श्रीमद्भागवत कथा — प्रार्थना बड़े गहरे अनुभव से प्रकट होती है !

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

श्रीमद्भागवत कथा — प्रार्थना बड़े गहरे अनुभव से प्रकट होती है। 

श्रीमद्भागवत कथा — प्रार्थना बड़े गहरे अनुभव से प्रकट होती है।

प्रार्थना केवल शब्दों का उच्चारण नहीं है।

प्रार्थना मनुष्य के भीतर से तब निकलती है, जब उसे अपने सामर्थ्य की सीमा और परमात्मा की कृपा की विशालता का अनुभव होने लगता है।

मनुष्य जब अपने पास उपस्थित वस्तुओं को केवल अपना अधिकार मानता है, तब उसके भीतर धन्यवाद की भावना कम होती है। 

लेकिन जब वही मनुष्य यह समझने लगता है कि जीवन, प्राण, बुद्धि, अन्न, जल, परिवार, अवसर, साधना और स्वयं ईश्वर का स्मरण करने की शक्ति भी परमात्मा की कृपा से प्राप्त है, तब उसके मुख से स्वाभाविक रूप से निकलता है—

एक ब्राह्मण रोज अपनी प्रार्थना में परमात्मा को धन्यवाद देता था : 

कि अहा, 

तू भी खूब है...!





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“हे प्रभु! आपने मुझे इतना दिया है कि मैं किस - किस वस्तु के लिए आपका धन्यवाद करूँ?”

यही भाव सच्ची प्रार्थना की गहराई है।

लोक में एक प्रसंग इस भाव को समझाने के लिए कहा जाता है कि एक ब्राह्मण प्रतिदिन परमात्मा को धन्यवाद देता था। 

उसके पास संसार की दृष्टि से बहुत अधिक धन - संपत्ति नहीं थी, फिर भी वह कहता था—

“अहा! तू भी खूब है।

मुझ नाकुछ को इतना देता है कि मैं कैसे तेरा धन्यवाद करूँ?

किस जबान से तेरा धन्यवाद करूँ?”

इस प्रसंग का उद्देश्य किसी व्यक्ति-विशेष का इतिहास बताना नहीं है। 

इस लिए इसमें किसी व्यक्ति का नाम, गाँव, राज्य अथवा देश जोड़ना शास्त्रोक्त प्रमाण नहीं होगा। 

इस का वास्तविक महत्व उस कृतज्ञता - भाव में है, जो वैदिक और भागवत परम्परा में भक्ति का अत्यन्त महत्वपूर्ण अंग है।

मुझ नाकुछ को इतना देता है कि मैं कैसे तेरा धन्यवाद करूं? 

किस जबां से तेरा धन्यवाद करूं?

ब्राह्मण...! 

उसके पास कुछ था भी नहीं। 

और रोज धन्यवाद दे। 

उसके गांव में नया और पुराना परिवारिक कुटुब मोशल प्रॉब्लम से हद से ज्यादा गहरा संकटो से भी थक गए थे उसकी बातें सुन — सुनकर। 

फिर एक दिन तो ऐसा हुआ कि उसने उसके घर परिवार वालो को बोल दिया कि मुझे भगवान इधर बुला रहा है में वहां सेटिंग हो जावूगा बाद आपको भी उधर बुला लिया जाएगा ।

एक समय वो उसका वतन से हजारों किलोमीटर की यात्रा पर निकले थे....! 

वो भी टिकट जितना ही पैसा को लेकर रास्ता में रेलवे के कोच में टिकिट तो कम्प्लीट ही था लेकिन ओरिजनल आई डी प्रूफ साथ मे नही था ।

चलती रेलवे में एक कोच से दुशरा कोच पर रेलवे के टीटी के पीछे पीछे धूमते रहते थे रेलवे के टीटी इसको दंड वसूल कर में लगा रहता था....! 

ये बोल रहा था कि मेरा पास कुछ पैसा भी नही है क्या दु आपको मेरा टिकिट तो कंप्लीट है । 

रेलवे के टीटी और ब्राह्मण दोनों एक दुशरो कि भाषा मे परिचित भी नही था टीटी बोल रहा था तो वो समझ नही रहे थे और वो बोल रहे थे तब टीटी समझ नही रहे थे ।  

जैसा तीर्थयात्रा अंतिम स्टेशन नजदीक आ रहा था ब्राह्मण भगवान को प्रार्थना पर प्रार्थना करता रहता और टीटी के पीछे पीछे धूमता रहता था ।

इसी समय वहां एक कोच में टीटी को एक यात्री पूछताछ करते है....! 

कि ये ब्राह्मण आपके पीछे पीछे क्यों घूम रहे है क्या आपका प्रॉब्लम है ।

तब टीटी उस यात्री को सब बात बोल देता है.....! 

+++ +++

तब यात्री ब्राह्मण को उसके बगल में बैठाकर सब बात पुछ लेता है कि तुम किस लिए यात्रा पर आए हो क्या घर छोड़कर आये हो तब ब्राह्मण बोलता है....! 

कि में काम की तलाश में भगवान की भक्ति के लिए ही आया हु घूमने के लिए नही ।

यात्री टीटी के पास से ब्राह्मण का पीछा छुड़वा लेता है....! 

बाद वही यात्री उस ब्राह्मण को खुद के होटल में थोड़ाक दिन रुकता भी है ।

बाद वही यात्री ब्राह्मण को उसका होटल से ब्राह्मण को निकाल देता है और ब्राह्मण गांव के अंदर रोज के किराया पर रूम पकड़ लेता है....! 

लेकिन भगवान का स्थान नही छोड़ता ।

थोड़ा ज्यादा कभी काम भी ब्राह्मण को मिल भी जाता है और यहां के राजकीय आदमी के पास ब्राह्मण के वतन का राजकीय आदमी धूमने के लिए आता है और लिकल वाले राजकीय आदमी उस ब्राह्मण का राजकिय आदमी को बोल रहा है....! 

कि ये अलका वतन का ब्राह्मण है....! 

आप हमारे साथ आये मंदिर के ऑफिस में आप इसका नाम पर ज़िमेदारी पत्र पर आपकी सही कर दे तो इसको इधर ही काम अच्छा मिल जाएगा....! 

प्रार्थना मांगने से आगे की अवस्था है ;


सामान्यतः मनुष्य प्रार्थना को मांगने का माध्यम समझता है।

“हे भगवान! यह दे दीजिए।”

“यह संकट दूर कर दीजिए।”

“यह कार्य सफल कर दीजिए।”

“मेरी इच्छा पूरी कर दीजिए।”

ऐसी प्रार्थना में मनुष्य अपनी आवश्यकता भगवान के सामने रखता है। इसमें दोष नहीं है। 

भक्त अपने दुःख, भय और आवश्यकता को भगवान के सामने रख सकता है।

लेकिन भक्ति की गहराई बढ़ने पर प्रार्थना केवल मांगने तक सीमित नहीं रहती।

वह धन्यवाद बन जाती है।

भक्त कहता है—

“प्रभु! आपने जो दिया है, पहले उसके लिए मैं आपका धन्यवाद करूँ। 

जो नहीं मिला, उसके लिए शिकायत बाद में करूँगा।”

यहीं से प्रार्थना का स्वरूप बदल जाता है।

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण अनन्य भाव से भगवान की उपासना करने वाले भक्तों के संबंध में कहते हैं—

“अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥”
— श्रीमद्भगवद्गीता 9.22

अर्थात जो भक्त अनन्य भाव से भगवान का चिन्तन करते हुए उनकी उपासना करते हैं, उनके योगक्षेम का भार भगवान स्वयं वहन करते हैं।

यहाँ “योगक्षेम” केवल सांसारिक वस्तुओं की प्राप्ति और सुरक्षा तक सीमित समझना उचित नहीं है। 

भक्तिपरम्परा में यह भगवान के प्रति आश्रय और विश्वास का गहरा सिद्धान्त है।

इस लिए सच्ची प्रार्थना का एक आधार विश्वास है।

भक्त कहता है—

“मैं सब कुछ नहीं जानता, पर मेरा भगवान जानता है।”

“मुझ नाकुछ को इतना देता है”—इस वाक्य का वास्तविक अर्थ

जब वह ब्राह्मण कहता है—

+++ +++

“मुझ नाकुछ को इतना देता है…”


तो इसका अर्थ केवल यह नहीं कि भगवान ने उसे धन दे दिया।

“मुझ नाकुछ” कहना अपने अहंकार को छोटा करना है।

मनुष्य सोचता है—

“मैंने कमाया।”

“मैंने बनाया।”

“मैंने सफलता प्राप्त की।”

“मेरी बुद्धि से यह हुआ।”

लेकिन शास्त्रीय दृष्टि मनुष्य को इससे आगे ले जाती है।

जिस बुद्धि से मनुष्य विचार करता है, जिस शरीर से कर्म करता है, जिस वाणी से बोलता है, जिस प्राण से जीवित रहता है और जिस चेतना से संसार को अनुभव करता है—

इन सबका मूल आधार क्या है?


इस प्रश्न पर मनन करने से अहंकार धीरे - धीरे नम्रता में बदलता है।

श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध में ब्रह्माजी भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अपनी प्रार्थना में एक अत्यन्त गहरा सिद्धान्त प्रस्तुत करते हैं—

“तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्षमाणो
भुञ्जान एवात्मकृतं विपाकम्।
हृद्वाग्वपुर्भिर्विदधन्नमस्ते
जीवेत यो मुक्तिपदे स दायभाक्॥”
— श्रीमद्भागवत 10.14.8

भाव यह है कि जो जीव अपने कर्मों के परिणाम को सहते हुए भी भगवान की कृपा की प्रतीक्षा करता है और हृदय, वाणी तथा शरीर से भगवान को नमस्कार करता रहता है, वह भगवान की कृपा का अधिकारी बनता है।

यह श्लोक प्रार्थना की गहराई समझने के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है।

आपका पास हौदों है पावर है तो आपकी सही इस ब्राह्मण की जीवन सुधार देगी....! 

लेकिन वो राजकीय आदमी उसका अहंकार में इतना मस्त था....! 

कि उसने सही करने को मना बोल दिया ।

+++ +++

उस ब्राह्मण ने ऐसा प्रार्थना कर के भगवान को धन्यवाद कर दिया....! 

कि तीन से चार ही मास में उसका बड़ा लड़का 45 साल का हदयरोग के हुमला आ गया....! 

फिर जैसा थोड़ाक दिन हुवा तो वही राजकीय आदमी के ऊपर कोर्ट कचहरी के चक्कर काटने का समय आ गया वो भी बहुत खर्च करने के बाद कोर्ट कचहरी ने उसके हाथ मे सस्पेंड का ओडर तो थमा ही दिया......!  

लेकिन उस ब्राह्मण तो भगवान को धन्यवाद पर धन्यवाद करता रहता है ।

यहाँ भक्त केवल यह नहीं कहता—

“भगवान! मेरा दुःख तुरंत समाप्त कर दीजिए।”

बल्कि उसका भाव होता है—

“प्रभु! जो कर्मफल सामने आया है, उससे मैं भागूँ नहीं; उसे सहन करने की शक्ति दीजिए और आपकी कृपा में मेरा विश्वास बना रहे।”

यही प्रार्थना को गहरा बनाता है।

सुख मिला तो धन्यवाद, दुःख मिला तो भी भगवान का स्मरण

कृतज्ञता की परीक्षा सुख में नहीं, दुःख में होती है।

सुख में भगवान को धन्यवाद देना सरल है।

लेकिन जब मनुष्य की इच्छा पूरी न हो, जब परिस्थिति उसके अनुसार न चले, जब कठिनाई सामने आए, तब भी वह कह सके—

“हे प्रभु! मैं परिस्थिति का सम्पूर्ण अर्थ नहीं समझ पा रहा हूँ, फिर भी आपका आश्रय नहीं छोड़ूँगा।”

+++ +++

तो यह श्रद्धा की गहराई है।


श्रीमद्भागवत 10.14.8 में ब्रह्माजी का प्रार्थना-भाव इसी दिशा में संकेत करता है—

मनुष्य अपने कर्मों के फल को सहन करते हुए भगवान की कृपा को देखे और हृदय, वाणी तथा शरीर से भगवान को नमस्कार करे।

इस लिए प्रार्थना का अर्थ केवल संकट से बच निकलना नहीं है।

कभी - कभी प्रार्थना यह भी होती है—

“प्रभु! संकट के बीच मेरा विवेक नष्ट न हो।”

“दुःख के बीच मेरी श्रद्धा न टूटे।”

“सुख के बीच मेरा अहंकार न बढ़े।”

“जो मिला है, उसके लिए मैं कृतज्ञ रहूँ।”

भगवान ने कितना दिया—इसका हिसाब कौन कर सकता है?

मनुष्य सामान्यतः भगवान से मिली वस्तुओं की गणना नहीं करता।

पर। 

कभी कभी आज के दिन पर भी उस ब्राह्मण को न खाना पूरा मिला कभी कभी  तीन दिन सात दिन एकविस दिन तक पानी पर दिन गुजरता रहता है ।

गांव के ज्यादातर लोग उस ब्राह्मण के खिलाफ थे, जैसे लोग परदेशी लोगो के खिलाफ सदा से रहे हैं। 

+++ +++

लोग कहते थे, वह बाहर का हिंदी भाषी परदेशी ब्राह्मण है । 

इस लिए इसको मंदिर के अंदर का पुजारी ब्राह्मणों ने ज्यादातर काम करने के लिए रखा भी नही था और लोकल वाले दुशरा लोगो को उसकेर कर इस ब्राह्मण को मारपीट खिलाकर मंदिर बाहर करवा दिया था ।

लेकिन इसने गांव के दुशरा ब्राह्मणों के साथ काम करना भी शुरू भी कर दिया थोड़ा ज्यादा काम भी मिल जाते थे....! 

वह केवल जो नहीं मिला उसकी गणना करता रहता है।

एक व्यक्ति के पास घर है, लेकिन वह बड़ा घर चाहता है।

धन है, लेकिन अधिक धन चाहता है।

स्वास्थ्य है, लेकिन दूसरी इच्छा पूरी न होने का दुःख है।

परिवार है, लेकिन परिवार में किसी एक बात को लेकर असंतोष है।

जीवन मिला है, लेकिन जीवन की अनेक छोटी कठिनाइयों को देखकर वह कहता है—

“मेरे पास कुछ नहीं है।”

यहीं कृतज्ञता की शिक्षा आवश्यक हो जाती है।

भक्त अपने जीवन को दूसरी दृष्टि से देखता है।

वह पूछता है—

“मुझे क्या नहीं मिला?” से पहले

“मुझे क्या-क्या मिला हुआ है?”

यह प्रश्न मनुष्य के भीतर परिवर्तन ला सकता है।

इस मे मंदिर का ब्राह्मणों ने फिर गांव के लोकल लोगो को उसकेर कर गांव के ब्राह्मणों का साथ लड़ाई झगड़े करके उस ब्राह्मण को काम पर रखने को मना बोल दिया था ।

अब वह ब्राह्मण अपने ही घर मे अकेला अकेला पूराकर बैठा रहता है....!  

गांव के अमुक उसका दोस्तो  के बीच कहता है बैठकर : 

"अनलहक' —— 

कि मुझे भगवान इधर लाये है में आया इधर हूं। 

यह बात ठीक भी है कि ये ब्राह्मण रॉड पर खड़ा रहता तो एक दो यात्री भी मिल जाते है.....! 

उसको अगल बगल के स्थान भी घुमा देता है तो कुछ मिल जाते है....! 


इसको इसका खर्च जितना लेकिन अमुक लोग लोग ऐसा करने ही नहीं देते है। 


यह  किसी को कुछ नही कहेगा भगवान की मर्जी ऐसा हो तो ऐसा ही होता है।

उस ब्राह्मण के पास ठहरने की जग्या तो है.....! 

लेकिन आवक का कोई साधन भी नही है.....! 

किराया जितना पैसा कोई न कोई भेज देता भी देगा लेकिन कोई दुशरा आवक जितना पैसा नहीं देगा। 

दुशरा आवक ही नही होगा तो भोजन भीं कहा से मिलेगा। 

फिर उस ब्राह्मण ने कभी भी किसी के पास लंबा हाथ तो किया ही नही करता भी नही वो तो एक ही बात उसका दोस्तो को बोलता रहता है.....! 

कि भूखा रहना अच्छा है लेकिन किसी के पास हाथ लंबा नही करना भगवान मुझे इधर लाये है क्यों में सामने से तो आया नही हु ।

मगर उस ब्राह्मण ने फिर वही कहा कि हे प्रभु! 

उसकी आंखें चमक रही हैं आनंद से। 

उसके चेहरे पर फिर वही आनंद का भाव, फिर वही प्रार्थना : 

"हे प्रभु! 

प्रार्थना बड़े गहरे अनुभव से प्रकट होती है।


यही भाव प्रार्थना को विनम्र बनाता है।

प्रार्थना का मूल्य शब्दों की संख्या में नहीं है

बहुत लंबी प्रार्थना करना ही श्रेष्ठ प्रार्थना नहीं है।

कभी-कभी दो शब्द भी हृदय को भगवान के सामने खोल देते हैं—

“हे प्रभु! धन्यवाद।”

कभी—

“हे नाथ! मुझे संभालिए।”

कभी—

“जो उचित हो, वही कीजिए।”

और कभी—

“आपका दिया पर्याप्त है।”

प्रार्थना की शक्ति शब्दों की संख्या से नहीं, हृदय की अवस्था से समझी जानी चाहिए।

यदि मुख से बहुत कुछ बोला जाए और मन संसार के अहंकार से भरा रहे, तो प्रार्थना का भाव कमजोर हो सकता है।

और यदि आँखों में आँसू हों, हृदय में नम्रता हो और मुख से केवल—

“हे भगवान!”

निकल सके, तो वही पुकार मनुष्य के लिए अत्यन्त गहरी साधना बन सकती है।

भगवान के सामने अपनी “नाकुछता” स्वीकार करना

मनुष्य का सबसे बड़ा बंधन अहंकार है।

“मैं” और “मेरा” का भाव उसे भगवान से दूर करता है।

इसलिए जब भक्त कहता है—

तेरा बड़ा धन्यवाद है। 

तू सदा मुझे जिस चीज की जरूरत होती है, पहुंचा देता है।'
 
एक दोस्त ने कहा कि अब बस, ठहरो! 

अब हद हो गई। 

जिस चीज की जरूरत होती है, पहुंचा देता है। 

और कभी कभी तीन दिन सात दिन पन्द्र दिन बिस दिन से हम भी तुम्हारे साथ हैं...! 

जिस चीज की जरूरत है, वही नहीं मिली है। 

प्राण मिले।

बुद्धि मिली।

कर्म करने की शक्ति मिली।

ईश्वर का नाम मिला।

शास्त्र सुनने का अवसर मिला।

सत्संग का अवसर मिला।

गलती सुधारने का अवसर मिला।

पुनः प्रयास करने का अवसर मिला।

और सबसे बड़ी बात—भगवान को पुकारने की स्वतंत्रता मिली।

तब भक्त कहता है—

“प्रभु! मैं आपके दिए हुए का मूल्य भी पूरा नहीं समझ पाया और फिर भी आपसे नई-नई वस्तुएँ मांगता रहा।”


रोटी नहीं मिली, पानी पीकर दिन रात गुजारने को तो मिला। 

अब और क्या है ? 

मिला क्या है इतना सालों में ?

उस ब्राह्मण ने कहा, तुम बीच में मत बोलो। 

वह मेरी जरूरत का खयाल रखता है। 

इतना दिन तक भूखे रखना, इतना दिन तक भूखे रहना मेरे लिए लाभ का हुआ है। 

+++ +++

इतना दिन तक भूख और अपमान खाने के बाद भी मैं प्रार्थना कर सकूं, यही मेरी जरूरत थी। 

उसने अवसर दिया। 

सुख मिले तब धन्यवाद देना तो बहुत आसान है पागलो! 

जब दुःख मिले तब धन्यवाद देने की क्षमता प्रार्थना की ही छाती में होती है।

उसने मुझे एक मौका दिया। उसने मुझे एक अवसर दिया। 

मगर मैं भी समझ गया कि अवसर क्यों दे रहा है। 

वह इसलिए दे रहा है कि अब देखूं। 

एक दिन उसने कुछ भी न दिया, भूखा रखा, फिर भी मैंने प्रार्थना की। 

“मुझ नाकुछ को इतना देते हो…”

तो वह स्वयं को अपमानित नहीं कर रहा।

वह अपने अहंकार का त्याग कर रहा है।

उसका आशय है—

“प्रभु! आपकी व्यवस्था के सामने मेरा सामर्थ्य सीमित है।”

यह नम्रता भक्ति का आधार बनती है।

भक्त यह भी समझता है कि भगवान को धन्यवाद देने के लिए पहले भगवान को किसी वस्तु से प्रसन्न करना आवश्यक नहीं है।

कृतज्ञता स्वयं साधना है।

धन्यवाद में शिकायत क्यों कम हो जाती है?

जब मनुष्य प्रतिदिन अपने जीवन में प्राप्त कृपाओं को देखना प्रारम्भ करता है, तो शिकायत का भार कम होने लगता है।

इसका अर्थ यह नहीं कि वास्तविक दुःख समाप्त हो जाता है।

दुःख तो कर्म और परिस्थितियों के अनुसार जीवन में आ सकता है।

लेकिन दुःख को देखने का दृष्टिकोण बदल सकता है।

एक व्यक्ति कहता है—

“मेरे साथ ही ऐसा क्यों हुआ?”

दूसरा कहता है—

“यह परिस्थिति भी मेरे जीवन का एक कर्मफल है; प्रभु मुझे इसे सहने की शक्ति दें।”

दोनों के सामने परिस्थिति एक ही हो सकती है, लेकिन दोनों की आन्तरिक अवस्था अलग हो सकती है।

श्रीमद्भागवत 10.14.8 का भाव इसी प्रकार भगवान की कृपा में स्थिर रहने की ओर संकेत करता है।

सच्ची प्रार्थना में भगवान साधन नहीं, साध्य बनते हैं

सांसारिक प्रार्थना में कभी-कभी भगवान साधन बन जाते हैं और इच्छा साध्य बन जाती है।

+++ +++

मनुष्य कहता है—

“भगवान की पूजा करूँगा तो मेरा काम हो जाएगा।”

लेकिन भक्ति की गहराई में स्थिति बदलती है।

अब भगवान साधन नहीं रहते।

भगवान ही साध्य बन जाते हैं।

भक्त कहता है—

“मुझे आपकी इच्छा के अनुसार चलना है।”

यही कारण है कि श्रीमद्भगवद्गीता में अनन्य भक्ति का वर्णन करते हुए भगवान कहते हैं कि जो लोग निरन्तर उनका चिन्तन करते हुए उनकी उपासना करते हैं, उनके योगक्षेम का भार भगवान वहन करते हैं।

अर्थात भक्त का भरोसा केवल परिणाम पर नहीं, भगवान पर होता है।

इस लिए “धन्यवाद” भी एक साधना है

दूसरे दिन भी उसने कहा, अच्छा ठीक है, एक दिन तूने कर ली, दूसरे दिन? 

दूसरा दिन भी बीत गया, अब यह तीसरा दिन भी आ गया। 

उसने फिर एक मौका दिया कि आज तीसरा दिन फिर आ गया। 

अब तू बिल्कुल भूखा है...!


जीर्ण — जर्जर है, गिरा पड़ता है, अब तू धन्यवाद देगा कि नहीं देगा? 

अब तो रुकेगा न? 

अब तो बंद कर देगा प्रार्थना। 

मगर मैंने कहा कि तू मुझे हरा न सकेगा। 

मैं धन्यवाद देता ही जाऊंगा। 

अंतिम घड़ी तक धन्यवाद देता चला जाऊंगा। 

जब तक श्वास है, धन्यवाद उठेगा। 

श्वास ही न रहे तो फिर बात और। 

मरते क्षण तक ओंठ पर धन्यवाद होगा। 

+++ +++

तू अगर मौत भी देगा तो वह मेरी जरूरत है तो ही देगा; 

नहीं तो क्यों देगा ?

इसका नाम श्रद्धा है। 

इसका नाम प्रार्थना है। 

प्रार्थना की नहीं जाती। 

प्रार्थना बड़े गहरे अनुभव से प्रकट होती है !!

यदि प्रतिदिन प्रार्थना के समय मनुष्य केवल यह पूछे—

“आज भगवान ने मुझे क्या नहीं दिया?”

तो मन शिकायत से भर सकता है।

लेकिन यदि वह पूछे—

“आज भगवान ने मुझे क्या-क्या दिया?”

तो दृष्टि बदल सकती है।

आज श्वास मिली—धन्यवाद।

आज अन्न मिला—धन्यवाद।

आज शरीर ने साथ दिया—धन्यवाद।

आज किसी शास्त्र का एक वचन समझ आया—धन्यवाद।

आज भगवान का नाम लेने का अवसर मिला—धन्यवाद।

आज गलती समझ में आई—धन्यवाद।

आज कठिन परिस्थिति में धैर्य रखने का अवसर मिला—धन्यवाद।

और यदि दुःख आया, तो—

“प्रभु! इस दुःख को समझने की बुद्धि और सहने की शक्ति भी आप ही दें।”

यही कृतज्ञता प्रार्थना को गहरा अनुभव बना देती है।

अंतिम भाव ;


उस लोकप्रचलित प्रसंग में ब्राह्मण का धन कितना था, उसके पास क्या - क्या वस्तुएँ थीं, वह कहाँ रहता था—

इन बातों का कोई शास्त्रोक्त प्रमाण प्रस्तुत किए बिना उन्हें सत्य घटना के रूप में कहना उचित नहीं है।

लेकिन उसका मूल संदेश अत्यन्त गहरा है—

मनुष्य के पास कम हो सकता है, फिर भी उसका हृदय कृतज्ञ हो सकता है।

और किसी मनुष्य के पास बहुत कुछ हो सकता है, फिर भी उसका हृदय शिकायत से भरा हो सकता है।

इसलिए वास्तविक समृद्धि केवल वस्तुओं की संख्या में नहीं है।

वास्तविक समृद्धि यह समझने में है कि—

“जो कुछ मिला है, वह मेरे अहंकार का प्रमाण नहीं; परमात्मा की कृपा को पहचानने का अवसर है।”

तब प्रार्थना बदल जाती है।

पहले मनुष्य कहता है—

“हे भगवान! मुझे यह दीजिए।”

फिर कहता है—

“हे भगवान! जो दिया है, उसके लिए धन्यवाद।”

और अंततः—

“हे भगवान! मुझे आपकी इच्छा में संतोष और आपके स्मरण में स्थिरता दीजिए।”

यही प्रार्थना की गहराई है।

यही कृतज्ञता का भाव है।

और यही वह भाव है जिसमें भक्त अपने अभाव को नहीं, भगवान की कृपा को देखने लगता है।

इसलिए हृदय से निकली हुई छोटी-सी प्रार्थना भी बहुत बड़ी हो सकती है—

“हे श्रीकृष्ण!

आपने जो दिया, उसके लिए धन्यवाद।
जो नहीं दिया, उसके लिए भी आपकी इच्छा को प्रणाम।
जो दुःख आया, उसे सहने की शक्ति दीजिए।
जो सुख मिला, उसमें अहंकार से बचाइए।
और सबसे बढ़कर—
मेरे हृदय से आपका स्मरण कभी दूर न हो।”

जय श्री कृष्णा 🙏

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