भगवान शिव ने एक बाण से किया था :

भगवान शिव ने एक बाण से किया था :

तारकासुर के तीन पुत्रों को कहा जाता है त्रिपुरासुर, भगवान शिव ने एक बाण से किया था तीनों का वध :

तीनों असुरों ने अमरता का वरदान मांगा...! 

लेकिन ब्रह्मा जी ने ये वरदान देने से मना कर दिया, ब्रह्मा जी ने कहा कि जिसने जन्म लिया है...! 

उसकी मृत्यु अवश्य होगी, ऐसा वरदान देना सृष्टि के नियमों के विरुद्ध है।

इसे त्रिपुरारी पूर्णिमा और देव दीपावली भी कहते हैं। 

मान्यता है कि इसी तिथि पर भगवान शिव ने असुर तारकासुर के तीन पुत्रों - तरकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली का वध किया था। 

इन तीनों असुरों को ही त्रिपुरासुर कहा जाता है। 

त्रिपुरासुर का वध कार्तिक पूर्णिमा पर हुआ था...! 

इस कारण यह तिथि त्रिपुरारी पूर्णिमा कहलाती है।

इसके बाद तीनों असुरों ने सोच - विचार करके दूसरा वरदान मांगा। 

उन्होंने कहा कि आप हमारे लिए तीन पुरियां ( नगर ) बनाएं...! 

एक स्वर्ग में, एक आकाश में और एक पृथ्वी पर। 

जब युगों में एक बार ये तीनों पुरियां एक सीधी रेखा में आ जाएं...! 

तब कोई एक ही बाण से इन तीनों पुरियों को नष्ट करे, तब ही हमारी मृत्यु हो।





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भगवान शिव ने किया था त्रिपुरासुर का वध :


ब्रह्मा जी ने उनको मनचाहा वरदान दे दिया। 

इस वरदान के बाद इन तीनों असुरों को त्रिपुरासुर नाम मिला। 

वरदान के प्रभाव से तीनों असुर अजय हो गए...! 

कोई भी देवता इन्हें पराजित नहीं कर पा रहा था।

ज्योतिषाचार्य पं. पड़ारामा प्रभु राज्यगुरु के अनुसार, कार्तिक पूर्णिमा का संबंध भगवान शिव से है। 

मान्यता है कि इसी तिथि पर भगवान शिव ने त्रिपुरासुर नामक राक्षस का वध किया था। 
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इस कारण इस तिथि को त्रिपुरारी पूर्णिमा कहा जाता है। 

ये तिथि धर्म की अधर्म पर विजय का प्रतीक मानी जाती है।

भगवान शिव ने किया था त्रिपुरासुर का वध, नदी किनारे दीपक जलाने की परंपरा, जानिए कार्तिक पूर्णिमा से जुड़ी खास बातें :

उन्होंने तीनों लोकों स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल पर अधिकार कर लिया। 

देवता, ऋषि और साधु - संत त्रिपुरासुर से परेशान थे। 

तब सभी देवता और ऋषि भगवान शिव से मदद मांगने पहुंचे। 

तब भगवान शिव सृष्टि की रक्षा के त्रिपुरासुर से युद्ध करने के लिए तैयार हो गए।

मान्यता - देव दीपावली पर देवता मनाते हैं दीपोत्सव :


जैसे कार्तिक अमावस्या को मनुष्य दीपावली मनाते हैं...! 

वैसे ही कार्तिक पूर्णिमा को देवता दीपावली मनाते हैं। 

जब शिव जी ने त्रिपुरासुर का वध किया था...! 
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तब शिव जी का स्वागत करने के लिए देवताओं ने दीप जलाए थे। 

मान्यता है कि इस दिन समस्त देवता पृथ्वी पर आते हैं गंगा तटों पर दीप प्रज्ज्वलित करते हैं।

नदी स्नान और दीपदान करने की परंपरा :


कार्तिक पूर्णिमा नदी स्नान करने की परंपरा है। 

इस दिन कार्तिक मास के स्नान भी समाप्त होते हैं। 

कई भक्त पूरे कार्तिक मास में नदी स्नान करते हैं और पूर्णिमा के दिन इस मास का अंतिम स्नान किया जाता है। 
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पूर्णिमा पर सूर्यास्त के बाद नदी के किनारे दीपदान करने की परंपरा है। 

भक्त जल में दीप प्रवाहित कर भगवान विष्णु और शिव का ध्यान करते हैं। 

जो लोग नदी तक नहीं पहुंच पाते हैं, वे घर में ही गंगाजल मिलाकर स्नान कर सकते हैं। 

धार्मिक मान्यता के अनुसार, ऐसा करने से तीर्थ - स्नान के समान पुण्य प्राप्त होता है।

कथा पढ़े-सुनें और पूजन-दान करें :


देव दीपावली पर प्रातःकाल सूर्यदेव को अर्घ्य देने का विशेष महत्व है। 

इस के लिए तांबे के लोटे में जल, कुमकुम, चावल और पुष्प डालकर ॐ सूर्याय नमः मंत्र का जप करते हुए अर्घ्य अर्पित करना चाहिए।
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इस दिन भगवान सत्यनारायण की कथा का पढ़नी - सुननी चाहिए। 

साथ ही, जरूरतमंद लोगों को फल, अनाज, दाल, चावल और गर्म वस्त्रों का दान करना चाहिए।

दीपदान से पहले दीपक की पूजा करनी चाहिए। 






घी या तेल का दीप जलाकर उसे नदी किनारे प्रवाहित किया जा सकता है या नदी किनारे रखा जा सकता है। 

यदि घर में दीपदान करना हो तो दीपक को आंगन, तुलसी के पास या मंदिर में रखकर भगवान विष्णु का ध्यान करना चाहिए।

कार्तिक पूर्णिमा प्रकाश, भक्ति और सेवा का पर्व है। 

देव दीपावली हमें ये संदेश देती है कि अंधकार चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो, भक्ति और ज्ञान का प्रकाश उसे अवश्य मिटा देता है। 
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श्रद्धा, स्नान, दीपदान और दान - पुण्य के माध्यम से ये पर्व जीवन में सद्भाव, शांति और समृद्धि का संचार करता है।

उन्होंने तीनों लोकों स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल पर अधिकार कर लिया। 

देवता, ऋषि और साधु - संत त्रिपुरासुर से परेशान थे। 

तब सभी देवता और ऋषि भगवान शिव से मदद मांगने पहुंचे। 

तब भगवान शिव सृष्टि की रक्षा के त्रिपुरासुर से युद्ध करने के लिए तैयार हो गए।

जब त्रिपुरासुर की तीनों पुरियां एक सीध में आ गईं, तब भगवान शिव ने एक ही बाण से तीनों पुरियों को खत्म कर दिया। 

तीनों पुरियों के खत्म होते ही तारकासुर के तीनों पुत्र यानी त्रिपुरासुर का भी अंत हो गया। 

इस के बाद भगवान शिव के स्वागत के लिए सभी देवताओं ने दीपक जलाए थे। 

इस कथा के कारण ही भगवान शिव को त्रिपुरारी भी कहा जाता है। 

मान्यता है कि जिस दिन ये घटना हुई, उस दिन कार्तिक पूर्णिमा तिथि ही थी।

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कार्तिक पूर्णिमा पर करें ये शुभ काम :


कार्तिक मास का नाम भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय स्वामी के नाम पर रखा गया है। 

इस लिए इस पूर्णिमा को कार्तिकेय स्वामी की विशेष पूजा जरूर करें।

पूजा की शुरुआत में प्रथम पूज्य भगवान गणेश का पूजन करें, इसके बाद कार्तिकेय स्वामी का जल, दूध और पंचामृत से अभिषेक करें। 

मौसमी फल और मिठाई का भोग लगाएं। 

दीपक जलाएं, धूप अर्पित करें और ऊँ श्री स्कंदाय नमः मंत्र का जप करें। 

स्कंद, कार्तिकेय स्वामी का ही एक नाम है।

पूर्णिमा पर भगवान शिव की भी विशेष पूजा करें। 

शिवलिंग पर जल, दूध और पंचामृत अर्पित करें। 

बिल्वपत्र, धतूरा, आंकड़े के फूल, चंदन और हार - फूल से शिवलिंग का श्रृंगार करें। 
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मीठा भोग चढ़ाएं। 

भगवान शिव की आरती करें और ॐ नमः शिवाय मंत्र का जप करें।

पूर्णिमा तिथि पर भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी की भी पूजा करनी चाहिए। 

इस दिन भगवान विष्णु का दक्षिणावर्ती शंख से अभिषेक करें और ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जप करें। 

पूजा में शंख, कमल और तुलसी जरूर रखें। 

तुलसी के पत्तों के साथ खीर का भोग लगाएं।

इस दिन सत्यनारायण भगवान की कथा भी पढ़नी - सुननी चाहिए। 

सत्यनारायण भी श्रीहरि का ही एक स्वरूप है। 

ये स्वरूप जीवन में सत्य को अपनाने का संदेश देता है।

कार्तिक पूर्णिमा के दिन पवित्र नदियों गंगा, यमुना, नर्मदा, गोदावरी, शिप्रा या किसी भी पवित्र जलाशय में स्नान कर सकते हैं। 

स्नान के बाद नदी किनारे दान करें।

सूर्यास्त के बाद नदी किनारे दीपदान करें। 

नदी किनारे नहीं जा सकते तो घर के आंगन में ही दीपक जलाएं।





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कथा पढ़े - सुनें और पूजन - दान करें :


देव दीपावली पर प्रातःकाल सूर्यदेव को अर्घ्य देने का विशेष महत्व है। 

इस के लिए तांबे के लोटे में जल, कुमकुम, चावल और पुष्प डालकर ॐ सूर्याय नमः मंत्र का जप करते हुए अर्घ्य अर्पित करना चाहिए।

इस दिन भगवान सत्यनारायण की कथा का पढ़नी-सुननी चाहिए। 

साथ ही, जरूरतमंद लोगों को फल, अनाज, दाल, चावल और गर्म वस्त्रों का दान करना चाहिए।
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दीपदान से पहले दीपक की पूजा करनी चाहिए। 

घी या तेल का दीप जलाकर उसे नदी किनारे प्रवाहित किया जा सकता है या नदी किनारे रखा जा सकता है। 

यदि घर में दीपदान करना हो तो दीपक को आंगन, तुलसी के पास या मंदिर में रखकर भगवान विष्णु का ध्यान करना चाहिए।

कार्तिक पूर्णिमा प्रकाश, भक्ति और सेवा का पर्व है। 

देव दीपावली हमें ये संदेश देती है कि अंधकार चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो, भक्ति और ज्ञान का प्रकाश उसे अवश्य मिटा देता है। 

श्रद्धा, स्नान, दीपदान और दान - पुण्य के माध्यम से ये पर्व जीवन में सद्भाव, शांति और समृद्धि का संचार करता है।
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