत्नी के पास जाने में संकोच करने वाले अग्नि ने तोते का रूप धारण किया और एकान्तविलासी शिव-पार्वती की खिड़की पर जा बैठा।
शिव ने उसे देखते ही पहचान लिया तथा उसके बिना बताये ही देवताओं की इच्छा जानकर शिव ने उसके मुँह में सारा वीर्य उड़ेल दिया।
शुक (अग्नि ) इतने वीर्य को नहीं सम्भाल पाए।
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उसने वह गंगा के किनारे कृत्तिकाओं में डाल दिया, जिनसे कार्तिकेय का जन्म हुआ।
थोड़ा - सा बचा हुआ वीर्य वह पत्नी के पास ले गया।
उसे दो भागों में बाँटकर स्वाहा को प्रदान किया, अत: उसने ( स्वाहा ने ) दो शिशुओं को जन्म दिया।
पुत्र का नाम सुवर्ण तथा कन्या का नाम सुवर्णा रखा गया।
मिश्र वीर्य सन्तान होने के कारण वे दोनों व्यभिचार दोष से दूषित हो गए।
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सुवर्णा असुरों की प्रियाओं का रूप बनाकर असुरों के साथ घूमती थी तथा सुवर्ण देवताओं का रूप धारण करके उनकी पत्नियों को ठगता था।
सुर तथा असुरों को ज्ञात हुआ तो उन्होंने दोनों को सर्वगामी होने का शाप दिया।
ब्रह्मा के आदेश पर अग्नि ने गोमती नदी के तट पर, शिवाराधना से शिव को प्रसन्न कर दोनों को शापमुक्त करवाया।
वह स्थान तपोवन कहलाया।
पंडारामा प्रभु राज्यगुरु