श्रीमहाभारतम् , :

श्रीमहाभारतम्  ,   

श्रीमहाभारतम् 

।। श्रीहरिः ।।

* श्रीगणेशाय नमः *

।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।

(आस्तीकपर्व)

त्रयोदशोऽध्यायः

जरत्कारु का अपने पितरों के अनुरोध से विवाह के लिये उद्यत होना...!

शौनक उवाच





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किमर्थं राजशार्दूलः स राजा जनमेजयः । 

सर्पसत्रेण सर्पाणां गतोऽन्तं तद् वदस्व मे ।। १ ।। 

निखिलेन यथातत्त्वं सौते सर्वमशेषतः । 

आस्तीकश्च द्विजश्रेष्ठः किमर्थं जपतां वरः ।। २ ।। 

मोक्षयामास भुजगान् प्रदीप्ताद् वसुरेतसः । 

कस्य पुत्रः स राजासीत् सर्पसत्रं य आहरत् ।। ३ ।। 

स च द्विजातिप्रवरः कस्य पुत्रोऽभिधत्स्व मे ।


शौनकजीने पूछा-सूतजी ! 

राजाओंमें श्रेष्ठ जनमेजयने किसलिये सर्पसत्रद्वारा सर्पोंका अन्त किया? 

यह प्रसंग मुझसे कहिये। 

सूतनन्दन ! 

इस विषयकी सब बातोंका यथार्थरूपसे वर्णन कीजिये। 

जप - यज्ञ करनेवाले पुरुषोंमें श्रेष्ठ विप्रवर आस्तीकने किसलिये सर्पोको प्रज्वलित अग्निमें जलनेसे बचाया और वे राजा जनमेजय, जिन्होंने सर्पसत्रका आयोजन किया था, किसके पुत्र थे? 

तथा द्विजवंशशिरोमणि आस्तीक भी किसके पुत्र थे? 

यह मुझे बताइये ।। १ -३३ ।।


सौतिरुवाच


महदाख्यानमास्तीकं यथैतत् प्रोच्यते द्विज ।। ४ ।। 

सर्वमेतदशेषेण शृणु मे वदतां वर ।


उग्रश्रवाजीने कहा- ब्रह्मन् ! 

आस्तीकका उपाख्यान बहुत बड़ा है। 

वक्ताओंमें श्रेष्ठ ! 

यह प्रसंग जैसे कहा जाता है, वह सब पूरा-पूरा सुनो ।। ४३ ।।


शौनक उवाच


श्रोतुमिच्छाम्यशेषेण कथामेतां मनोरमाम् ।। ५ ।।


आस्तीकस्य पुराणर्षेर्बाह्मणस्य यशस्विनः ।


शौनकजीने कहा- सूतनन्दन ! 

पुरातन ऋषि एवं यशस्वी ब्राह्मण आस्तीककी इस मनोरम कथाको मैं पूर्णरूपसे सुनना चाहता हूँ ।। ५३ ।।




सौतिरुवाच


इतिहासमिमं विप्राः पुराणं परिचक्षते ।। ६ ।। 

कृष्णद्वैपायनप्रोक्तं नैमिषारण्यवासिषु । 

पूर्व प्रचोदितः सूतः पिता मे लोमहर्षणः ।। ७ ।। 

शिष्यो व्यासस्य मेधावी ब्राह्मणेष्विदमुक्तवान् । 

तस्मादहमुपश्रुत्य प्रवक्ष्यामि यथातथम् ।। ८ ।।


उग्रश्रवाजीने कहा- 

शौनकजी! ब्राह्मणलोग इस इतिहासको बहुत पुराना बताते हैं। 

पहले मेरे पिता लोमहर्षणजीने, जो व्यासजीके मेधावी शिष्य थे, ऋषियोंके पूछनेपर साक्षात् श्रीकृष्णद्वैपायन ( व्यास ) के कहे हुए इस इतिहासका नैमिषारण्यवासी ब्राह्मणोंके समुदायमें वर्णन किया था। 

उन्हींके मुखसे सुनकर मैं भी इसका यथावत् वर्णन करता हूँ ।। ६-८ ।।


इदमास्तीकमाख्यानं तुभ्यं शौनक पृच्छते । 

कथयिष्याम्यशेषेण सर्वपापप्रणाशनम् ।। ९ ।।


शौनकजी ! यह आस्तीक मुनिका उपाख्यान सब पापोंका नाश करनेवाला है। 

आपके पूछनेपर मैं इसका पूरा - पूरा वर्णन कर रहा हूँ ।। ९ ।।


आस्तीकस्य पिता ह्यासीत् प्रजापतिसमः प्रभुः । 

ब्रह्मचारी यताहारस्तपस्युग्रे रतः सदा ।। १० ।।


आस्तीकके पिता प्रजापतिके समान प्रभावशाली थे। 

ब्रह्मचारी होनेके साथ ही उन्होंने आहारपर भी संयम कर लिया था। 

वे सदा उग्र तपस्यामें संलग्न रहते थे ।। १० ।।


जरत्कारुरिति ख्यात ऊर्ध्वरता महातपाः । 

स यायावराणां प्रवरो धर्मज्ञः संशितव्रतः ।। ११ ।।  

कदाचिन्महाभागस्तपोबलसमन्वितः । 

चचार पृथिवीं सर्वां यत्रसायंगृहो मुनिः ।। १२ ।।


उनका नाम था जरत्कारु। 

वे ऊध्र्वरता और महान् ऋषि थे। 

यायावरों में उनका स्थान सबसे ऊँचा था। 

वे धर्मके ज्ञाता थे। 

एक समय तपोबलसे सम्पन्न उन महाभाग जरत्कारुने यात्रा प्रारम्भ की। 

वे मुनि - वृत्तिसे रहते हुए जहाँ शाम होती वहीं डेरा डाल देते थे ।। ११-१२ ।।


तीर्थेषु च समाप्लावं कुर्वन्नटति सर्वशः । 

चरन् दीक्षां महातेजा दुश्चरामकृतात्मभिः ।। १३ ।।


वे सब तीर्थोंमें स्नान करते हुए घूमते थे। 

उन महातेजस्वी मुनिने कठोर व्रतोंकी ऐसी दीक्षा लेकर यात्रा प्रारम्भ की थी, जो अजितेन्द्रिय पुरुषोंके लिये अत्यन्त दुःसाध्य थी ।। १३ ।।

क्रमशः...

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