श्री महाभारत - डुण्डुभ की आत्मकथा :

श्री महाभारत  , संक्षिप्त श्रीस्कन्द महापुराण

श्रीमहाभारतम् 

।। श्रीहरिः ।।  श्रीगणेशाय नमः ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।

(( पौलोमपर्व )) एकादशोऽध्यायः

डुण्डुभ की आत्मकथा तथा उसके द्वारा रुरु को अहिंसा का उपदेश...!

शास्त्रोक्त कथा — डुण्डुभ का पूर्वजन्म और अहिंसा का रहस्य...!

प्रामाणिकता की बात: यह प्रसंग महाभारत के आदिपर्व के पौलोमपर्व में आता है। 

इस में रुरु, प्रमद्वरा और डुण्डुभ का संवाद है।

डुण्डुभ उवाच

सखा बभूव मे पूर्वं खगमो नाम वै द्विजः । 
भृशं संशितवाक् तात तपोबलसमन्वितः ।। १ ।। 
स मया क्रीडता बाल्ये कृत्वा तार्णं भुजङ्गमम् । 
अग्निहोत्रे प्रसक्तस्तु भीषितः प्रमुमोह वै ।। २ ।।




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नीचे कथा का आधार मूल महाभारत है; जहाँ व्याख्या और आध्यात्मिक अर्थ दिए गए हैं, उन्हें मूल श्लोक का अक्षरशः उद्धरण न समझें। 

डुण्डुभ के पूर्वजन्म की कथा और उसका रुरु को उपदेश विशेष रूप से अध्याय 9 में मिलता है।

डुण्डुभने कहा-तात ! पूर्वकालमें खगम नामसे प्रसिद्ध एक ब्राह्मण मेरा मित्र था। 

वह महान् तपोबलसे सम्पन्न होकर भी बहुत कठोर वचन बोला करता था। 

एक दिन वह अग्निहोत्रमें लगा था। 

मैंने खिलवाड़में तिनकोंका एक सर्प बनाकर उसे डरा दिया। 

वह भयके मारे मूर्च्छित हो गया ।। १-२ ।।

लब्ध्वा स च पुनः संज्ञां मामुवाच तपोधनः ।
निर्दहन्निव कोपेन सत्यवाक् संशितव्रतः ।। ३ ।।

फिर होशमें आनेपर वह सत्यवादी एवं कठोरव्रती तपस्वी मुझे क्रोधसे दग्ध - सा करता हुआ बोला- ।। ३ ।।

यथावीर्यस्त्वया सर्पः कृतोऽयं मद्विभीषया ।
तथावीर्यो भुजङ्गस्त्वं मम शापाद् भविष्यसि ।। ४ ।।

'अरे! तूने मुझे डरानेके लिये जैसा अल्प शक्तिवाला सर्प बनाया था, मेरे शापवश ऐसा ही अल्पशक्तिसम्पन्न सर्प तुझे भी होना पड़ेगा' ।। ४ ।।

तस्याहं तपसो वीर्यं जानन्नासं तपोधन ।
भृशमुद्विग्नहृदयस्तमवोचमहं तदा ।। ५ ।।

प्रणतः सम्भ्रमाच्चैव प्राञ्जलिः पुरतः स्थितः ।
सखेति सहसेदं ते नर्मार्थ वै कृतं मया ।। ६ ।।

क्षन्तुमर्हसि मे ब्रह्मन् शापोऽयं विनिवर्त्यताम् ।
सोऽथ मामब्रवीद् दृष्ट्वा भृशमुद्विग्नचेतसम् ।। ७ ।।

मुहुरुष्णं विनिःश्वस्य सुसम्भ्रान्तस्तपोधनः ।
नानृतं वै मया प्रोक्तं भवितेदं कथंचन ।। ८ ।।

पौलोमपर्व में अहिंसा का प्रवेश ;


महाभारत के आदिपर्व में पौलोमपर्व का एक महत्वपूर्ण प्रसंग रुरु और प्रमद्वरा से संबंधित है। 

रुरु भृगुवंशी ऋषि का पुत्र था। 

उसका विवाह प्रमद्वरा से निश्चित हुआ था, परंतु एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना से प्रमद्वरा का जीवन संकट में पड़ गया। 

रुरु के प्रेम, तप और पुण्य के प्रभाव से उसका जीवन पुनः प्राप्त हुआ।

इस घटना के बाद रुरु के मन में सर्पों के प्रति अत्यंत क्रोध उत्पन्न हुआ। 

वह सर्पों को देखते ही उन्हें मारने लगा। 

उसके मन में यह विचार था कि सर्पों ने उसके जीवन में दुख उत्पन्न किया है, इस लिए उनका विनाश उचित है।

यहीं से महाभारत का यह गहरा प्रश्न सामने आता है: 

क्या एक जीव के अपराध के कारण उसी जाति के सभी जीवों को मारना धर्म कहलाएगा? 

क्या दुःख से उत्पन्न क्रोध मनुष्य को धर्म का मार्ग दिखाता है या हिंसा के अंधकार में ले जाता है ?

तपोधन ! 


मैं उसकी तपस्याका बल जानता था, अतः मेरा हृदय अत्यन्त उद्विग्न हो उठा और बड़े वेगसे उसके चरणोंमें प्रणाम करके, हाथ जोड़, सामने खड़ा हो, उस तपोधन से बोला-सखे ! 

मैंने परिहासके लिये सहसा यह कार्य कर डाला है। 

ब्रह्मन् ! इसके लिये क्षमा करो और अपना यह शाप लौटा लो। 

मुझे अत्यन्त घबराया हुआ देखकर सम्भ्रममें पड़े हुए उस तपस्वीने बार - बार गरम साँस खींचते हुए कहा- 'मेरी कही हुई यह बात किसी प्रकार झूठी नहीं हो सकती' ।। ५-८ ।।

यत्तु वक्ष्यामि ते वाक्यं शृणु तन्मे तपोधन । 
श्रुत्वा च हृदि ते वाक्यमिदमस्तु सदानघ ।। ९ ।।

'निष्पाप तपोधन ! इस समय मैं तुमसे जो कुछ कहता हूँ, उसे सुनो और सुनकर अपने हृदयमें सदा धारण करो ।। ९ ।।

उत्पत्स्यति रुरुर्नाम प्रमतेरात्मजः शुचिः ।
तं दृष्ट्वा शापमोक्षस्ते भविता नचिरादिव ।। १० ।।

'भविष्यमें महर्षि प्रमतिके पवित्र पुत्र रुरु उत्पन्न होंगे, उनका दर्शन करके तुम्हें शीघ्र ही इस शापसे छुटकारा मिल जायगा' ।। १० ।।

स त्वं रुरुरिति ख्यातः प्रमतेरात्मजोऽपि च ।
स्वरूपं प्रतिपद्याहमद्य वक्ष्यामि ते हितम् ।। ११ ।।

जान पड़ता है तुम वही रुरु नामसे विख्यात महर्षि प्रमतिके पुत्र हो। 
अब मैं अपना स्वरूप धारण करके तुम्हारे हितकी बात बताऊँगा ।। ११ ।।

स डौण्डुभं परित्यज्य रूपं विप्रर्षभस्तदा ।
स्वरूपं भास्वरं भूयः प्रतिपेदे महायशाः ।। १२ ।। 
इदं चोवाच वचनं रुरुमप्रतिमौजसम् । 
अहिंसा परमो धर्मः सर्वप्राणभृतां वर ।। १३ ।।

इतना कहकर महायशस्वी विप्रवर सहस्रपादने डुण्डुभका रूप त्यागकर पुनः अपने प्रकाशमान स्वरूपको प्राप्त कर लिया। फिर अनुपम ओजवाले रुरुसे यह बात कही -'समस्त प्राणियोंमें श्रेष्ठ ब्राह्मण ! अहिंसा सबसे उत्तम धर्म है ।। १२-१३ ।।

तस्मात् प्राणभृतः सर्वान् न हिंस्याद् ब्राह्मणः क्वचित् ।
ब्राह्मणः सौम्य एवेह भवतीति परा श्रुतिः ।। १४ ।।

'अतः ब्राह्मणको समस्त प्राणियोंमेंसे किसीकी कभी और कहीं भी हिंसा नहीं करनी चाहिये। 
ब्राह्मण इस लोकमें सदा सौम्य स्वभावका ही होता है, ऐसा श्रुतिका उत्तम वचन है ।। १४ ।।

रुरु का सर्पों के प्रति क्रोध ;


रुरु तपस्वी था, परंतु तपस्वी होने पर भी उसके मन में क्रोध उत्पन्न हुआ। 

यह महाभारत की मानवीय शिक्षा है कि ज्ञान और तप के साथ भी मनुष्य को अपने अंतःकरण पर विजय प्राप्त करनी होती है।

रुरु ने सर्पों को मारने का संकल्प लिया। 

वह जंगलों में घूमता और जहाँ सर्प दिखाई देता, वहाँ उसे मारने का प्रयास करता। 

उसका मन प्रतिशोध से भर गया था। 

उसे ऐसा प्रतीत होता था कि वह अपने जीवन के दुःख का बदला ले रहा है।

परंतु धर्म का स्वरूप केवल व्यक्तिगत भावनाओं से निर्धारित नहीं होता। 

धर्म में न्याय, करुणा, विवेक और सभी प्राणियों के प्रति उचित व्यवहार का विचार आवश्यक है। 

महाभारत का यह प्रसंग बताता है कि प्रतिशोध के कारण मनुष्य कभी - कभी निर्दोष जीवों के प्रति भी हिंसा करने लगता है।

वेदवेदाङ्गविन्नाम सर्वभूताभयप्रदः ।
अहिंसा सत्यवचनं क्षमा चेति विनिश्चितम् ।। १५ ।।

ब्राह्मणस्य परो धर्मो वेदानां धारणापि च।
क्षत्रियस्य हि यो धर्मः स हि नेष्येत वै तव ।। १६ ।।

'वह वेद-वेदांगोंका विद्वान् और समस्त प्राणियोंको अभय देनेवाला होता है। 
अहिंसा, सत्यभाषण, क्षमा और वेदोंका स्वाध्याय निश्चय ही ये ब्राह्मणके उत्तम धर्म हैं। 
क्षत्रियका जो धर्म है वह तुम्हारे लिये अभीष्ट नहीं है ।। १५-१६ ।।

दण्डधारणमुग्रत्वं प्रजानां परिपालनम् । 
तदिदं क्षत्रियस्यासीत् कर्म वै शृणु मे रुरो ।। १७ ।। 
जनमेजयस्य यज्ञेऽस्मिन् सर्पाणां हिंसनं पुरा । 
परित्राणं च भीतानां सर्पाणां ब्राह्मणादपि ।। १८ ।। 
तपोवीर्यबलोपेताद् वेदवेदाङ्गपारगात् । 
आस्तीकाद् द्विजमुख्याद् वै सर्पसत्रे द्विजोत्तम ।। १९ ।।

'रुरो ! दण्डधारण, उग्रता और प्रजापालन- ये सब क्षत्रियोंके कर्म रहे हैं। 
मेरी बात सुनो, पहले राजा जनमेजयके यज्ञमें सर्पोंकी बड़ी भारी हिंसा हुई। 
द्विजश्रेष्ठ ! फिर उसी सर्पसत्रमें तपस्याके बल-वीर्यसे सम्पन्न, वेद वेदांगोंके पारंगत विद्वान् विप्रवर आस्तीक नामक ब्राह्मणके द्वारा भयभीत सर्पोंकी प्राणरक्षा हुई' ।। १७-१९ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि पौलोमपर्वणि डुण्डुभशापमोक्षे एकादशोऽध्यायः ।।११ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत पौलोमपर्वमें डुण्डुभशापमोक्षविषयक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ११ ।

क्रमशः...

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3. डुण्डुभ का प्रकट होना

एक दिन रुरु ने एक डुण्डुभ सर्प को देखा। डुण्डुभ ने रुरु को समझाया कि वह विषहीन है और किसी को हानि नहीं पहुँचाता। उसने रुरु से कहा कि बिना कारण किसी जीव की हत्या करना धर्मसंगत नहीं है।
डुण्डुभ ने अपने पूर्वजन्म की कथा बताई। उसने कहा कि वह पहले एक तपस्वी ब्राह्मण था, परंतु एक शाप के कारण सर्पयोनि में जन्म लेना पड़ा। इस प्रकार उसकी आत्मकथा केवल एक सर्प की कथा नहीं, बल्कि कर्म, जन्म, शाप और जीवों के प्रति दया का संदेश भी है।
रुरु ने जब डुण्डुभ की बात सुनी, तो उसके भीतर विवेक जागृत हुआ। उसने समझा कि सामने उपस्थित जीव विषहीन है और उसका वध करने का कोई उचित कारण नहीं है।

4. डुण्डुभ की आत्मकथा

महाभारत में डुण्डुभ बताता है कि वह पूर्वजन्म में एक ब्राह्मण था। उसके पूर्वजन्म में एक ऋषि के साथ उसका संबंध था। किसी प्रसंग में उसने उस ऋषि के प्रति अनुचित व्यवहार किया, जिसके कारण उसे सर्पयोनि में जन्म लेने का शाप मिला।
डुण्डुभ ने बताया कि शाप के कारण उसे सर्प का शरीर प्राप्त हुआ, लेकिन उसका अंतःकरण पूर्वजन्म के संस्कारों से जुड़ा रहा। उसने रुरु को यह समझाया कि किसी जीव का बाहरी शरीर देखकर उसके भीतर की चेतना का मूल्यांकन नहीं करना चाहिए।
यह कथा कर्मफल की शिक्षा देती है। जीव अनेक योनियों में जन्म ले सकता है, और उसके कर्मों के अनुसार उसे विभिन्न प्रकार के शरीर प्राप्त हो सकते हैं। इसलिए किसी भी जीव के प्रति केवल उसके रूप या जाति के आधार पर घृणा करना उचित नहीं है।

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5. अहिंसा का उपदेश
डुण्डुभ ने रुरु से कहा कि सभी जीव अपने जीवन की रक्षा करना चाहते हैं। जिस प्रकार मनुष्य अपने जीवन से प्रेम करता है, उसी प्रकार अन्य जीव भी अपने जीवन को प्रिय मानते हैं। बिना कारण किसी जीव को मारना पाप है।
अहिंसा का अर्थ केवल शारीरिक हिंसा से बचना नहीं है। मन, वचन और कर्म से दूसरों को अनावश्यक दुःख न देना भी अहिंसा का अंग है। मनुष्य के भीतर दया, क्षमा और संयम का विकास तभी होता है जब वह अपने क्रोध और प्रतिशोध पर नियंत्रण रखता है।
महाभारत का यह प्रसंग यह भी स्पष्ट करता है कि अहिंसा का अर्थ विवेकहीन निष्क्रियता नहीं है। धर्म की रक्षा, आत्मरक्षा और आवश्यक कर्तव्य के प्रश्न अलग हैं। लेकिन निर्दोष जीवों का संहार केवल क्रोध या बदले की भावना से करना धर्म का श्रेष्ठ स्वरूप नहीं है।

6. रुरु का परिवर्तन
डुण्डुभ के उपदेश से रुरु का मन बदल गया। उसने समझा कि सर्पों के प्रति उसका क्रोध सभी सर्पों को दोषी मानने की भूल थी। जिस जीव ने उसे कोई हानि नहीं पहुँचाई, उसका वध करना उचित नहीं था।
रुरु ने डुण्डुभ की बातों को सुना और अपने हिंसक संकल्प पर विचार किया। यह परिवर्तन महाभारत की एक बड़ी आध्यात्मिक शिक्षा है: सच्चा तप वही है जिसमें मनुष्य अपने भीतर के क्रोध को जीतता है।
रुरु के लिए यह केवल एक सर्प से संवाद नहीं था। यह उसके अंतःकरण के साथ संवाद था। डुण्डुभ के शब्दों ने उसे यह समझाया कि धर्म का मार्ग प्रतिशोध से नहीं, बल्कि विवेक और दया से प्रकाशित होता है।



श्री महाभारत,संक्षिप्त श्रीस्कन्द महापुराण



7. कर्म और जन्म का संबंध
डुण्डुभ की आत्मकथा में कर्म और जन्म का संबंध स्पष्ट होता है। महाभारत के अनुसार जीव अपने कर्मों के परिणामों से मुक्त नहीं होता। शुभ कर्म मनुष्य को उत्तम गति की ओर ले जाते हैं, जबकि अशुभ कर्म दुःखद परिणाम दे सकते हैं।
कर्मफल का सिद्धांत मनुष्य को सावधान करता है कि वह अपने व्यवहार में संयम रखे। किसी जीव को अनावश्यक पीड़ा देना केवल उस समय की घटना नहीं है; यह मनुष्य के अंतःकरण और कर्म के मार्ग को भी प्रभावित करता है।
यहाँ डुण्डुभ की कथा एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती है: यदि किसी जीव का वर्तमान रूप उसके पूर्वकर्मों का परिणाम है, तो क्या मनुष्य को उसके प्रति दया नहीं रखनी चाहिए? महाभारत का उत्तर है कि दया और विवेक धर्म के आवश्यक अंग हैं।

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8. सभी प्राणियों के प्रति दया
महाभारत में अनेक स्थानों पर प्राणियों के प्रति दया, सत्य और संयम की प्रशंसा की गई है। पौलोमपर्व का यह प्रसंग उसी व्यापक धर्मदृष्टि से जुड़ा हुआ है।
सभी जीवों में जीवन की इच्छा होती है। मनुष्य को अपनी शक्ति का उपयोग संरक्षण, सेवा और धर्म के लिए करना चाहिए। केवल अपनी जाति, अपने शरीर या अपने सुख को श्रेष्ठ मानकर दूसरे जीवों को तुच्छ समझना अज्ञान है।
अहिंसा मनुष्य के भीतर करुणा का विस्तार करती है। जब मनुष्य छोटे से छोटे जीव के जीवन का भी सम्मान करता है, तब उसके भीतर व्यापक आत्मबोध विकसित होता है।

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9. क्रोध से धर्म का पतन
रुरु की कथा बताती है कि क्रोध मनुष्य को सत्य से दूर कर सकता है। रुरु का दुःख वास्तविक था, लेकिन उसके दुःख से उत्पन्न प्रतिशोध की भावना सभी सर्पों के प्रति हिंसा का कारण बन गई।
धर्म का पालन करने वाला मनुष्य अपने दुःख को समझता है, परंतु उसके आधार पर निर्दोषों को दंडित नहीं करता। क्रोध को विवेक में बदलना ही आध्यात्मिक साधना है।
डुण्डुभ ने रुरु को यह शिक्षा दी कि किसी जीव की हत्या करने से पहले उसके वास्तविक अपराध और परिस्थिति को समझना चाहिए। बिना विवेक के हिंसा धर्म नहीं बन सकती।

10. आध्यात्मिकता का वास्तविक अर्थ
श्री आध्यात्मिकता के नशा की संगत का अर्थ यह नहीं है कि मनुष्य केवल कथा सुनता रहे। इसका वास्तविक अर्थ है कि कथा से प्राप्त ज्ञान उसके व्यवहार में दिखाई दे।
यदि कोई व्यक्ति पूजा करता है, मंत्र जपता है, शास्त्र पढ़ता है, लेकिन निरपराध जीवों के प्रति क्रूरता रखता है, तो उसकी आध्यात्मिक साधना अधूरी है। दया, सत्य, क्षमा और संयम आध्यात्मिक जीवन के आवश्यक आधार हैं।
डुण्डुभ और रुरु का संवाद मनुष्य को यह संदेश देता है कि शास्त्र का ज्ञान तभी फलदायी होता है जब वह मनुष्य के हृदय में करुणा उत्पन्न करे।

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11. शास्त्रों की दृष्टि से अहिंसा
महाभारत में अहिंसा को धर्म के महत्वपूर्ण गुणों में गिना गया है। अनेक प्रसंगों में सत्य, दया, क्षमा, तप और अहिंसा को धर्म के आधार के रूप में वर्णित किया गया है।
पौलोमपर्व का यह प्रसंग विशेष रूप से इसलिए महत्वपूर्ण है कि इसमें एक सर्प स्वयं अहिंसा का उपदेश देता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि धर्म का ज्ञान किसी एक रूप या जाति तक सीमित नहीं है। कभी-कभी मनुष्य को सत्य का बोध उस जीव से भी प्राप्त हो सकता है जिसे वह तुच्छ समझता है।
डुण्डुभ का उपदेश यह भी बताता है कि जीवों के प्रति दया रखना केवल भावुकता नहीं है; यह धर्म, कर्म और आत्मज्ञान से जुड़ा हुआ विषय है।

12. रुरु और डुण्डुभ का रहस्य
रुरु का क्रोध मनुष्य के भीतर की हिंसक प्रवृत्ति का प्रतीक है। डुण्डुभ का उपदेश विवेक और करुणा का प्रतीक है। जब रुरु ने डुण्डुभ की बात सुनी, तब उसके भीतर का प्रतिशोध शांत होने लगा।
यह प्रसंग बताता है कि मनुष्य के भीतर दो मार्ग होते हैं: एक मार्ग क्रोध, बदला और हिंसा का है; दूसरा मार्ग विवेक, दया और धर्म का है। मनुष्य जिस मार्ग को चुनता है, उसी के अनुसार उसका अंतःकरण निर्मित होता है।
डुण्डुभ की आत्मकथा यह भी समझाती है कि किसी जीव को केवल उसके बाहरी रूप से देखकर उसके प्रति घृणा करना उचित नहीं है। जीव का वास्तविक स्वरूप कर्म, चेतना और जीवन की इच्छा से जुड़ा हुआ है।

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13. आज के जीवन में अहिंसा का पालन
आज के जीवन में अहिंसा का पालन कई प्रकार से किया जा सकता है। मनुष्य अपने व्यवहार में अनावश्यक क्रोध, कठोर वचन और हिंसक विचारों को कम कर सकता है। पशु-पक्षियों के प्रति दया रख सकता है। किसी जीव को बिना कारण पीड़ा न पहुँचाना अहिंसा का सरल अभ्यास है।
अहिंसा का पालन करते समय विवेक आवश्यक है। भोजन, स्वास्थ्य, कृषि, आत्मरक्षा और जीवन के अन्य आवश्यक कार्यों में परिस्थितियों का विचार करना चाहिए। लेकिन जहाँ अनावश्यक हिंसा से बचना संभव हो, वहाँ दया और संयम का मार्ग अपनाना चाहिए।
रुरु की कथा हमें बताती है कि क्रोध से उत्पन्न निर्णयों पर पुनर्विचार करना चाहिए। जब मनुष्य अपने मन को शांत करके निर्णय लेता है, तब वह धर्म के निकट पहुँचता है।

कर्म, करुणा और आत्मज्ञान ;


डुण्डुभ की कथा में कर्म और करुणा का संबंध है। 

जीव अपने कर्मों के अनुसार जन्म प्राप्त करता है, लेकिन उसका जीवन सम्मान और दया के योग्य है। 
मनुष्य को अपने कर्मों का विचार करते हुए दूसरों के प्रति भी न्यायपूर्ण व्यवहार करना चाहिए।

आत्मज्ञान का अर्थ केवल अपने शरीर और मन को समझना नहीं है। 

यह भी समझना है कि अन्य जीव भी जीवन की इच्छा रखते हैं। 

जब मनुष्य दूसरे जीवों के दुःख को समझता है, तब उसके भीतर करुणा उत्पन्न होती है।

इस लिए अहिंसा केवल बाहरी नियम नहीं, बल्कि अंतःकरण की शुद्धि का साधन है। 

यह मनुष्य को क्रोध, द्वेष और प्रतिशोध से मुक्त होने में सहायता करती है।

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अंतिम संदेश ;


पौलोमपर्व का डुण्डुभ और रुरु संवाद महाभारत का अत्यंत शिक्षाप्रद प्रसंग है। 

इस में एक तपस्वी मनुष्य को एक सर्प अहिंसा का उपदेश देता है। 

यह कथा बताती है कि धर्म का मार्ग केवल शक्ति और प्रतिशोध से नहीं, बल्कि विवेक, दया और संयम से प्रकाशित होता है।

रुरु ने अपने क्रोध पर विचार किया और डुण्डुभ के उपदेश से अहिंसा का महत्व समझा। 

यह परिवर्तन मनुष्य के भीतर धर्म की जागृति का प्रतीक है।

इस कथा का रहस्य यही है: किसी जीव के प्रति अनावश्यक हिंसा न करें। 

क्रोध के कारण निर्दोषों को दोषी न मानें। 

अपने कर्मों का विचार करें। 

सभी प्राणियों के जीवन का सम्मान करें। 

अहिंसा, दया और विवेक से युक्त जीवन ही आध्यात्मिक साधना का श्रेष्ठ मार्ग है।

क्रमशः...
शेष अगले अंक में जारी पंडारामा प्रभु राज्यगुरु 
!!!!! शुभमस्तु !!!
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