श्रीमद्भागवत कथा — श्रीकृष्ण चरितम् ;

श्रीमद्भागवत कथा — श्रीकृष्ण चरितम् ; 

श्रीमद्भागवत कथा — श्रीकृष्ण चरितम् :::

कर्म, कर्मफल और ईश्वर का विधान ;

इस पर यशोदानंदन ने कहा 

श्रीभगवान् ने कहा- पिताजी ! 

प्राणी अपने कर्मके अनुसार ही पैदा होता और कर्मसे ही मर जाता है। 

उसे उसके कर्मके अनुसार ही सुख-दुःख, भय और मंगलके निमित्तोंकी प्राप्ति होती है।

यदि कर्मोंको ही सब कुछ न मानकर उनसे भिन्न जीवोंके कर्मका फल देनेवाला ईश्वर माना भी जाय तो वह कर्म करने वालों को ही उनके कर्मके अनुसार फल दे सकता है। 

कर्म न करने - वालों पर उस की प्रभुता नहीं चल सकती ।




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श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कन्ध में भगवान श्रीकृष्ण की बाल एवं किशोर लीलाओं का अत्यन्त महत्वपूर्ण वर्णन आता है। 

इसी क्रम में गोवर्धन - पूजा से सम्बन्धित प्रसंग में श्रीकृष्ण अपने पिता नन्दबाबा तथा व्रजवासियों के सामने कर्म और कर्मफल के विषय में अत्यन्त गम्भीर सिद्धान्त प्रस्तुत करते हैं।

पिता जी,हम वनवासी है,हमारे पास,प्रकृति है...!

जिसमे वन है...!

पहाड़ हैं...!

हमे उस पर्वत राज गोवर्धन का यजन क्यो नहीं करना चाहिए...!

क्योकि वन और पहाड़ ही हमारे घर है...! 

इस लिये हम लोग गौओं, ब्राह्मणों और गिरिराज का यजन करने की तैयारी करें। 

इन्द्र - यज्ञ के लिये जो सामग्रियां इकट्ठी की गयी हैं...! 

उन्हींसे इस यज्ञका अनुष्ठान होनेदें। 

अनेकों प्रकारके पकवान - खीर, हलवा पूआ, पूरी आदि से लेकर मूँग की दाल तक बनाये

जायँ। 

व्रजका सारा दूध एकत्र कर लिया जाय ।

वेद वादी ब्राह्मणोंके द्वारा भली भाँति हवन करवाया जाय और उनको गो धन का और अन्यान्य प्रकार के दान देकर पुण्य अर्जित किया जाय।

फिर क्या था...!

सारे ब्रज मंडल मे कल ही चलकर गोवर्धन की पूजा होगी की घोषणा हो गयी...! 

सभी नाचते गाते गोवर्धन पहुच गये।

भगवान् श्रीकृष्णने जिस प्रकारका यज्ञ करनेको कहा था...! 

वैसा ही यज्ञ उन्होंने प्रारम्भ किया। 

पहले ब्राह्मणों से स्वस्ति वाचन करा कर उसी सामग्री से गिरिराज और ब्राह्मणों को सादर भेंटें दीं तथा गौओंको हरी - हरी घास खिलायीं। 

इसके बाद नन्दबाबा आदि गोपों ने गौओं को आगे करके गिरिराज की प्रदक्षिणा की ।

ब्राह्मणों का आशीर्वाद प्राप्त करके वे और गोपियाँ भलीभाँति श्रृंगार करके और बैलों से जुती गाड़ियों पर सवार होकर भगवान् श्रीकृष्ण की लीलाओं का गान करती हुई गिरिराज की परिक्रमा करने लगीं।


भगवान् श्रीकृष्ण गोपों को विश्वास दिला ने के लिये गिरिराज के ऊपर एक दूसरा विशाल शरीर धारण करके प्रकट हो गये...! 

तथा 'मैं गिरिराज हूँ' इस प्रकार कहते हुए सारी सामग्री का भोग लगाने लगे ।

भगवान श्रीकृष्ण  ने भी अपने ही उस रूप को नमन किया।

एषोऽवजानतो मर्त्यान् कामरूपी वनौकसः । 

हन्ति हस्मै नमस्यामः शर्मणे आत्मनो गवाम् ॥


इत्यद्रिगोद्विजमखं वासुदेवप्रणोदिताः ।  

यथा विधाय ते गोपाः सहकृष्णा व्रजं ययुः ॥


भाव है कि गोप इस प्रकार  गोवर्धन पूजन कर अपनी बैल गाड़ियो मे सारा सामान रख कर गोविंद भजन गाते हुये ब्रज मे आ गये।

( तभी से पूरे भारत वर्ष मे गोवर्धन पूजन, गौ पूजन होता आ रहा है।

इंद्र को बहुत ज्यादा घमंड हो गया था...!

उसे चूर करने के लिये ही भगवान ने उनकी पूजा बंद करवाई...!

क्योकि भगवान भक्तों का हित करने के लिये अहंकार नही रहने देते।

दूसरा संदेश है कि हम प्रकृति मे रहते है...!

उससे लाभ लेते रहते है...!

तो हमें भी वन,पर्वत...! 

नदियों का सम्मान करना चाहिये। )


भागवतम् श्रीकृष्ण चरितम



यह प्रसंग केवल इन्द्र - पूजा और गोवर्धन - पूजा के परिवर्तन की कथा नहीं है। 

इस के भीतर भगवान श्रीकृष्ण ने जीव, कर्म, स्वभाव, कर्मफल और ईश्वर के सम्बन्ध में जो विचार रखा है, वह भागवत - दर्शन के महत्वपूर्ण सिद्धान्तों में से एक है।

श्रीमद्भागवत के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण नन्दबाबा से कहते हैं—


«कर्मणा जायते जन्तुः कर्मणैव विलीयते ।

सुखं दुःखं भयं क्षेमं कर्मणैवाभिपद्यते ॥

श्रीमद्भागवतम् 10.24.13»


अर्थात् प्राणी अपने कर्म के अनुसार जन्म प्राप्त करता है और कर्म के अनुसार ही शरीर का अन्त होता है। 

उसे सुख, दुःख, भय तथा मंगल अथवा कल्याण के निमित्त भी कर्म के अनुसार ही प्राप्त होते हैं।


यहाँ श्रीकृष्ण का उद्देश्य मनुष्य को कर्म के सिद्धान्त की ओर जागरूक करना है। 

संसार में दिखाई देने वाली प्रत्येक परिस्थिति को केवल बाहरी कारणों से समझ लेना पर्याप्त नहीं है। जीव का वर्तमान जीवन उसके कर्म - संस्कारों से जुड़ा हुआ है और उसके कर्म ही उसके अनुभवों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।


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कर्म का अर्थ केवल बाहरी क्रिया नहीं ;


‘कर्म’ शब्द का सामान्य अर्थ कोई कार्य करना समझ लिया जाता है, लेकिन शास्त्रीय दृष्टि से कर्म का विषय इससे कहीं अधिक व्यापक है। 
मनुष्य जैसा आचरण करता है, जिस उद्देश्य से कार्य करता है, जिस प्रकार अपने कर्तव्य का पालन करता है और जिन कर्मों के संस्कार बनाता है—
वे सभी उसके जीवन के परिणामों से जुड़े होते हैं।

इस लिए भागवत में कर्मफल का सिद्धान्त केवल इतना नहीं कहता कि आज कोई काम किया और तुरंत उसका परिणाम मिल गया।

कर्म का फल तत्काल भी मिल सकता है, कुछ समय बाद भी और परिस्थितियों के परिवर्तन के साथ भी प्रकट हो सकता है। 
इसी कारण मनुष्य को अपने कर्म के विषय में सावधान रहने की शिक्षा दी जाती है।

भगवान श्रीकृष्ण का उपदेश यह नहीं है कि मनुष्य अपने जीवन की प्रत्येक परिस्थिति को देखकर दूसरों को दोष देता रहे। 
इस के विपरीत, यह उपदेश मनुष्य को अपने कर्म के प्रति उत्तरदायी बनाता है।

यदि सुख मिला तो केवल बाहरी व्यक्ति को उसका कारण मानना और दुःख आया तो भी केवल बाहरी व्यक्ति को दोष देना—
यह कर्मतत्त्व की पूर्ण समझ नहीं है।

कर्म और जन्म - मरण का सम्बन्ध ;


श्रीमद्भागवत के उक्त श्लोक में कहा गया है—

“कर्मणा जायते जन्तुः कर्मणैव विलीयते।”

जीव कर्म के अनुसार शरीर प्राप्त करता है और कर्म के अनुसार उस शरीर का त्याग करता है।

यहाँ ‘जन्म’ और ‘मरण’ को केवल एक जीवन की सीमित घटना के रूप में देखने के स्थान पर भागवत का व्यापक कर्म - सिद्धान्त सामने आता है।

जीव के संस्कार और कर्म उसके अनुभवों से जुड़े रहते हैं। 
इस लिए भारतीय शास्त्रीय परम्परा में कर्म और पुनर्जन्म का सिद्धान्त परस्पर सम्बन्धित माना गया है।

इस सिद्धान्त का उद्देश्य मनुष्य में भय उत्पन्न करना नहीं, बल्कि कर्म के प्रति सावधानी उत्पन्न करना है।

मनुष्य जो करता है, उसका महत्व है। 
उसका आचरण व्यर्थ नहीं जाता। 
यही कर्म - सिद्धान्त की मूल चेतावनी है।

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सुख और दुःख भी कर्म से जुड़े हैं ;


भगवान श्रीकृष्ण आगे कहते हैं—

“सुखं दुःखं भयं क्षेमं कर्मणैवाभिपद्यते।”

अर्थात् सुख, दुःख, भय और क्षेम—
इन की प्राप्ति भी कर्म के अनुसार होती है।

यहाँ ‘सुख’ और ‘दुःख’ का अर्थ केवल धन की प्राप्ति या धन की हानि नहीं है।

जीवन में अनेक प्रकार के अनुभव होते हैं। 
कभी मनुष्य को अनुकूल परिस्थिति प्राप्त होती है, कभी प्रतिकूल। 
कभी सुरक्षा का अनुभव होता है और कभी भय का। 
कभी कार्य सहजता से सम्पन्न होता है और कभी अनेक बाधाएँ सामने आती हैं।

भागवत इन अनुभवों को कर्म के व्यापक सिद्धान्त से जोड़ता है।

इस से एक महत्वपूर्ण शिक्षा निकलती है—
मनुष्य को कर्म करते समय केवल तत्काल परिणाम देखकर कर्म का मूल्यांकन नहीं करना चाहिए।

अच्छा कर्म करके तुरंत परिणाम दिखाई न दे, तो भी उसका महत्व समाप्त नहीं होता। 
उसी प्रकार अनुचित कर्म का तत्काल दण्ड दिखाई न दे, तो उससे यह सिद्ध नहीं होता कि कर्मफल का नियम समाप्त हो गया।

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क्या केवल कर्म ही सब कुछ है ?


अब श्रीकृष्ण का उपदेश और अधिक सूक्ष्म हो जाता है।

श्रीमद्भागवत 10.24.14 में कहा गया है—

«अस्ति चेदीश्वरः कश्चित् फलरूप्यन्यकर्मणाम् ।
कर्तारं भजते सोऽपि न ह्यकर्तुः प्रभुर्हि सः ॥»

अर्थ यह है कि यदि जीवों के कर्मों का फल देने वाला कोई ईश्वर माना जाए, तो वह भी कर्म करने वाले को उसके कर्म के अनुसार ही फल देता है; कर्म न करने वाले के विषय में कर्मफल की व्यवस्था कैसे होगी?

इस कथन का तात्पर्य यह समझना आवश्यक है कि भगवान श्रीकृष्ण यहाँ ईश्वर का निषेध नहीं कर रहे हैं। 
प्रसंग में उनका उद्देश्य इन्द्र को समस्त कर्मफल का स्वतंत्र स्वामी मानने की धारणा पर प्रश्न उठाना है।

अर्थात् वर्षा के देवता होने मात्र से इन्द्र जीवों के कर्म को अपनी इच्छा से बदल देने वाले परम नियन्ता नहीं हो जाते।

भागवत के इस प्रसंग में श्रीकृष्ण व्रजवासियों को समझाते हैं कि जीव अपने कर्म के अनुसार फल प्राप्त करता है और देवता भी उस सार्वभौम व्यवस्था के भीतर कार्य करते हैं।

इस लिए किसी देवता को प्रसन्न करके अपने कर्म के सिद्धान्त को समाप्त कर देना—
यह भागवत के इस उपदेश का आशय नहीं है।

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कर्म करने वाला ही कर्मफल का अधिकारी है ;


कर्म और कर्मफल के सिद्धान्त में एक मूल बात है—
जिसने कर्म किया है, फल की व्यवस्था उसी के कर्म से सम्बन्धित होती है।

यदि कोई व्यक्ति कृषि करे, भूमि को तैयार करे, बीज बोए और उसका उचित पालन करे, तो फसल प्राप्त होने की सम्भावना उसके कर्म से जुड़ी होगी।

इस के विपरीत यदि बीज ही न बोया जाए, तो केवल इच्छा करने से खेत में वही फसल उत्पन्न नहीं हो जाती।

इसी प्रकार आध्यात्मिक और नैतिक जीवन में भी कर्म आवश्यक है।

केवल इच्छा से परिणाम प्राप्त नहीं होता।

केवल प्रार्थना करके अपने कर्तव्य से बचना भी भागवत के कर्म - सिद्धान्त का मार्ग नहीं है।

प्रार्थना, भक्ति, उपासना और धर्माचरण अपने स्थान पर महत्वपूर्ण हैं; लेकिन मनुष्य को अपने कर्तव्य और कर्म से विमुख नहीं होना चाहिए।

इन्द्र की भूमिका और कर्म का सिद्धान्त ;


गोवर्धन - प्रसंग में व्रजवासी परम्परा के अनुसार इन्द्र की पूजा की तैयारी कर रहे थे। 
श्रीकृष्ण ने नन्दबाबा से प्रश्न किया कि मनुष्य को अपने जीवन - निर्वाह के वास्तविक कारणों को समझना चाहिए।

व्रजवासियों का जीवन गौ, गोचरभूमि, पर्वत, वन और जल आदि से सम्बन्धित था। 
इस लिए श्रीकृष्ण ने उन्हें अपने स्वाभाविक कर्म और जीवन के प्रत्यक्ष आधारों की ओर देखने को कहा।

यही कारण है कि यह प्रसंग केवल किसी पूजा को बन्द करके दूसरी पूजा प्रारम्भ करने की कथा नहीं है। 
इस के भीतर कर्म, स्वधर्म, प्रकृति और जीवन - व्यवस्था के सम्बन्ध का विचार भी उपस्थित है।

श्रीमद्भागवत के 10.24 अध्याय में श्रीकृष्ण का तर्क क्रमशः आगे बढ़ता है—
जीव कर्म के अनुसार फल प्राप्त करता है; देवता कर्मफल की व्यवस्था में स्वतंत्र रूप से मनमाना परिवर्तन नहीं करते; और जीव अपने स्वभाव के अनुसार कर्म करता है।

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स्वभाव और कर्म ;


अगले श्लोक में श्रीकृष्ण कहते हैं—

«स्वभावतन्त्रो हि जनः स्वभावमनुवर्तते ।
स्वभावस्थमिदं सर्वं सदेवासुरमानुषम् ॥»

अर्थात् जीव अपने स्वभाव का अनुसरण करता है और देव, असुर तथा मनुष्य सहित यह सम्पूर्ण जगत् स्वभाव से सम्बन्धित है।

यहाँ ‘स्वभाव’ का विचार भी महत्वपूर्ण है।

मनुष्य के संस्कार, प्रवृत्तियाँ, पूर्वकृत कर्म और वर्तमान परिस्थितियाँ उसके आचरण को प्रभावित करती हैं। 
इस लिए कर्म केवल बाहर दिखाई देने वाली क्रिया नहीं है; उसके पीछे मन की प्रवृत्ति और संस्कार भी कार्य करते हैं।

इसी लिए शास्त्र मनुष्य को केवल बाहरी आचरण सुधारने के लिए नहीं, बल्कि अन्तःकरण को भी शुद्ध करने के लिए प्रेरित करते हैं।

कर्म के अनुसार शरीर और सम्बन्ध ;


श्रीमद्भागवत 10.24.17 में श्रीकृष्ण कहते हैं—

«देहानुच्चावचाञ्जन्तुः प्राप्योत्सृजति कर्मणा ।
शत्रुर्मित्रमुदासीनः कर्मैव गुरुरीश्वरः ॥»

इस श्लोक में जीव द्वारा कर्मानुसार उच्च और निम्न प्रकार के शरीर प्राप्त करने और त्यागने की बात कही गई है। 
साथ ही शत्रु, मित्र, उदासीन, गुरु और ईश्वर से सम्बन्धित अनुभवों को भी कर्म से जोड़ा गया है।

यह अत्यन्त गम्भीर विचार है।

मनुष्य सामान्यतः अपने जीवन में मिलने वाले लोगों को केवल संयोग मानता है। 
लेकिन कर्म - सिद्धान्त संसार के सम्बन्धों को भी व्यापक कर्म - संस्कारों से जोड़कर देखता है।

इसका अर्थ यह नहीं कि मनुष्य किसी व्यक्ति के प्रति अन्याय को केवल ‘पिछले कर्म’ कहकर उचित ठहरा दे।

धर्म का उद्देश्य अन्याय को स्वीकार करना नहीं है।

कर्म - सिद्धान्त मनुष्य को अपने वर्तमान कर्म के प्रति भी उत्तरदायी बनाता है।

यदि आज कोई व्यक्ति किसी के साथ अन्याय करता है, तो वह यह कहकर अपने कर्म से मुक्त नहीं हो सकता कि सब कुछ पूर्वकर्म है।

वर्तमान कर्म भी भविष्य के फल का कारण बनता है।

कर्म को दोष देकर कर्म से भागना नहीं ;


कर्म - सिद्धान्त का सबसे बड़ा व्यावहारिक संदेश यही है कि मनुष्य अपने वर्तमान कर्तव्य से पलायन न करे।

यदि किसी के जीवन में कठिनाई है, तो वह अपने कर्मों की समीक्षा करे।

यदि सुख प्राप्त हुआ है, तो अहंकार न करे।

यदि सफलता मिली है, तो उसे केवल अपना व्यक्तिगत सामर्थ्य मानकर दूसरों का तिरस्कार न करे।

यदि असफलता मिली है, तो निराश होकर कर्म छोड़ न दे।

और यदि कोई व्यक्ति धार्मिक या आध्यात्मिक साधना करता है, तो उसे यह समझना चाहिए कि साधना का उद्देश्य कर्म से भागना नहीं, बल्कि कर्म को धर्मसम्मत और अन्तःकरण को शुद्ध बनाना है।

कर्म, ईश्वर और मनुष्य की जिम्मेदारी ;


यहाँ एक अत्यन्त सूक्ष्म बात समझनी आवश्यक है।

यदि कर्मफल का विधान है, तो क्या ईश्वर की कोई भूमिका नहीं ?


भागवत के इस प्रसंग को केवल इतना कहकर समाप्त कर देना कि ‘कर्म ही सब कुछ है और ईश्वर का कोई स्थान नहीं’ उचित नहीं होगा।

श्रीकृष्ण स्वयं भगवान हैं और वे कर्मफल की व्यवस्था का सिद्धान्त समझा रहे हैं।

अतः प्रसंग का मुख्य विषय यह है कि देवताओं को मनमाने ढंग से कर्मफल देने वाला स्वतंत्र सर्वोच्च अधिकारी नहीं मानना चाहिए।

जीव के कर्म और उसके कर्मफल के बीच एक शास्त्रीय व्यवस्था है।

भगवान की सत्ता उस व्यवस्था से बाहर नहीं, बल्कि परम तत्त्व के रूप में उससे सम्बन्धित है।

इसी लिए भागवत में भगवान के प्रति भक्ति और कर्म के प्रति उत्तरदायित्व—
दोनों साथ - साथ दिखाई देते हैं।

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आज के जीवन के लिए भागवत का संदेश :


श्रीमद्भागवत का यह प्रसंग वर्तमान जीवन में भी गहरा नैतिक संदेश देता है।

मनुष्य को अपने कर्म पर ध्यान देना चाहिए।

वाणी का कर्म है।

विचार का प्रभाव है।

व्यवहार का फल है।

धन कमाने का तरीका भी कर्म है।

दूसरों के प्रति न्याय या अन्याय भी कर्म है।

दान, सेवा, अध्ययन, तप, संयम और धर्माचरण भी कर्म हैं।

इसी प्रकार छल, हिंसा, लोभ, अहंकार और दूसरों को कष्ट देना भी कर्म हैं।

इसलिए केवल पूजा-पाठ कर लेना पर्याप्त नहीं, यदि व्यवहार में अधर्म बना हुआ है।

भागवत का कर्म-सिद्धान्त मनुष्य को भीतर से प्रश्न करने के लिए प्रेरित करता है—

मैं क्या कर रहा हूँ?

किस उद्देश्य से कर रहा हूँ?

मेरे कर्म से किसे लाभ हो रहा है?

मेरे कर्म से किसे कष्ट हो रहा है?

क्या मेरा कर्म धर्म के अनुकूल है?

यही आत्मपरीक्षण कर्म को आध्यात्मिक दिशा देता है।

निष्कर्ष ;


श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कन्ध के चौबीसवें अध्याय में श्रीकृष्ण द्वारा नन्दबाबा को दिया गया यह उपदेश अत्यन्त गम्भीर कर्म-दर्शन प्रस्तुत करता है।

“कर्मणा जायते जन्तुः कर्मणैव विलीयते”—
जीव के जन्म और मृत्यु को कर्म से जोड़ा गया है।

“सुखं दुःखं भयं क्षेमं कर्मणैवाभिपद्यते”—
सुख, दुःख, भय और क्षेम को भी कर्म के अनुसार प्राप्त होने वाला बताया गया है।

फिर भगवान यह स्पष्ट करते हैं कि यदि कर्मफल देने वाले ईश्वर को माना जाए, तब भी वह कर्म करने वाले जीव के कर्म के अनुसार ही फल देता है।

इसके बाद स्वभाव और कर्म का सम्बन्ध बताया गया है तथा जीव के शरीर और उसके सम्बन्धों को भी कर्म से जोड़ा गया है।

इस प्रकार गोवर्धन - प्रसंग के भीतर श्रीकृष्ण केवल व्रजवासियों को एक धार्मिक परम्परा बदलने का उपदेश नहीं देते, बल्कि उन्हें कर्म की वास्तविकता समझाते हैं।

कर्म से भागना नहीं—कर्म को समझना है।
कर्मफल से डरना नहीं—कर्म को शुद्ध करना है।
सुख में अहंकार नहीं—दुःख में निराशा नहीं।
अपने वर्तमान कर्म को धर्मानुकूल बनाना ही मनुष्य का उत्तरदायित्व है।

और यही इस भागवत - प्रसंग का गम्भीर संदेश है कि मनुष्य अपने जीवन में जो कर्म करता है, उसे तुच्छ न समझे; क्योंकि कर्म केवल वर्तमान क्षण की क्रिया नहीं, बल्कि जीव की आगे की गति से जुड़ा हुआ शास्त्रीय सिद्धान्त है। ॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥
🙏🌹 जय श्री कृष्ण🌹🙏
पंडारामा प्रभु राज्यगुरु 🙏🌹 जय श्री कृष्ण🌹🙏
!!!!! शुभमस्तु !!!
🙏हर हर महादेव हर...!!
जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏
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