सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता, किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
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|| पूजा करते समय कमर और गर्दन सीधी क्यो रखनी चाहिए ? / मां दुर्गा प्रश्नावली / श्री गणेशजी की रोचक कथा : ||
जय द्वारकाधीश
।। श्री सामवेद प्रवचन ।।
*गीले सिर पूजा क्यो नहीं करनी चाहिए ?*
जब हम पूजा करते है तो कमर और गर्दन को सीदा रखने को कहा जाता है ।
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ऐसा क्यो कहा जाता है ?
इसका मुख्य कारण है कि जब हम पूजा करते है तो ध्यान अंतिरक्ष मे जाता है ।
और ध्यान को ऊपर ले जाने मे सुषुम्णा नाड़ी का बहुत बड़ा योगदान होता है ।
यह नाड़ी रीड की हड्डी मे से होकर ब्रह्मरंध्र चक्र से जुड़ी होती है ।
अगर कमर और गर्दन झुक जाएंगी तो नाड़ी भी झुक जाएगी ।
अगर नाड़ी झुक जाएगी तो ब्रह्मरंध्र की नाड़ियाँ धुलोक से संपर्क बनाने मे असमर्थ हो जाती है ।
क्योकि तरंगो की दिशा नीचे की ओर हो जाती है ।
और जो ध्यान की तरंगे ऊपर को जानी चाहिए ।
वो नीचे को जाना शुरू कर देती है ।
ध्यान हमेशा ऊपर को सोचने से ही लगता है ।
इस लिए हवन यज्ञ ध्यान और पूज पाठ मे हमेशा कमर और गर्दन को सीदा रखना चाहिए ।
अगर आप जल्दी वाजी मे गीले सिर पूजा करते हो तो बहुत हानिकारक होता है ।
तथा जमीन पर बिना कुचालक आसन के बैठ जाते हो तो भी बहुत हानिकारक होता है ।
जब आप पूजा करते हो तो उस समय आपके शरीर से विधुत तरंगे निकलती है ।
और आपका सिर गीला होता है तो वो विधुत तरंगे गीले सिर के वालो मे ही विलय कर जाती है ।
जिसके कारण ध्यान क्रिया तो वाधित होती ही है इसके साथ साथ सिर मे भयंकर बीमारियो का जन्म हो जाता है ।
इसी प्रकार जब आप खाली जमीन पर बैठते हो तरंगे मूलाधार चक्र से भी गुदा के द्वार से बाहर निकलती है तथा वो प्रथवि के चुम्बकीय क्षेत्र मे संपर्क बना लेती है ।
जिसके कारण वो तरंगे जमीन मे चली जाती है ।
जो शरीर की पॉज़िटिव ऊर्जा को खीच लेती है ।
जो ध्यान से उत्पन्न होती है ।
क्योकि पृथ्वी सुचालक का काम करती है ।
इस लिए पूजा करते समय कुचालक आसन का प्रयोग करना चाहिए ।
जिससे उत्पन्न तरंगे सीदे ऊपर की ओर जाये तथा ध्यान और पूजा मे सहायक बन जाए।
जैसे रामायण में राम सलाका है ठीक वैसा ही नवदुर्गा प्रश्नावली चक्र है।
इस चक्र के माध्यम से आप अपने जीवन की परेशानियों व सवालों का हल आसानी से पा सकते हैं।
इस चक्र की उपयोग विधि इस प्रकार है-
जिसे भी अपने सवालों का जवाब या परेशानियों का हल जानना है वो पहले पांच बार ऊं का जप करे इसके बाद आंखें बंद करके अपना सवाल पूछें।
और माता दुर्गा का स्मरण करते हुए प्रश्नावली चक्र पर ऊँगली घुमाते हुए रोक दें।
जिस कोष्ठक ( खाने ) पर ऊँगली रुके, उस कोष्ठ क में लिखे अंक के फलादेश को ही अपने प्रश्न का उत्तर समझें।
जैसे यदि किसी अंक 1 या 2 पर रुके तो आपके प्रश्न का उत्तर ये होगा-
1- धन लाभ होगा एवं
मान - सम्मान भी मिलेगा।
2- धन हानि अथवा अन्य प्रकार का
अनिष्ट होने की आशंका है।
3-अभिन्न मित्र अथवा प्रिय से मिलन होगा,
जिससे मन प्रफुल्लित होगा।
4- कोई व्याधि अथवा रोग होने की आशंका है,
अत: कार्य अभी टाल देना ही ठीक रहेगा।
5- जो भी कार्य आपने सोचा है, उसमें
आपको सफलता मिलेगी, निश्चिंत रहें।
6- कुछ दिन कार्य टाल दें।
इसमें किसी से कलह अथवा कहा सुनी हो सकती है, जिसके दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं।
7- आपका अच्छा समय शुरू हो गया है।
शीघ्र ही सुंदर एवं स्वस्थ पुत्र होने के योग हैं।
इस के अतिरिक्त आपकी अन्य मनोकामनाएं भी पूर्ण होंगी।
8- विचार पूरी तरह त्याग दें।
इस कार्य में मृत्यु तुल्य कष्ट की आशंका है।
यहां तक कि मृत्यु भय भी है।
9- समाज अथवा सरकार की दृष्टि में सम्मान बढ़ेगा।
आपका सोचा हुआ कार्य अच्छा है।
10- आपको अपेक्षित लाभ प्राप्त होगा,
अत: कार्यारंभ कर सकते हैं।
11- आप जिस कार्य के बारे में सोच रहे हैं,
उसमें हानि की आशंका है।
12-आपकी मनोकामना पूर्ण होगी।
पुत्र से भी आपको विशेष लाभ मिलेगा।
13- शनिदेव की उपासना करें,
कार्य में आ रही बाधाएं दूर होंगी।
14- आपका अच्छा समय शुरू हो गया है।
चिंताएं मिटेंगी, सुख - संपत्ति प्राप्त होगी।
15- आर्थिक तंगी के कारण ही आपके घर में सुख - शांति नहीं है।
एक माह बाद स्थितियां बदलने लगेंगी, धैर्य एवं संयम रखें।
|| मां देवी दुर्गाजी की जय हो ||
श्री गणेशजी की रोचक कथा :
एक समय की बात है कि विष्णु भगवान का विवाह लक्ष्मीजी के साथ निश्चित हो गया।
विवाह की तैयारी होने लगी।
सभी देवताओं को निमंत्रण भेजे गए....!
परंतु गणेशजी को निमंत्रण नहीं दिया....!
कारण जो भी रहा हो।
अब भगवान विष्णु की बारात जाने का समय आ गया।
सभी देवता अपनी पत्नियों के साथ विवाह समारोह में आए।
उन सबने देखा कि गणेशजी कहीं दिखाई नहीं दे रहे हैं।
तब वे आपस में चर्चा करने लगे कि क्या गणेशजी को नहीं न्योता है?
या स्वयं गणेशजी ही नहीं आए हैं?
सभी को इस बात पर आश्चर्य होने लगा।
तभी सबने विचार किया कि विष्णु भगवान से ही इसका कारण पूछा जाए।
विष्णु भगवान से पूछने पर उन्होंने कहा कि हमने गणेशजी के पिता भोलेनाथ महादेव को न्योता भेजा है।
यदि गणेशजी अपने पिता के साथ आना चाहते तो आ जाते....!
अलग से न्योता देने की कोई आवश्यकता भी नहीं थीं।
दूसरी बात यह है कि उनको सवा मन मूंग, सवा मन चावल, सवा मन घी और सवा मन लड्डू का भोजन दिनभर में चाहिए।
यदि गणेशजी नहीं आएंगे तो कोई बात नहीं।
दूसरे के घर जाकर इतना सारा खाना - पीना अच्छा भी नहीं लगता।
इतनी वार्ता कर ही रहे थे कि किसी एक ने सुझाव दिया -
यदि गणेशजी आ भी जाएं तो उनको द्वारपाल बनाकर बैठा देंगे कि आप घर की याद रखना।
आप तो चूहे पर बैठकर धीरे - धीरे चलोगे तो बारात से बहुत पीछे रह जाओगे।
यह सुझाव भी सबको पसंद आ गया....!
तो विष्णु भगवान ने भी अपनी सहमति दे दी।
होना क्या था कि इतने में गणेशजी वहां आ पहुंचे और उन्हें समझा - बुझाकर घर की रखवाली करने बैठा दिया।
बारात चल दी, तब नारदजी ने देखा कि गणेशजी तो दरवाजे पर ही बैठे हुए हैं....!
तो वे गणेशजी के पास गए और रुकने का कारण पूछा।
गणेशजी कहने लगे कि विष्णु भगवान ने मेरा बहुत अपमान किया है।
नारदजी ने कहा कि आप अपनी मूषक सेना को आगे भेज दें....!
तो वह रास्ता खोद देगी जिससे उनके वाहन धरती में धंस जाएंगे....!
तब आपको सम्मानपूर्वक बुलाना पड़ेगा।
अब तो गणेशजी ने अपनी मूषक सेना जल्दी से आगे भेज दी और सेना ने जमीन पोली कर दी।
जब बारात वहां से निकली तो रथों के पहिए धरती में धंस गए।
लाख कोशिश करें....!
परंतु पहिए नहीं निकले।
सभी ने अपने - अपने उपाय किए....!
परंतु पहिए तो नहीं निकले....!
बल्कि जगह - जगह से टूट गए।
किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या किया जाए।
तब तो नारदजी ने कहा -
आप लोगों ने गणेशजी का अपमान करके अच्छा नहीं किया।
यदि उन्हें मनाकर लाया जाए तो आपका कार्य सिद्ध हो सकता है और यह संकट टल सकता है।
शंकर भगवान ने अपने दूत नंदी को भेजा और वे गणेशजी को लेकर आए।
गणेशजी का आदर - सम्मान के साथ पूजन किया....!
तब कहीं रथ के पहिए निकले।
अब रथ के पहिए निकल को गए....!
परंतु वे टूट - फूट गए....!
तो उन्हें सुधारे कौन?
पास के खेत में खाती काम कर रहा था....!
उसे बुलाया गया।
खाती अपना कार्य करने के पहले 'श्री गणेशाय नम:'
कहकर गणेशजी की वंदना मन ही मन करने लगा।
देखते ही देखते खाती ने सभी पहियों को ठीक कर दिया।
तब खाती कहने लगा कि हे देवताओं!
आपने सर्वप्रथम गणेशजी को नहीं मनाया होगा और न ही उनकी पूजन की होगी....!
इसी लिए तो आपके साथ यह संकट आया है।
हम तो मूरख अज्ञानी हैं....!
फिर भी पहले गणेशजी को पूजते हैं.....!
उनका ध्यान करते हैं।
आप लोग तो देवतागण हैं....!
फिर भी आप गणेशजी को कैसे भूल गए ?
अब आप लोग भगवान श्री गणेशजी की जय बोलकर जाएं...!
तो आपके सब काम बन जाएंगे और कोई संकट भी नहीं आएगा।
ऐसा कहते हुए बारात वहां से चल दी और विष्णु भगवान का लक्ष्मीजी के साथ विवाह संपन्न कराके सभी सकुशल घर लौट आए।
हे गणेशजी महाराज!
आपने विष्णु को जैसो कारज सारियो...!
ऐसो कारज सबको सिद्ध करजो।
🌸〰️〰️🌸〰️जय माताजी〰️🌸〰️〰️🌸
पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:-
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science)
" Opp. Shri Dhanlakshmi Strits , Marwar Strits, RAMESHWARM - 623526 ( TAMILANADU )
सेल नंबर: . + 91- 7010668409 / + 91- 7598240825 WHATSAPP नंबर : + 91 7598240825 ( तमिलनाडु )
Skype : astrologer85
Email: prabhurajyguru@gmail.com
आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद..
नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏
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