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विभीषण की शरणागति , अयोध्या का वह सिद्ध स्थान :

विभीषण की शरणागति , अयोध्या का वह सिद्ध स्थान :

|| विभीषण की शरणागति ||


विभीषण,जिसने भाई खोया,प्रभु पाए,

    पर स्मृति से ओझल हो गया..!


रामायण की कथा में एक नाम ऐसा भी है जो न पूरी तरह नायक कहलाया,न खलनायक,वह था विभीषण लंका की स्वर्ण नगरी में जन्मा,रावण का छोटा भाई।एक ही कुल,एक ही रक्त पर विचार अलग।


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भाई के विरुद्ध खड़ा होने का दर्द-


विभीषण जानता था कि रावण महान विद्वान है, पर वह यह भी जानता था कि सीता हरण अधर्म है।

उसने सभा में समझाया भैया,माता सीता को लौटा दीजिए। 

प्रभु राम साधारण मनुष्य नहीं हैं।

पर सत्य की आवाज़ अहंकार को चुभती है।

रावण ने उसे अपमानित किया,देश निकाला दिया।

उस क्षण विभीषण ने न केवल अपना घर छोड़ा उसने अपना भाई भी खो दिया।

सोचिए,कितना कठिन होगा वह पल,जब एक ओर रक्त का संबंध हो,और दूसरी ओर धर्म।

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शरणागति जब प्रभु मिले-


समुद्र तट पर खड़ा विभीषण,अकेला।

पीछे लंका छूट चुकी थी,आगे अनिश्चित भविष्य,वह प्रभु राम के चरणों में गिर पड़ा।

सेना में संदेह था!यह शत्रु का भाई है,कैसे विश्वास करें?

पर राम ने कहा:-जो शरण में आए, उसे मैं स्वीकार करता हूँ।

विभीषण को न केवल शरण मिली,उसे नया जीवन मिला।

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🔥 विजय के बाद भी अधूरापन-


लंका पर विजय हुई।

रावण मारा गया।

विभीषण को लंका का राजा बनाया गया।

पर क्या सच में वह विजेता था?

जिसने धर्म के लिए अपने भाई का वध देखा,क्या वह भीतर से कभी शांत हो पाया होगा?

स्वर्ण सिंहासन पर बैठा विभीषण,शायद हर दिन उस रणभूमि को याद करता होगा जहाँ उसका अपना रक्त गिरा था।

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अमर होने की कथा-


कहते हैं विभीषण चिरंजीवी हैं,अर्थात अमर।

कुछ कथाएँ कहती हैं कि वे आज भी जीवित हैं,धर्म की रक्षा के लिए।

कुछ परंपराओं में यह भी उल्लेख मिलता है कि महाभारत काल में उन्होंने पांडवों से भेंट की,और धर्म के पक्ष में आशीर्वाद दिया।

इतिहास हो या आस्था,विभीषण का चरित्र यही बताता है:-

धर्म का मार्ग चुनना आसान नहीं होता।

वह अक्सर अपनों से दूर कर देता है।

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क्यों भुला दिया गया विभीषण?


राम का नाम अमर है।

हनुमान की भक्ति अमर है।

पर विभीषण? 

वह कहीं पीछे छूट गया।

शायद इस लिए कि समाज अक्सर उसे याद रखता है,जो अपने कुल के साथ खड़ा रहा,चाहे अधर्म ही क्यों न हो।

पर सच्चा साहस उसमे था,जिसने सत्य के लिए अपने ही विरुद्ध खड़ा होना चुना।


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अंतिम विचार


विभीषण की कथा हमें सिखाती है:-

धर्म कभी - कभी आपको अकेला कर देता है।

सत्य का मार्ग त्याग मांगता है।

और इतिहास में सबसे दुखी पात्र वही होते हैं,जिन्होंने सही निर्णय लिया!पर उसका मूल्य जीवनभर चुकाया।


         || जय श्री राम जय हनुमान ||

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|| अयोध्या का वह सिद्ध स्थान:-||


अयोध्या धाम में कनक भवन और हनुमानगढ़ी के मध्य स्थित है 'दशरथ महल', जिसे प्रेम से 'बड़ी जगह' भी कहा जाता है। 

वर्षों पहले यहाँ एक परम विरक्त संत रहा करते थे— श्री रामप्रसाद जी। 

उनका जीवन पूरी तरह प्रभु के चरणों में अर्पित था। 

आश्रम की व्यवस्था का नियम सरल था: मंदिर में जो चढ़ावा आता, वह पलटू बनिया नाम के एक व्यापारी के पास भेज दिया जाता। 

वहीं से राशन आता, ठाकुर जी का भोग लगता और संत - साधु प्रसाद पाते।

कहते हैं प्रभु अपने भक्तों को निखारने के लिए कभी - कभी कठोर परीक्षाएं लेते हैं। 

एक दिन मंदिर में एक पैसे का भी चढ़ावा नहीं आया। 

साधुओं के पास संचय के नाम पर कुछ नहीं था। 

भूख से व्याकुल संतों को देख रामप्रसाद जी ने दो शिष्यों को पलटू बनिया के पास भेजा—

"भैया, आज कुछ आया नहीं है, थोड़ा राशन उधार दे दो ताकि प्रभु को भोग लग सके।

+++ +++

परन्तु नियति को कुछ और ही मंजूर था। पलटू बनिया ने दो टूक कह दिया—"

महंत जी से मेरा व्यवहार नकद का है, उधार का नहीं। 

आज सामान नहीं मिलेगा।

जब यह संदेश रामप्रसाद जी तक पहुँचा, तो उन्होंने अपनी आँखें मूंद लीं और करुण स्वर में कहा—

"जैसी मेरे राघवेंद्र की इच्छा।" 

उस दिन न चूल्हा जला, न भोग बना। 

भगवान को केवल जल का अर्पण किया गया और सभी संत निराहार रह गए।

रात गहराने लगी। 

रामप्रसाद जी भूख से शिथिल शरीर के बावजूद नियम के पक्के थे। 

उन्होंने ठाकुर जी को सुंदर पीताम्बर ओढ़ाया और घंटों बैठकर भजन सुनाते रहे। 

उधर, आधी रात को पलटू बनिया के द्वार पर अचानक हलचल हुई।

+++ +++

अरे पलटू! ओ पलटू सेठ! किवाड़ खोल...!" 

नन्हे बच्चों की आवाजों से सन्नाटा टूट गया। 

खीझते हुए पलटू ने दरवाजा खोला कि इन शरारती बच्चों को सबक सिखाऊँगा, पर सामने का दृश्य देख उसके प्राण जैसे गले में अटक गए।

बारह वर्ष से कम आयु के चार अति सुंदर बालक खड़े थे। 

चारों ने एक ही पीताम्बर ( चादर ) को आपस में ओढ़ा हुआ था। 

उनकी आँखों में ऐसी चमक और चेहरे पर ऐसी आभा थी कि पलटू का क्रोध पल भर में लुप्त होकर अगाध प्रेम में बदल गया।

उसने हकलाते हुए पूछा - बच्चों! 

तुम कौन हो ? 

इतनी रात को यहाँ क्या कर रहे हो?

बालक चंचलता से मुस्कुराए और घर के भीतर घुसते हुए बोले-

"हमें रामप्रसाद बाबा ने भेजा है। 

इस पीताम्बर की गाँठ खोल, इसमें सोलह सौ रुपए हैं।

इन्हें गिन और रख ले।

+++ +++=

उस जमाने में सोलह सौ रुपए एक साम्राज्य के बराबर थे। 

पलटू ने कांपते हाथों से पीताम्बर का कोना खोला, तो सचमुच चांदी के सिक्कों की खनक गूँज उठी। 

बालकों ने अधिकार से कहा—

"इन पैसों का राशन कल सुबह ही आश्रम भिजवा देना और आज के बाद कभी मना मत करना।

पलटू को आत्मग्लानि हुई। 

उसे लगा कि शायद महंत जी नाराज हो गए हैं, इस लिए रात में ही पैसे भिजवा दिए। 

उसने हाथ जोड़कर कहा—

"बच्चों, मेरी पूरी दुकान भी कम पड़ेगी इन पैसों के आगे। 

मैं धीरे - धीरे सारा राशन भिजवा दूँगा।" 

बालक मुस्कुराए, और देखते ही देखते अंधेरे में कहीं ओझल हो गए। 

वे पलटू का धन तो ले गए, पर साथ में उसका मन भी चुरा ले गए।

+++ +++

सुबह मंगला आरती के समय मंदिर में हड़कंप मच गया। 

ठाकुर जी का पीताम्बर गायब था! 

सब को लगा चोरी हो गई है। 

तभी बाहर गाड़ियों की कतार लग गई। 

पलटू बनिया हाथ जोड़े, आँखों में आँसू लिए दौड़ा आया और रामप्रसाद जी के चरणों में गिर पड़ा।

महाराज! मुझे क्षमा कर दें। 

रात में पैसे भिजवाने की क्या आवश्यकता थी? 

मैं कान पकड़ता हूँ, अब कभी राशन के लिए मना नहीं करूँगा। 

और यह रहा आपका पीताम्बर, जिसे वे बालक मेरे पास छोड़ गए थे।

रामप्रसाद जी का हृदय धक से रह गया। 

उन्होंने कांपते हाथों से वह पीताम्बर छुआ - यह तो वही था जिसे उन्होंने कल रात स्वयं प्रभु को ओढ़ाया था! 

जब पलटू ने रात का पूरा वृत्तांत सुनाया, तो रामप्रसाद जी दहाड़ मारकर रो पड़े।

+++ +++

"हा धिक्कार है मुझ पर! मैंने जीवन भर सेवा की पर मुझे दर्शन न दिए, और इस बनिए की हठ के कारण आपको आधी रात को पीताम्बर ओढ़कर गलियों में भटकना पड़ा!इस घटना ने पलटू का जीवन बदल दिया। 

वही पलटू बनिया आगे चलकर महान संत श्री पलटूदास जी के रूप में विख्यात हुए।

उधर, विरह की अग्नि में जलते रामप्रसाद जी जब रात को भजन गाने बैठे, तो मूर्छित हो गए। 

उसी मूर्च्छा में उन्हें चारों भाइयों और उनकी पत्नियों सहित दिव्य दर्शन हुए। 

साक्षात् मैया जानकी ने अपने कोमल हाथों से उनके आँसू पोंछे और अपनी उँगली से उनके माथे पर 'बिन्दी' लगा दी।

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तभी से 'बड़ी जगह' ( दशरथ महल ) के संप्रदाय में बिन्दी वाले तिलक की परंपरा चली आ रही है, जो इस बात का प्रतीक है कि भक्त चाहे भूखा सो जाए, पर भक्तवत्सल भगवान कभी चैन से नहीं सो सकते।

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      || जय श्री राम जय हनुमान ||

!!!!! शुभमस्तु !!!

🙏हर हर महादेव हर...!!

जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-

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जय द्वारकाधीश....

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मर्यादा किसे कहते हैं ? / मन्त्र विज्ञान :

मर्यादा किसे कहते हैं ? / मन्त्र विज्ञान :

मर्यादा किसे कहते हैं ? 

जीवन निर्वाह के नियमों को संतुलन में रखने वाली निर्धारित सीमा रेखा को मर्यादा कहा जाता है, जीवन निर्वाह के सभी विषयों एवं सम्बन्धों के नियम निर्धारित होते हैं, ताकि इन्सान का जीवन सुचारू रूप से गतिमान रहे, तथा उन नियमों के द्वारा जीवन का संतुलन बनाए रखने के लिये सीमा तय होती है, ताकि जीवन में किसी प्रकार का असंतुलन ना हो ऐसे नियमों की निर्धारित रेखा को ही मर्यादा कहा गया है।


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मर्यादा पालन करना इन्सान के लिए अनिवार्य है, क्योंकि मर्यादा भंग होने अर्थात सीमा रेखा को लांघकर नियमों की अनदेखी करने से इन्सान के जीवन में अनेकों प्रकार की समस्यायें उत्पन्न हो जाती हैं, जिसके कारण जीवन निर्वाह अत्यंत कठिन हो जाता है, जो इन्सान मर्यादा को भलीभांति समझते हैं, तथा पालन करते हैं, उनके जीवन से समस्यायें हमेशा दूर रहती हैं, तथा उनका जीवन आनन्द पूर्वक निर्वाह होता है।

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सज्जनों! इन्सान को सर्वप्रथम अपनी मर्यादाएं समझना आवश्यक है, क्योंकि एक पूर्ण मर्यादित इन्सान ही परिवार एवं समाज में सम्मानित जीवन निर्वाह कर सकता है, इन्सान की मर्यादा स्वभाव, व्यवहार एवं आचरण पर निर्भर करती है, इन्सान का स्वभाव भाषा, शब्दों एवं वाणी द्वारा समझा जाता है, सरल भाषा, कर्ण प्रिय शब्द तथा मधुर वाणी इन्सान के स्वभाव की मर्यादा है, जिसे लांघने से इन्सान कटु स्वभाविक समझा जाता है।

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दूसरों का सम्मान करने वाला समाज में व्यवहारिक माना जाता है, अधिक बहस करना, आलोचनायें या चापलूसी करना, प्रताड़ित करना, बकवास करना अथवा बात-बात पर टोकना व्यवहार की मर्यादा भंग करना है, जो समाज में इन्सान को अव्यवहारिक प्रमाणित करती है, आचरण की मर्यादा इन्सान के अपराधी होने से ही भंग नहीं होती, अपितु झूट बोलने, बुराई का साथ देने, उधार लेकर ना चुकाने, बहाने बनाने, आवश्यकता पड़ने पर गायब होने, नशा करने, जुआ, सट्टा जैसे अनुचित कार्य करने जैसे अनेकों कारण भी खराब आचरण प्रस्तुत करते हैं।

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इन्सान के जीवन में परिवार की मर्यादा बनायें रखना भी अत्यंत आवश्यक होता है, परिवार से जितना अधिकार प्राप्ति का होता है उतना ही कर्तव्य परिवार को प्रदान करने का भी होता है, परिवार द्वारा शिक्षा, परवरिश, गृहस्थ जीवन एवं सुरक्षा प्राप्त होती है तो परिवार की सेवा तथा सुखों का ध्यान रखना भी इन्सान का कर्तव्य है, कोई भी ऐसा कार्य जिससे परिवार के सम्मान में हानि पहुँचे परिवार की मर्यादा भंग करना होता है, जिसके कारण परिवार उसे दोषी समझता है।

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इन्सान की परिवार के प्रति कर्तव्य परायणता एवं सम्मान में वृद्धि आवश्यक मर्यादा है, जिसे पूर्ण करने पर ही परिवार में सम्मान प्राप्त होता है, रिश्तों एवं सम्बन्धों की मर्यादा निभाने पर ही रिश्ते कायम रहते हैं, रिश्तों को समय ना देना अथवा रिश्तों पर आवश्यकता से अधिक समय बर्बाद करना रिश्तों को खोखला करना है, इसलिये रिश्तों की मर्यादा बनाए रखना आवश्यक होता है, रिश्ता कितना भी प्रिय हो निजी कार्यों में दखल देना रिश्ते की मर्यादा भंग करना है।

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क्योंकि इन्सान के निजी एवं गुप्त कार्यों में बिना अनुमति किर्याशील होना दखल समझा जाता है, तथा समाज ने किसी को भी किसी के जीवन में अनुचित दखल देने की अनुमति नहीं दी है, रिश्ते बुरे समय में सर्वाधिक सहायक होते हैं, परन्तु नित्य रिश्तों से सहायता की आशा रखना भी रिश्तों की मर्यादा भंग करना है, क्योंकि रिश्ते सहायक अवश्य हैं उन्हें व्यापार बनाने से उनका अंत निश्चित होता है।

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सज्जनों! इन्सान के परिवारिक सम्बन्धों के अतिरिक्त समाज में सबसे प्रिय सम्बन्ध मित्रता का होता है, जो कभी-कभी परिवारिक रिश्तों से भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है, मित्रता वैचारिक सम्बन्ध है, अर्थात जिससे विचार मिलते हैं इन्सान उसे मित्र बना लेता है, मित्र कितना भी प्रिय हो यदि वह मर्यादा लांघने की धृष्टता करता है तो सम्बन्ध विच्छेद हो जाते हैं, मित्रता में आयु, शिक्षा एवं धन की समानता आवश्यक नहीं होती सिर्फ विचार समान होने पर ही मित्रता कायम रह सकती है।

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मित्र का अधिक समय नष्ट करना, बार-बार व असमय घर जाना, निजी जीवन में दखल देना, नित्य सहायता की अपेक्षा करना, अनावश्यक खर्च करवाना, अनुचित शब्दों का उपयोग करना, अधिक परिहास करना जैसे कार्य मित्रता की मर्यादा भंग करते हैं जिसके कारण मित्रता में कटुता उत्पन्न हो जाती है, सम्बन्ध कितना भी प्रिय हो मर्यादाओं का पालन ही उसे सुरक्षित रख सकता है।

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इंसानों की तरह विषयों की भी अपनी मर्यादायें होती हैं, जिनका पालन करने से जीवन निर्वाह सरल एवं आनन्दमय हो जाता है, इन्सान के जीवन में सबसे अधिक प्रभाव विश्वास का होता है, क्योंकि विश्वास के बगैर किसी भी इन्सान से सम्बन्ध या कार्य असंभव हो जाता है, विश्वास के कारण ही धोखे का आरम्भ है, तथा अन्धविश्वास हो तो धोखा निश्चित होता है, इसलिये विश्वास की मर्यादा सावधानी पूर्वक विश्वास करना है सावधानी की मर्यादा लांघते ही विश्वास का विश्वासघात बन जाता है।

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इन्सान का शक करना जब तक मर्यादा में होता है वह इन्सान को सतर्क रखता है परन्तु मर्यादा लांघते ही शक सनक बन जाता है जो प्रेम, विश्वास, श्रद्धा का अंत कर देता है, मोह, लोभ, काम, क्रोध, अहंकार, ईर्षा, घृणा, कुंठा, निराशा, आक्रोश, प्रेम, श्रद्धा, शक, विश्वास, ईमानदारी, परोपकार, दान, भीख, चंदा, स्वार्थ, चापलूसी, आलोचना, बहस, तर्क, कोई भी विषय हो जब तक मर्यादा में रहता है कभी हानिप्रद नहीं होता, परन्तु मर्यादा भंग होते ही समस्या अथवा मुसीबत बन जाता है।

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अग्नि, जल एवं वायु संसार को जीवन प्रदान करते हैं, परन्तु अपनी मर्यादा लांघते ही प्रलयंकारी बन जाते हैं, जिसका परिणाम सिर्फ तबाही होता है, इन्सान जब तक मर्यादाओं का पालन करता है वह सुखी एवं संतुलित जीवन निर्वाह करता है, भाई - बहनों! 

किसी भी प्रकार की मर्यादा भंग करने से किसी ना किसी इन्सान से द्वेष आरम्भ हो जाता है तथा समस्यायें उत्पन्न होना आरम्भ हो जाती हैं। 




मन्त्र विज्ञान :

{{{अजपा गायत्री और विकार मुक्ति }}}


तीन तल हुए — एक वाणी में प्रकट हो,

एक विचार में प्रकट हो, 

एक विचार के नीचे अचेतन में हो।

ऋषि कहते हैं, उसके नीचे भी एक तल है। 

अचेतन में भी होता है, तो भी उसमें आकृति और रूप होता है। 

उसके भी नीचे एक तल है, महाअचेतन का कहें, जहां उसमें रूप और आकृति भी नहीं होती। 

वह अरूप होता है। 

+++ +++

जैसे एक बादल आकाश में भटक रहा है। 

अभी वर्षा नहीं हुई। 

ऐसा एक कोई अज्ञात तल पर भीतर कोई संभावित,पोटेंशियल विचार घूम रहा है । 

वह अचेतन में आकर अंकुरित होगा, 

चेतन में आकर प्रकट होगा, 

वाणी में आकर अभिव्यक्त हो जाएगा। 

ऐसे चार तल हैं।


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गायत्री उस तल पर उपयोग की है जो पहला तल है, सबसे नीचे। 

उस तल पर "अजपा"  का प्रवेश है। 

तो जप का नियम है। 

अगर कोई भी जप शुरू करें — समझें कि राम — राम जप शुरू करते हैं, या ओम, कोई भी जप शुरू करते हैं; या अल्लाह, कोई भी जप शुरू करते है — तो पहले उसे वाणी से शुरू करें। 

+++ +++

पहले कहें, राम, राम; जोर से कहें। 

फिर जब यह इतना सहज हो जाए कि करना न पड़े और होने लगे, इसमें कोई एफर्ट न रह जाए पीछे, प्रयत्न न रह जाए,यह होने लगे; जैसे श्वास चलती है, ऐसा हो जाए कि राम, राम चलता ही रहे, तो फिर ओंठ बंद कर लें।

फिर उसको भीतर चलने दें। 

फिर मुख से न बोलें राम, राम; मन मे चलने दे राम, राम।

+++ +++

फिर इतना इसका अभ्यास हो जाए कि उसमें भी प्रयत्न न करना पड़े, तब इसे वहां से भी छोड़ दें, तब यह और नीचे 'डूब जाएगा। 

और अचेतन में चलने लगेगा — राम,राम। 

आपको भी पता न चलेगा कि चल रहा है, और चलता रहेगा। 

फिर वहां से भी गिरा दिए जाने की विधियां हैं और तब वह अजपा में गिर जाता है। 

फिर वहां राम, राम भी नहीं चलता। 

फिर राम का भाव ही रह जाता है — जस्ट क्लाउडी, एक बादल की तरह छा जाता है। 

जैसे पहाड़ पर कभी बादल बैठ जाता है धुआ — धुआ, ऐसा भीतर प्राणों के गहरे में अरूप छा जाता है।

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उसको कहा है ऋषि ने, अजपा। 

और जब अजपा हो जाए कोई मंत्र, तब वह गायत्री बन गया। अन्यथा वह गायत्री नहीं है।

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और क्या है इस अजपा का उपयोग ???

इस अजपा से सिद्ध क्या होगा ??? 

इस से सिद्ध होगा, विकार — मुक्ति। 

विकारदंडो ध्येय: इस अजपा का लक्ष्य है विकार से मुक्ति।

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यह बहुत अदभुत कीमिया है, केमेस्ट्री है इसकी। 

मंत्र शास्त्र का अपना पूरा रसायन है। 

मंत्र शास्त्र यह कहता है कि अगर कोई भी मंत्र का उपयोग अजपा तक चला जाए,तो आपके चित्त से कामवासना क्षीण हो जाएगी, सब विकार गिर जाएंगे। 

क्योंकि जो व्यक्ति अपने अंतिम अचेतन तल तक पहुंचने में समर्थ हो गया, उसको फिर कोई चीज विकारग्रस्त नहीं कर सकती। 

क्योंकि सब विकार ऊपर — ऊपर हैं, भीतर तो निर्विकार बैठा हुआ है। 

हमें उसका पता नहीं है, इस लिए हम विकार से उलझे रहते हैं।

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कोई भी मंत्र गायत्री बन जाता है,जब अजपा हो जाए। 

यही इस सूत्र का अर्थ है अजपागायत्री विकारदंडो ध्येय:।


मन का निरोध ही उनकी झोली है।


वे जो संन्यासी हैं, उनके कंधे पर एक ही बात टंगी हुई है चौबीस घंटे — मन का निरोध, मन से मुक्ति, मन के पार हो जाना। चौबीस घंटे उनके कंधे पर है।

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आपने एक शब्द सुना होगा,खानाबदोश। यह बहुत बढ़िया शब्द है। 

इसका मतलब होता है, जिनका मकान अपने कंधे पर है। खाना—बदोश। खाना का मतलब होता है मकान—दवाखाना—खाना यानी मकान। दोश का मतलब होता है कंधा,बदोश का मतलब होता है, कंधे के ऊपर। 

जो अपने कंधे पर ही अपना मकान लिए हुए हैं, उनको खानाबदोश कहते हैं — घूमक्कडू लोग, जिनका कोई मकान नहीं है, कंधे पर ही मकान है।

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संन्यासी भी अपने कंधे पर एक चीज ही लिए चलता है चौबीस घंटे — मन का निरोध। 

वही उसकी धारा है सतत श्वास — श्वास की, मन के पार कैसे जाऊं ??? 

क्योंकि मनातीत है सत्य। 

मन के पार कैसे जाऊं ???

क्योंकि मनातीत है अमृत। 

मन के पार कैसे जाऊं ??? 

क्योंकि मनातीत है प्रभु।

जाया जा सकता है। ध्यान उसका मार्ग है।

!!!!! शुभमस्तु !!!

🙏हर हर महादेव हर...!!

जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏

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विभीषण की शरणागति , अयोध्या का वह सिद्ध स्थान :

विभीषण की शरणागति , अयोध्या का वह सिद्ध स्थान : || विभीषण की शरणागति || विभीषण,जिसने भाई खोया,प्रभु पाए,     पर स्मृति से ओझल हो गया..! राम...

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