।। श्रीरामचरितमानस — अयोध्या का वह सिद्ध स्थान।।
।। श्रीरामचरितमानस — अयोध्या का वह सिद्ध स्थान।।
अयोध्या धाम में कनक भवन और हनुमानगढ़ी के मध्य स्थित है 'दशरथ महल', जिसे प्रेम से 'बड़ी जगह' भी कहा जाता है।
अयोध्या का नाम स्मरण करते ही मन में केवल एक नगर की कल्पना नहीं होती।
अयोध्या उस भावभूमि का नाम है जहाँ धर्म केवल किसी ग्रंथ का विषय नहीं रहता, बल्कि जीवन की गति बन जाता है।
जहाँ राजसिंहासन से बड़ा त्याग है, वैभव से बड़ी मर्यादा है और अधिकार से बड़ी सेवा है।
वर्षों पहले यहाँ एक परम विरक्त संत रहा करते थे— श्री रामप्रसाद जी।
उनका जीवन पूरी तरह प्रभु के चरणों में अर्पित था।
अयोध्या के पवित्र क्षेत्र में एक स्थान दशरथ महल के नाम से प्रसिद्ध है, जिसे भक्तजन प्रेम से “बड़ी जगह” या “बड़ा स्थान” भी कहते हैं।
वर्तमान में यह एक पूजनीय मंदिर - परिसर के रूप में प्रतिष्ठित है और यहाँ श्रीराम, सीता, लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्न आदि की आराधना होती है।
इस स्थान को राजा दशरथ के राजमहल की परंपरागत स्मृति से जोड़ा जाता है।
आश्रम की व्यवस्था का नियम सरल था: मंदिर में जो चढ़ावा आता, वह पलटू बनिया नाम के एक व्यापारी के पास भेज दिया जाता।
Dattatreya Polyresin Bonded Bronze Maa Saraswati Idol Statue Murti for Puja (6-inch)
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| Theme | Idol |
| Brand | Dattatreya |
| Colour | Brown |
| Style | Modern |
| Material | Porcelain |
| Occasion | Religious |
| Product Dimensions | 9L x 7W x 14.5H Centimeters |
| Cartoon Character | Maa Saraswati |
| Age Range (Description) | Kid |
| Number of Pieces | 1 |
{ About this item
- Material: Bonded Bronze
- Colour : brown
- Dimension : ( L x B x H) 14.5 cm x 9 cm x 7 cm, weight - 510 gram
- Included component: 1 Saraswati
- A mixture of bronze power and resin that is used in sculpture making. In bonded bronze sculpturing, the mixture is poured directly into a mold without the use of the more traditional wax casting process that uses molten metal . Bonded bronze is also called cold cast bronze resin. }
वहीं से राशन आता, ठाकुर जी का भोग लगता और संत - साधु प्रसाद पाते।
लेकिन किसी स्थान की सिद्धता केवल उसकी दीवारों, द्वारों या स्थापत्य से नहीं होती।
स्थान तब सिद्ध होता है, जब वहाँ भगवान का स्मरण सिद्ध हो जाए।
इसी भाव को समझने के लिए अयोध्या के इस पवित्र स्थान की कथा को बाहरी चमत्कार की कथा न मानकर रामभक्ति, सेवा और समर्पण की कथा के रूप में समझना चाहिए।
कहते हैं प्रभु अपने भक्तों को निखारने के लिए कभी - कभी कठोर परीक्षाएं लेते हैं।
एक दिन मंदिर में एक पैसे का भी चढ़ावा नहीं आया।
साधुओं के पास संचय के नाम पर कुछ नहीं था।
भूख से व्याकुल संतों को देख रामप्रसाद जी ने दो शिष्यों को पलटू बनिया के पास भेजा—
"भैया, आज कुछ आया नहीं है, थोड़ा राशन उधार दे दो ताकि प्रभु को भोग लग सके।
बड़ी जगह का वास्तविक अर्थ ;
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एक विरक्त साधु और बड़ी जगह ;
लोकपरंपरा में इस स्थान से एक परम विरक्त संत की कथा भी जुड़ी हुई कही जाती है।
कहा जाता है कि उस समय वहाँ आज जैसी भीड़ नहीं थी।
साधु का जीवन अत्यंत सरल था।
उनका अपना कुछ नहीं था।
न धन का संग्रह।
न व्यक्तिगत सुविधा की इच्छा।
न किसी प्रकार की प्रतिष्ठा की लालसा।
उनके लिए मंदिर ही घर था और भगवान की सेवा ही जीवन का प्रयोजन।
इस प्रसंग को किसी एक व्यक्ति की निजी चमत्कार-कथा के रूप में देखने की अपेक्षा इसे सनातन साधु - परंपरा के आदर्श के रूप में समझना अधिक उचित है।
शास्त्रों में साधु के लिए बाहरी संपत्ति से अधिक महत्वपूर्ण है—
संतोष, संयम, ईश्वर - स्मरण और सेवा।
श्रीरामचरितमानस में संत के लक्षण बताते हुए गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं—
«“संत सरल चित जगत हित,
तजि अहंकार मद मोह।”»
संत का हृदय सरल होता है।
उसकी साधना केवल अपने उद्धार के लिए नहीं होती।
वह जहाँ रहता है, वहाँ दूसरों के लिए भी शांति का कारण बनता है।
इसी लिए उस विरक्त साधु का जीवन यदि समझना हो तो उसे चमत्कार से नहीं, सेवा से समझना चाहिए।
अरे पलटू! ओ पलटू सेठ! किवाड़ खोल...!"
नन्हे बच्चों की आवाजों से सन्नाटा टूट गया।
खीझते हुए पलटू ने दरवाजा खोला कि इन शरारती बच्चों को सबक सिखाऊँगा, पर सामने का दृश्य देख उसके प्राण जैसे गले में अटक गए।
बारह वर्ष से कम आयु के चार अति सुंदर बालक खड़े थे।
चारों ने एक ही पीताम्बर ( चादर ) को आपस में ओढ़ा हुआ था।
उनकी आँखों में ऐसी चमक और चेहरे पर ऐसी आभा थी कि पलटू का क्रोध पल भर में लुप्त होकर अगाध प्रेम में बदल गया।
उसने हकलाते हुए पूछा - बच्चों!
तुम कौन हो ?
इतनी रात को यहाँ क्या कर रहे हो?
बालक चंचलता से मुस्कुराए और घर के भीतर घुसते हुए बोले-
"हमें रामप्रसाद बाबा ने भेजा है।
इस पीताम्बर की गाँठ खोल, इसमें सोलह सौ रुपए हैं।
इन्हें गिन और रख ले।
भगवान की सेवा में जो मिला, वही पर्याप्त था ;
मंदिर में जो भी थोड़ा - बहुत अर्पण आता, उससे भगवान की सेवा और साधुओं के भोजन की व्यवस्था होती।
यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण आध्यात्मिक सिद्धांत है।
भोग पहले भगवान का, उसके बाद प्रसाद के रूप में ग्रहण।
यह भावना भारतीय सनातन परंपरा में अत्यंत प्राचीन है।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—
«“यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः।”»
अर्थात यज्ञ अथवा ईश्वरार्पण के बाद प्राप्त अन्न को प्रसाद-बुद्धि से ग्रहण करने वाले संत पवित्र होते हैं।
इस लिए साधु के लिए भोजन केवल पेट भरने की वस्तु नहीं था।
वह प्रसाद था।
अन्न केवल अन्न नहीं था।
वह भगवान की कृपा का प्रतीक था।
और जो थोड़ा मिलता था, उसमें भी संतोष था।
उस जमाने में सोलह सौ रुपए एक साम्राज्य के बराबर थे।
पलटू ने कांपते हाथों से पीताम्बर का कोना खोला, तो सचमुच चांदी के सिक्कों की खनक गूँज उठी।
बालकों ने अधिकार से कहा—
"इन पैसों का राशन कल सुबह ही आश्रम भिजवा देना और आज के बाद कभी मना मत करना।
पलटू को आत्मग्लानि हुई।
उसे लगा कि शायद महंत जी नाराज हो गए हैं, इस लिए रात में ही पैसे भिजवा दिए।
उसने हाथ जोड़कर कहा—
"बच्चों, मेरी पूरी दुकान भी कम पड़ेगी इन पैसों के आगे।
मैं धीरे - धीरे सारा राशन भिजवा दूँगा।"
बालक मुस्कुराए, और देखते ही देखते अंधेरे में कहीं ओझल हो गए।
वे पलटू का धन तो ले गए, पर साथ में उसका मन भी चुरा ले गए।
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फिर एक दिन परीक्षा आई ;
एक दिन ऐसा आया जब मंदिर में अपेक्षा के अनुसार अर्पण नहीं आया।
भंडार में पर्याप्त सामग्री नहीं थी।
साधुओं के लिए भोजन की व्यवस्था कठिन हो गई।
बाहर से देखने पर यह अभाव था।
लेकिन साधना की दृष्टि से देखें तो यही वह क्षण था जब भक्ति की परीक्षा होती है।
सुख के समय भगवान को याद करना सरल है।
जब सब कुछ उपलब्ध हो, तब “प्रभु की कृपा है” कहना भी सरल है।
लेकिन जब आवश्यकता सामने हो और साधन कम हों, तब भी भगवान पर विश्वास बना रहे—
यही भक्ति की गहराई है।
रामचरितमानस में भगवान श्रीराम का चरित्र इसी धैर्य का आदर्श है।
वनवास आया।
राज्य छूटा।
राजसी वस्त्र छूटे।
सुविधाएँ छूटीं।
लेकिन श्रीराम के भीतर धर्म नहीं छूटा।
इसी लिए बड़ी जगह की कथा का सबसे बड़ा संदेश भी यही है—
अभाव भक्ति को समाप्त नहीं करता; कभी - कभी अभाव ही भक्ति की सच्चाई प्रकट करता है।
सुबह मंगला आरती के समय मंदिर में हड़कंप मच गया।
ठाकुर जी का पीताम्बर गायब था!
सब को लगा चोरी हो गई है।
तभी बाहर गाड़ियों की कतार लग गई।
पलटू बनिया हाथ जोड़े, आँखों में आँसू लिए दौड़ा आया और रामप्रसाद जी के चरणों में गिर पड़ा।
महाराज! मुझे क्षमा कर दें।
रात में पैसे भिजवाने की क्या आवश्यकता थी?
मैं कान पकड़ता हूँ, अब कभी राशन के लिए मना नहीं करूँगा।
और यह रहा आपका पीताम्बर, जिसे वे बालक मेरे पास छोड़ गए थे।
रामप्रसाद जी का हृदय धक से रह गया।
उन्होंने कांपते हाथों से वह पीताम्बर छुआ - यह तो वही था जिसे उन्होंने कल रात स्वयं प्रभु को ओढ़ाया था!
जब पलटू ने रात का पूरा वृत्तांत सुनाया, तो रामप्रसाद जी दहाड़ मारकर रो पड़े।
"हा धिक्कार है मुझ पर! मैंने जीवन भर सेवा की पर मुझे दर्शन न दिए, और इस बनिए की हठ के कारण आपको आधी रात को पीताम्बर ओढ़कर गलियों में भटकना पड़ा!इस घटना ने पलटू का जीवन बदल दिया।
वही पलटू बनिया आगे चलकर महान संत श्री पलटूदास जी के रूप में विख्यात हुए।
उधर, विरह की अग्नि में जलते रामप्रसाद जी जब रात को भजन गाने बैठे, तो मूर्छित हो गए।
उसी मूर्च्छा में उन्हें चारों भाइयों और उनकी पत्नियों सहित दिव्य दर्शन हुए।
साक्षात् मैया जानकी ने अपने कोमल हाथों से उनके आँसू पोंछे और अपनी उँगली से उनके माथे पर 'बिन्दी' लगा दी।
साधु ने भगवान से शिकायत नहीं की ;
ऐसे समय में साधक के सामने दो मार्ग होते हैं।
पहला—वह कहे, “मैंने भगवान की सेवा की, फिर मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ?”
दूसरा—वह कहे, “जो भगवान की इच्छा है, वही स्वीकार है; सेवा नहीं रुकेगी।”
श्रीराम स्वयं विपरीत परिस्थितियों में भी विचलित नहीं होते।
जब उन्हें वन जाने की सूचना मिलती है, तब वे परिस्थितियों को दोष देने के स्थान पर पिता के वचन की रक्षा को अपना धर्म मानते हैं।
यही कारण है कि राम केवल एक राजा नहीं, मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाते हैं।
सच्ची भक्ति का अर्थ यह नहीं कि भक्त के जीवन में कभी कठिनाई न आए।
सच्ची भक्ति का अर्थ है—
कठिनाई आए, फिर भी भगवान से संबंध न टूटे।
भगवान को धन नहीं, भाव चाहिए ;
सनातन शास्त्रों में बार-बार एक बात सामने आती है कि भगवान के लिए वस्तु का मूल्य उसके बाहरी वैभव से नहीं, भाव से होता है।
भगवद्गीता में भगवान कहते हैं—
«“पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।”»
अर्थात भक्तिभाव से अर्पित पत्र, पुष्प, फल अथवा जल भी भगवान स्वीकार करते हैं।
इस सिद्धांत को बड़ी जगह की कथा में समझें तो बात अत्यंत स्पष्ट हो जाती है।
यदि भगवान को केवल धन चाहिए होता, तो निर्धन साधु की भक्ति का कोई मूल्य नहीं होता।
यदि भगवान को केवल भव्यता चाहिए होती, तो एक साधारण दीपक, थोड़ा जल और प्रेम से चढ़ाया गया पुष्प अर्थहीन हो जाता।
लेकिन भगवान के लिए भाव प्रधान है।
इस लिए जिस स्थान पर थोड़ा अन्न भी प्रेम से भगवान को अर्पित होता है, वह स्थान आध्यात्मिक दृष्टि से बड़ा हो जाता है।
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अयोध्या की महिमा भवन से नहीं, राम से है ;
अयोध्याकाण्ड का एक अत्यंत गहरा भाव है—
«“अवध तहाँ जहँ रामु निवासू।
तहँइँ दिवसु जहँ भानु प्रकासू॥”»
जहाँ राम हैं, वहीं अयोध्या है।
यह केवल भौगोलिक कथन नहीं है।
यह साधना का सिद्धांत है।
जहाँ राम का स्मरण है, वहाँ अयोध्या है।
जहाँ राम का नाम है, वहाँ तीर्थ है।
जहाँ राम की मर्यादा का पालन है, वहाँ धर्म है।
और जहाँ राम के चरणों में अहंकार समर्पित है, वहीं साधना है।
इसलिए दशरथ महल की आध्यात्मिक कथा को समझते समय सबसे महत्वपूर्ण बात यह नहीं कि वहाँ कभी कितना वैभव रहा होगा।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वहाँ राम का स्मरण आज भी जीवित है।
सेवा ही साधु का धन ;
विरक्त संत के पास संसार की दृष्टि से कुछ नहीं था।
लेकिन उनके पास एक ऐसी संपत्ति थी जिसे कोई चोर नहीं चुरा सकता था।
वह थी—
रामनाम।
जिसके पास रामनाम है, उसके लिए बाहरी संग्रह की आवश्यकता कम हो जाती है।
जिसके पास प्रभु का भरोसा है, उसके लिए भविष्य का भय कम हो जाता है।
जिसके पास सेवा है, उसके लिए जीवन व्यर्थ नहीं जाता।
और जिसके भीतर संतोष है, उसके लिए अल्प साधन भी पर्याप्त हो जाते हैं।
यही संत परंपरा का मर्म है।
बड़ी जगह की कथा का सबसे बड़ा चमत्कार ;
यदि इस कथा में किसी चमत्कार की खोज की जाए तो वह किसी असाधारण घटना में नहीं है।
वास्तविक चमत्कार यह है कि—
अभाव में भी सेवा चलती रही।
थोड़े में भी संतोष रहा।
कठिन परिस्थिति में भी भगवान का स्मरण बना रहा।
और साधु ने अपने लिए कुछ माँगने की अपेक्षा भगवान की सेवा को प्राथमिकता दी।
यही सच्चा चमत्कार है।
आज मनुष्य के पास साधन बहुत हैं, लेकिन संतोष कम है।
सूचना बहुत है, लेकिन शांति कम है।
संपत्ति बहुत हो सकती है, लेकिन सुरक्षा का भाव कम हो सकता है।
भोजन अनेक प्रकार का हो सकता है, लेकिन प्रसाद-बुद्धि कम हो सकती है।
ऐसे समय में अयोध्या की यह कथा मनुष्य को वापस मूल प्रश्न पर ले जाती है—
मेरे जीवन में भगवान का स्थान कहाँ है?
राम से क्या सीखें?
श्रीरामचरितमानस हमें केवल श्रीराम की कथा सुनाने के लिए नहीं है।
यह हमें अपने जीवन को देखने का दर्पण देता है।
श्रीराम से हम सीखते हैं—
पिता का सम्मान।
वचन की मर्यादा।
सत्य का पालन।
परिस्थिति में धैर्य।
सत्ता में विनम्रता।
वन में संतोष।
मित्रता में निष्ठा।
शरणागत के प्रति करुणा।
और विजय के बाद भी अहंकार का अभाव।
यही कारण है कि अयोध्या का कोई भी राम - संबंधित स्थान केवल दर्शन करने का स्थान नहीं रह जाता।
वह मनुष्य को स्वयं से प्रश्न करने का अवसर देता है।
दशरथ महल के सामने खड़ा भक्त ;
कल्पना कीजिए— भक्त दशरथ महल के सामने खड़ा है।
वह बाहर की भव्यता देखता है।
फिर भीतर भगवान के दर्शन करता है।
और कुछ क्षण के लिए अपने जीवन की ओर देखता है।
वह स्वयं से पूछता है—
क्या मेरे जीवन में राम के लिए स्थान है?
क्या मैं अपने वचन का पालन करता हूँ?
क्या मैं कठिन परिस्थिति में धैर्य रखता हूँ?
क्या मैं अपने सुख में दूसरों को भूल जाता हूँ?
क्या मैं भगवान को केवल आवश्यकता के समय याद करता हूँ?
क्या मेरी पूजा के पीछे केवल माँग है या समर्पण भी है?
यदि इन प्रश्नों का उत्तर मनुष्य को भीतर से बदल दे, तो वही तीर्थदर्शन सफल है।
क्योंकि तीर्थ केवल बाहर की यात्रा नहीं है।
तीर्थ वह है जहाँ से लौटकर मनुष्य का अंतःकरण पहले जैसा न रहे।
बड़ी जगह वास्तव में किसकी है ?
नाम भले “बड़ी जगह” हो, लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से प्रश्न यह नहीं कि यह किसकी बड़ी जगह है।
प्रश्न यह है कि यहाँ किसका स्मरण बड़ा है।
राम का नाम बड़ा है।
राम की मर्यादा बड़ी है।
राम का त्याग बड़ा है।
राम की करुणा बड़ी है।
राम के चरणों में समर्पण बड़ा है।
और भक्त का छोटा - सा प्रेम भी उसी समय बड़ा हो जाता है जब वह स्वार्थ छोड़कर भगवान को अर्पित हो जाता है।
इसलिए अयोध्या के इस पवित्र स्थान की कथा हमें यह नहीं सिखाती कि भगवान के पास जाने के लिए बहुत धन चाहिए।
यह सिखाती है—
भक्ति चाहिए।
बहुत बड़ा आयोजन चाहिए—ऐसा नहीं।
सच्चा भाव चाहिए।
बहुत बड़ा भोग चाहिए—ऐसा नहीं।
प्रेम से अर्पित किया हुआ थोड़ा भी पर्याप्त है।
बहुत बड़ी तपस्या चाहिए—ऐसा नहीं।
अपने कर्तव्य को ईश्वरार्पण बुद्धि से करना भी साधना है।
अंतिम संदेश ;
!!!!! शुभमस्तु !!!

